भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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९० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० कां० २


प्राणः प्राज्ञो वीजात्मा तत्कार्यभेदा हीतरे स्थित्यन्ताः। अन्ये च सर्वे लौकिकाः सर्वप्राणिपरिकल्पिता भेदा रज्ज्वामिव सर्पादयः तच्छून्य आत्मन्यात्मस्वरूपानिश्चयहेतोरविद्यया कल्पिता इति पिण्डीकृतोऽर्थः । प्राणादिश्लोकानां प्रत्येकं पदार्थव्याख्याने फल्गुप्रयोजनत्वात्सिद्धपदार्थत्वाच्च यत्नो न कृतः ॥ २८ ॥प्राण बीजस्वरूप प्राज्ञको कहते हैं। उपर्युक्त स्थितिपर्यन्त सब विकल्प उसीके कार्यभेद हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंसे परिकल्पित अन्य सब लौकिकधर्म रज्जुमें सर्पके समान उन विकल्पोंसे शून्य आत्मामें आत्मस्वरूपके अनिश्चयके कारण अविद्यासे कल्पना किये गये हैं—यह इन श्लोकोंका समुदायार्थ है। प्राणादिश्लोकोंके प्रत्येक पदार्थके व्याख्यानका अत्यन्त अल्प प्रयोजन होनेके कारण तथा वे सिद्ध पदार्थ हैं—इसलिये प्रयत्न नहीं किया ॥ २८ ॥

किं बहुना— | अधिक क्या ?—

यं भावं दर्शयेद्यस्य तं भावं स तु पश्यति ।

तं चावति स भूत्वासौ तद्ग्रहः समुपैति तम् ॥ २९ ॥

[ गुरु ] जिसे जो भाव दिखला देता है वह उसीको आत्मस्वरूपसे देखने लगता है तथा इस प्रकार देखनेवाले उस व्यक्तिकी वह भाव तद्रूप होकर रक्षा करने लगता है। फिर उस (भाव) में होनेवाला अभिनिवेश उस [के आत्मभाव] को प्राप्त हो जाता है ॥ २९ ॥

प्राणादीनामन्यतममुक्तमनुक्तं वान्यं भावं पदार्थं दर्शयेद्यस्याचार्योऽन्यो वाप्त इदमेव तत्त्वमिति स तं भावमात्मभूतं पश्यत्यय-जिसका आचार्य अथवा कोई अन्य आप्त पुरुष जिसे प्राणादिमेंसे किसी कहे हुए अथवा किसी बिना कहे हुए अन्य भावको भी 'यही परमार्थतत्त्व है' इस प्रकार दिखा देता है वह उसी भावको आत्मभूत
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