माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
२) "न तु तद्द्वितीयमस्ति" (बृ० उ० ४।३।२३) "यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्" (बृ० उ० ४।५।१५) इत्यादिषु विचक्षणैर्निपुणतरवस्तुदर्शिभिः पण्डितैरित्यर्थः । | दूसरा कोई नहीं है" "जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है" इत्यादि वेदान्तोंमें विचक्षण अर्थात् निपुणतर वस्तुदर्शी पण्डितोंद्वारा देखा गया है—यह इसका तात्पर्य है । "तमःश्वभ्रनिभं दृष्टं वर्षबुद्बुदसंनिभम् । नाशप्रायं सुखाद्दीनं नाशोत्तरमभावगम्" इति व्यासस्मृतेः ॥ ३१ ॥ | "वह जगत् अँधेरे गड्ढेके समान और वर्षाकी बूँदके सदृश नाशप्राय, सुखसे रहित, और नाशके अनन्तर अभावको प्राप्त हो जानेवाला देखा गया है"—इस व्यासस्मृतिसे भी यही बात प्रमाणित होती है ॥३१॥
परमार्थ क्या है ?
प्रकरणार्थोपसंहारार्थोऽयं श्लोकः । यदा वितथं द्वैतमात्मैकैकः परमार्थतः संस्तदेदं निष्पन्नं भवति सर्वोऽयं लौकिको वैदिकश्च व्यवहारोऽविद्याविषय एवेति । तदा— | यह (आगेका) श्लोक इस प्रकरणके विषयका उपसंहार करनेके लिये है। जब कि द्वैत असत् है और एकमात्र आत्मा ही परमार्थतः सत् है तो यह निश्चित होता है कि यह सारा लौकिक और वैदिक व्यवहार अविद्याका ही विषय है। उस अवस्थामें—
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ ३२ ॥