भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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९२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| तु रज्ज्वामिव कल्पिताः सर्पादयो नात्मव्यतिरेकेण प्राणादयः सन्तीत्यभिप्रायः “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृ० उ० २ । ४ । ६, ४ । ५ । ७) इति श्रुतेः । | जो कुछ हैं सब आत्मा ही हैं” इस श्रुतिके अनुसार रज्जुमें कल्पित सर्पादिके समान ये प्राणादि आत्मासे भिन्न हैं ही नहीं—ऐसा इसका तात्पर्य है। | | एवमात्मव्यतिरेकेणासत्त्वं रज्जुसर्पवदात्मनि कल्पितानामात्मानं च केवलं निर्विकल्पं यो वेद तत्त्वेन श्रुतितो युक्तितश्च सोऽविशङ्कितो वेदार्थं विभागतः कल्पयेत्कल्पयतीत्यर्थः—इदमेवं परं वाक्यमदोऽन्यपरमिति । न ह्यनध्यात्मविद्वेदाञ्ज्ञातुं शक्नोति तत्त्वतः। “न ह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते” (मनु० ६ । ८२) इति हि मानवं वचनम् ॥ ३० ॥ | इस प्रकार रज्जुमें कल्पित सर्पके समान जो आत्मामें कल्पित पदार्थोंका आत्माके सिवा असत्यत्व समझता है तथा आत्माको श्रुति और युक्तिसे परमार्थतः निर्विकल्प जानता है वह निःशंक होकर वेदार्थकी 'यह वाक्य इस अर्थका प्रतिपादन करनेवाला है और यह अन्यार्थपरक है' इस प्रकार विभागपूर्वक कल्पना कर सकता है—यह इसका तात्पर्य है। जो अध्यात्मतत्त्वको नहीं जानता वह पुरुष तत्त्वतः वेदोंको भी नहीं जान सकता। “अध्यात्मतत्त्वको न जाननेवाला पुरुष किसी भी कर्मफलको प्राप्त नहीं करता” ऐसा मनुजीका भी वचन है ॥ ३० ॥ |

द्वैतका असत्यत्व वेदान्तवेद्य है

यदेतद्द्वैतस्यासत्त्वमुक्तं युक्तितस्तदेतद्वेदान्तप्रमाणावगतमित्याह—यह जो युक्तिपूर्वक द्वैतकी असत्यता बतलायी है वह वेदान्तप्रमाणसे जानी गयी है—इस आशयसे कहते हैं—