भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ९३


स्वप्नमाये यथा दृष्टे गन्धर्वनगरं यथा ।

तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः ॥ ३१ ॥

जिस प्रकार स्वप्न और माया देखे गये हैं तथा जैसा गन्धर्व-नगर जाना गया है उसी प्रकार विचक्षण पुरुषोंने वेदान्तोंमें इस जगत्को देखा है ॥ ३१ ॥

स्वप्नश्च माया च स्वप्नमाये असद्वस्त्वात्मिके असत्यौ सद्वस्त्वात्मिके इव लक्ष्येते अविवेकिभिः । यथा च प्रसारितपण्यापणगृहप्रासादस्त्रीपुंजनपदव्यवहाराकीर्णमिव गन्धर्वनगरं दृश्यमानमेव सद्यकस्मादभावतां गतं दृष्टम्, यथा च स्वप्नमाये दृष्टे असद्रूपे, तथा विश्वमिदं द्वैतं समस्तमसद्दृष्टम् ।अविवेकी पुरुषोंद्वारा स्वप्न और माया, जो असद्वस्तुरूप अर्थात् असत्य हैं, सद्वस्तुरूप देखे जाते हैं। जिस प्रकार विस्तृत दूकान, बाजार, गृह, प्रासाद और नगरनिवासी स्त्री-पुरुषोंके व्यवहारसे भरपूर-सा गन्धर्व-नगर देखते-ही-देखते अकस्मात् अभावको प्राप्त होता देखा गया है, और जिस प्रकार ये स्वप्न और माया असद्रूप देखे गये हैं, उसी प्रकार यह विश्व अर्थात् समस्त द्वैत असत् देखा गया है ।
क्वेत्याह—वेदान्तेषु । “नेह नानास्ति किंचन” (क०उ० २।४।११ बृ० उ० ४।४।१९) “इन्द्रो मायाभिः” (बृ० उ० २।५।१९) “आत्मैवेदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १।४।१७) “ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १।४।१०) “द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १।४।कहाँ देखा गया है ? इसपर कहते हैं—वेदान्तोंमें । “यहाँ नाना कुछ नहीं है” “इन्द्रने मायासे” “पहले यह आत्मा ही था” “पहले यह ब्रह्म ही था” “दूसरे-से निश्चय भय होता है” “उससे