भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ९१

महमिति वा ममेति वा । तं च द्रष्टारं स भावोऽवति यो दर्शितो भावोऽसौ भूत्वा रक्षति । स्वेनात्मना सर्वतो निरुणद्धि । तस्मिन्ग्रहस्तद्ग्रहस्तदभिनिवेशः । इदमेव तत्त्वमिति स तं ग्रहीतारमुपैति । तस्यात्मभावं निगच्छतीत्यर्थः ॥ २९ ॥हुआ देखता है [ और समझता है कि-] 'मैं यही हूँ' अथवा 'यही मेरा स्वरूप है' । तथा उस द्रष्टाकी भी, जो भाव उसे दिखलाया गया है, तद्रूप होकर रक्षा करता है; अर्थात् उसे सब प्रकार अपने स्वरूपसे निरुद्ध कर देता है। उसी भावमें जो ग्रह-आग्रह अर्थात् 'यही तत्त्व है' इस प्रकारका अभिनिवेश है वह उस भावके ग्रहण करनेवालेको प्राप्त होता है, अर्थात् उसके आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥२९॥

आत्मा सर्वाधिष्ठान है ऐसा जाननेवाला ही परमार्थदर्शी है

एतैरेषोऽपृथग्भावैः पृथगेवेति लक्षितः ।
एवं यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशङ्कितः ॥ ३० ॥

[ इस प्रकार सबका अधिष्ठान होनेके कारण ] इन प्राणादि अपृथग् भावोंसे [पृथक् न होनेपर भी अज्ञानियोंद्वारा] यह आत्मा भिन्न ही माना गया है । इस बातको जो वास्तविकरूपसे जानता है वह निःशंक होकर [ वेदार्थकी ] कल्पना कर सकता है ॥ ३० ॥

एतैः प्राणादिभिरात्मनोऽपृथग्भूतैरपृथग्भावैरेष आत्मा रज्जुरिव सर्पादिविकल्पनारूपैः पृथगेवेति लक्षितोऽभिलक्षितो निश्चितो मूढैरित्यर्थः । विवेकिनांरज्जुमें कल्पित सर्पादि भावोंसे रज्जुके समान यह आत्मा अपनेसे अपृथग्भूत प्राणादि अपृथग्भावोंसे पृथक् ही है—ऐसा मूर्खोंको लक्षित—अभिलक्षित अर्थात् निश्चित हो रहा है । विवेकियोंकी दृष्टिमें तो "यह