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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ९१

महमिति वा ममेति वा । तं च द्रष्टारं स भावोऽवति यो दर्शितो भावोऽसौ भूत्वा रक्षति । स्वेनात्मना सर्वतो निरुणद्धि । तस्मिन्ग्रहस्तद्ग्रहस्तदभिनिवेशः । इदमेव तत्त्वमिति स तं ग्रहीतारमुपैति । तस्यात्मभावं निगच्छतीत्यर्थः ॥ २९ ॥हुआ देखता है [ और समझता है कि-] 'मैं यही हूँ' अथवा 'यही मेरा स्वरूप है' । तथा उस द्रष्टाकी भी, जो भाव उसे दिखलाया गया है, तद्रूप होकर रक्षा करता है; अर्थात् उसे सब प्रकार अपने स्वरूपसे निरुद्ध कर देता है। उसी भावमें जो ग्रह-आग्रह अर्थात् 'यही तत्त्व है' इस प्रकारका अभिनिवेश है वह उस भावके ग्रहण करनेवालेको प्राप्त होता है, अर्थात् उसके आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥२९॥

आत्मा सर्वाधिष्ठान है ऐसा जाननेवाला ही परमार्थदर्शी है

एतैरेषोऽपृथग्भावैः पृथगेवेति लक्षितः ।
एवं यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशङ्कितः ॥ ३० ॥

[ इस प्रकार सबका अधिष्ठान होनेके कारण ] इन प्राणादि अपृथग् भावोंसे [पृथक् न होनेपर भी अज्ञानियोंद्वारा] यह आत्मा भिन्न ही माना गया है । इस बातको जो वास्तविकरूपसे जानता है वह निःशंक होकर [ वेदार्थकी ] कल्पना कर सकता है ॥ ३० ॥

एतैः प्राणादिभिरात्मनोऽपृथग्भूतैरपृथग्भावैरेष आत्मा रज्जुरिव सर्पादिविकल्पनारूपैः पृथगेवेति लक्षितोऽभिलक्षितो निश्चितो मूढैरित्यर्थः । विवेकिनांरज्जुमें कल्पित सर्पादि भावोंसे रज्जुके समान यह आत्मा अपनेसे अपृथग्भूत प्राणादि अपृथग्भावोंसे पृथक् ही है—ऐसा मूर्खोंको लक्षित—अभिलक्षित अर्थात् निश्चित हो रहा है । विवेकियोंकी दृष्टिमें तो "यह
९२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| तु रज्ज्वामिव कल्पिताः सर्पादयो नात्मव्यतिरेकेण प्राणादयः सन्तीत्यभिप्रायः “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृ० उ० २ । ४ । ६, ४ । ५ । ७) इति श्रुतेः । | जो कुछ हैं सब आत्मा ही हैं” इस श्रुतिके अनुसार रज्जुमें कल्पित सर्पादिके समान ये प्राणादि आत्मासे भिन्न हैं ही नहीं—ऐसा इसका तात्पर्य है। | | एवमात्मव्यतिरेकेणासत्त्वं रज्जुसर्पवदात्मनि कल्पितानामात्मानं च केवलं निर्विकल्पं यो वेद तत्त्वेन श्रुतितो युक्तितश्च सोऽविशङ्कितो वेदार्थं विभागतः कल्पयेत्कल्पयतीत्यर्थः—इदमेवं परं वाक्यमदोऽन्यपरमिति । न ह्यनध्यात्मविद्वेदाञ्ज्ञातुं शक्नोति तत्त्वतः। “न ह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते” (मनु० ६ । ८२) इति हि मानवं वचनम् ॥ ३० ॥ | इस प्रकार रज्जुमें कल्पित सर्पके समान जो आत्मामें कल्पित पदार्थोंका आत्माके सिवा असत्यत्व समझता है तथा आत्माको श्रुति और युक्तिसे परमार्थतः निर्विकल्प जानता है वह निःशंक होकर वेदार्थकी 'यह वाक्य इस अर्थका प्रतिपादन करनेवाला है और यह अन्यार्थपरक है' इस प्रकार विभागपूर्वक कल्पना कर सकता है—यह इसका तात्पर्य है। जो अध्यात्मतत्त्वको नहीं जानता वह पुरुष तत्त्वतः वेदोंको भी नहीं जान सकता। “अध्यात्मतत्त्वको न जाननेवाला पुरुष किसी भी कर्मफलको प्राप्त नहीं करता” ऐसा मनुजीका भी वचन है ॥ ३० ॥ |

द्वैतका असत्यत्व वेदान्तवेद्य है

यदेतद्द्वैतस्यासत्त्वमुक्तं युक्तितस्तदेतद्वेदान्तप्रमाणावगतमित्याह—यह जो युक्तिपूर्वक द्वैतकी असत्यता बतलायी है वह वेदान्तप्रमाणसे जानी गयी है—इस आशयसे कहते हैं—

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ९३


स्वप्नमाये यथा दृष्टे गन्धर्वनगरं यथा ।

तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः ॥ ३१ ॥

जिस प्रकार स्वप्न और माया देखे गये हैं तथा जैसा गन्धर्व-नगर जाना गया है उसी प्रकार विचक्षण पुरुषोंने वेदान्तोंमें इस जगत्को देखा है ॥ ३१ ॥

स्वप्नश्च माया च स्वप्नमाये असद्वस्त्वात्मिके असत्यौ सद्वस्त्वात्मिके इव लक्ष्येते अविवेकिभिः । यथा च प्रसारितपण्यापणगृहप्रासादस्त्रीपुंजनपदव्यवहाराकीर्णमिव गन्धर्वनगरं दृश्यमानमेव सद्यकस्मादभावतां गतं दृष्टम्, यथा च स्वप्नमाये दृष्टे असद्रूपे, तथा विश्वमिदं द्वैतं समस्तमसद्दृष्टम् ।अविवेकी पुरुषोंद्वारा स्वप्न और माया, जो असद्वस्तुरूप अर्थात् असत्य हैं, सद्वस्तुरूप देखे जाते हैं। जिस प्रकार विस्तृत दूकान, बाजार, गृह, प्रासाद और नगरनिवासी स्त्री-पुरुषोंके व्यवहारसे भरपूर-सा गन्धर्व-नगर देखते-ही-देखते अकस्मात् अभावको प्राप्त होता देखा गया है, और जिस प्रकार ये स्वप्न और माया असद्रूप देखे गये हैं, उसी प्रकार यह विश्व अर्थात् समस्त द्वैत असत् देखा गया है ।
क्वेत्याह—वेदान्तेषु । “नेह नानास्ति किंचन” (क०उ० २।४।११ बृ० उ० ४।४।१९) “इन्द्रो मायाभिः” (बृ० उ० २।५।१९) “आत्मैवेदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १।४।१७) “ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १।४।१०) “द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १।४।कहाँ देखा गया है ? इसपर कहते हैं—वेदान्तोंमें । “यहाँ नाना कुछ नहीं है” “इन्द्रने मायासे” “पहले यह आत्मा ही था” “पहले यह ब्रह्म ही था” “दूसरे-से निश्चय भय होता है” “उससे

९४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


२) "न तु तद्द्वितीयमस्ति" (बृ० उ० ४।३।२३) "यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्" (बृ० उ० ४।५।१५) इत्यादिषु विचक्षणैर्निपुणतरवस्तुदर्शिभिः पण्डितैरित्यर्थः । | दूसरा कोई नहीं है" "जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है" इत्यादि वेदान्तोंमें विचक्षण अर्थात् निपुणतर वस्तुदर्शी पण्डितोंद्वारा देखा गया है—यह इसका तात्पर्य है । "तमःश्वभ्रनिभं दृष्टं वर्षबुद्बुदसंनिभम् । नाशप्रायं सुखाद्दीनं नाशोत्तरमभावगम्" इति व्यासस्मृतेः ॥ ३१ ॥ | "वह जगत् अँधेरे गड्ढेके समान और वर्षाकी बूँदके सदृश नाशप्राय, सुखसे रहित, और नाशके अनन्तर अभावको प्राप्त हो जानेवाला देखा गया है"—इस व्यासस्मृतिसे भी यही बात प्रमाणित होती है ॥३१॥


परमार्थ क्या है ?

प्रकरणार्थोपसंहारार्थोऽयं श्लोकः । यदा वितथं द्वैतमात्मैकैकः परमार्थतः संस्तदेदं निष्पन्नं भवति सर्वोऽयं लौकिको वैदिकश्च व्यवहारोऽविद्याविषय एवेति । तदा— | यह (आगेका) श्लोक इस प्रकरणके विषयका उपसंहार करनेके लिये है। जब कि द्वैत असत् है और एकमात्र आत्मा ही परमार्थतः सत् है तो यह निश्चित होता है कि यह सारा लौकिक और वैदिक व्यवहार अविद्याका ही विषय है। उस अवस्थामें—

न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ ३२ ॥

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ९५


न प्रलय है, न उत्पत्ति है, न बद्ध है, न साधक है, न मुमुक्षु है और न मुक्त ही है—यही परमार्थता है ॥ ३२ ॥

न निरोधः—निरोधनं निरोधः प्रलयः, उत्पत्तिर्जननम्, बद्धः संसारी जीवः, साधकः साधनवान्मोक्षस्य, मुमुक्षुर्मोचनार्थी, मुक्तो विमुक्तबन्धः। उत्पत्तिप्रलययोरभावाद्बद्धादयो न सन्तीत्येषा परमार्थता।न निरोध है। निरोधनका नाम निरोध यानी प्रलय है। उत्पत्ति जननको, बद्ध-संसारी जीवको, साधक मोक्षके साधनवालेको, मुमुक्षु मुक्त होनेकी इच्छावालेको और मुक्त बन्धनसे छूटे हुएको कहते हैं। उत्पत्ति और प्रलयका अभाव होनेके कारण ये बद्ध आदि भी नहीं हैं—यही परमार्थता है।
कथमुत्पत्तिप्रलययोरभावः, इत्युच्यते, द्वैतस्यासत्त्वात्। "यत्र हि द्वैतमिव भवति" (बृ० उ० २।४।१४) "य इह नानेव पश्यति" (क० उ० २।१।१०, ११) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) "ब्रह्मैवेदं सर्वम्" (नृसिंहोत्तर० ७) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "इदं सर्वं यदयमात्मा" (बृ० उ० २।४।६, ४।५।७) इत्यादिनानाश्रुतिभ्यो द्वैतस्यासत्त्वं सिद्धम्।उत्पत्ति और प्रलयका अभाव किस प्रकार है? इसपर कहा जाता है—द्वैतकी असत्यता होनेके कारण [इनकी भी सत्ता नहीं है]। "जहाँ द्वैत-जैसा होता है" "जो यहाँ नानावत् देखता है" "यह सब आत्मा ही है" "यह सब ब्रह्म ही है" "एक ही अद्वितीय" "यह जो कुछ है सब आत्मा है" इत्यादि अनेकों श्रुतियोंसे द्वैतकी असत्यता सिद्ध होती है।
सतो ह्युत्पत्तिः प्रलयो वा स्यान्नासतः शशविषाणादेः। नाप्यद्वैतमुत्पद्यते लीयते वा।उत्पत्ति अथवा प्रलय सत्‌की ही हो सकती है, शशशृङ्गादि असद्वस्तुकी नहीं हो सकती। इसी प्रकार अद्वैत वस्तु भी उत्पन्न या

९६ मांडूक्योपनिषद् [ गौ० का०


अद्वयं चोत्पत्तिप्रलयवच्चेति विप्रतिषिद्धम् ।लीन नहीं होती । जो अद्वय हो वह उत्पत्ति-प्रलयवान् भी हो—यह तो सर्वथा विरुद्ध है ।
यस्तु पुनर्द्वैतसंव्यवहारः स रज्जुसर्पवदात्मनि प्राणादिलक्षणः कल्पित इत्युक्तम् । न हि मनोविकल्पनाया रज्जुसर्पादिलक्षणाया रज्ज्यां प्रलयः उत्पत्तिर्वा । न च मनसि रज्जुसर्पस्योत्पत्तिः प्रलयो वा न चोभयतो वा । तथा मानसत्वाविशेषाद्द्वैतस्य । न हि नियते मनसि सुषुप्ते वा द्वैतं गृह्यते ।इसके सिवा जो प्राणादिरूप द्वैतव्यवहार है वह रज्जुमें सर्पके समान आत्मामें ही कल्पित है—यह बात पहले कही जा चुकी है । रज्जुसर्पादिरूप मनोविकल्पकी भी रज्जुमें उत्पत्ति या प्रलय नहीं होती । रज्जुसर्पकी उत्पत्ति या प्रलय न तो मनमें ही होती है और न [ मन और रज्जु ] दोनोंहीमें । इसी प्रकार द्वैतका मनोमयत्व भी समान ही है, क्योंकि मनके समाहित अथवा सुषुप्त हो जानेपर द्वैतका ग्रहण नहीं होता ।
अतो मनोविकल्पनामात्रं द्वैतमिति सिद्धम् । तस्मात्सूक्तं द्वैतस्यासत्त्वान्निरोधाद्यभावः परमार्थतेति ।अतः यह सिद्ध हुआ कि द्वैत मनकी कल्पनामात्र है । इसलिये यह ठीक ही कहा है कि द्वैतकी असत्यता होनेके कारण निरोधादिका अभाव ही परमार्थता है ।
यद्येवं द्वैताभावे शास्त्रव्यापारो <br> ^[शून्यवाद्याशङ्का] नाद्वैते विरोधात् । <br> ^[तन्निवर्त्तनञ्च] तथा च सत्यद्वैतस्य वस्तुत्वे प्रमाणाभावाच्छून्यवाद्-पूर्व०—यदि ऐसा है तो शास्त्रका व्यापार द्वैतका अभाव प्रतिपादन करनेमें ही है, अद्वैत-बोधमें नहीं; क्योंकि इससे विरोध आता है ।* ऐसी अवस्थामें अद्वैतके वस्तुत्वमें कोई प्रमाण न होनेके कारण शून्यवादका

* क्योंकि द्वैतका अभाव प्रतिपादन करनेसे ही यह नहीं समझा जा सकता कि शास्त्रको अद्वैतकी सत्ता अभीष्ट है ।

शां० भा० ]वैतथ्यप्रकरण९७

प्रसङ्गः, द्वैतस्य चाभावात् ।<br><br>न; रज्जुसर्पादिविकल्पनाया निरास्पदत्वानुपपत्तिरिति प्रत्युक्तमेतत्कथमुज्जीवयसीत्याह—<br><br>रज्जुरपि सर्पविकल्पस्यास्पदभूता विकल्पितैवेति दृष्टान्तानुपपत्तिः ।<br><br>न, विकल्पनाक्षयेऽविकल्पितस्याविकल्पितत्वादेव सत्त्वोपपत्तेः । रज्जुसर्पवदसत्त्वमिति चेत् ? न; एकान्तेनाविकल्पितत्वादविकल्पितरज्जुवंशवत्प्राक् सर्पभावविज्ञानात् । विकल्पयितुश्च प्राग्विकल्पोत्पत्तेः सिद्धत्वाभ्युपगमादसत्त्वानुपपत्तिः ।प्रसंग उपस्थित हो जाता है; क्योंकि द्वैतका तो अभाव ही है ।<br><br>सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि रज्जु-सर्पादि विकल्पका निराधार होना सम्भव नहीं है—इस प्रकार पहले निराकरण कर दिये जानेपर भी इसी शंकाको फिर क्यों उठाता है ? इसपर [ शून्यवादी ] कहता है—'सर्पभ्रमकी अधिष्ठानभूता रज्जु भी कल्पिता ही है । इसलिये यह दृष्टान्त ठीक नहीं है ।'<br><br>सिद्धान्ती—नहीं, कल्पनाका क्षय हो जानेपर अविकल्पित आत्माकी सत्ता उसके अविकल्पितत्वके कारण ही सम्भव हो सकती है । यदि कहो कि रज्जु-सर्पके समान उसकी असत्ता है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह अविकल्पित रज्जु-अंशके समान सर्पाभावके विज्ञानके पहलेसे ही सर्वथा अविकल्पित रूपसे विद्यमान है । इसके सिवा, जो विकल्पना करनेवाला होता है उसे विकल्पकी उत्पत्तिसे पहले ही विद्यमान स्वीकार करनेके कारण उसकी असत्ता नहीं मानी जा सकती ।
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९८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


कथं पुनः स्वरूपे व्यापाराभावे शास्त्रस्य द्वैतविज्ञाननिवर्तकत्वम् ?<br><br>नैष दोषः । रज्ज्वां सर्पादिवदात्मनि द्वैतस्याविद्याध्यस्तत्वात् । कथम् ? सुख्यहं दुःखी मूढो जातो मृतो जीर्णो देहवान् पश्यामि व्यक्तोऽव्यक्तः कर्ता फली संयुक्तो वियुक्तः क्षीणो वृद्धोऽहं ममैत इत्येवमादयः सर्व आत्मन्यध्यारोप्यन्ते । आत्मैतेष्वनुगतः सर्वत्राव्यभिचारात् । यथा सर्पधारादिभेदेषु रज्जुः ।<br><br>यदा चैवं विशेष्यस्वरूपप्रत्ययस्य सिद्धत्वान्न कर्तव्यत्वं शास्त्रेण । अकृतकर्तृ च शास्त्रं कृतानुकारित्वेऽप्रमाणम् । यतोऽविद्या-पूर्व०--किन्तु आत्मस्वरूपमें प्रमाणकी गति न होनेपर भी शास्त्र द्वैतविज्ञानका निवर्त्तक कैसे है ?<br><br>सिद्धान्ती--[यहाँ] यह दोष नहीं है, क्योंकि रज्जुमें सर्पादिके समान आत्मामें अविद्याके कारण द्वैतका अध्यास है । किस प्रकार ?--'मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ, मूढ़ हूँ, उत्पन्न हुआ हूँ, मरा हूँ, जराग्रस्त हूँ, देहधारी हूँ, देखता हूँ, व्यक्त हूँ, अव्यक्त हूँ, कर्ता हूँ, फलवान् हूँ, संयुक्त हूँ, वियुक्त हूँ, क्षीण हूँ, वृद्ध हूँ, ये मेरे हैं'--इत्यादि प्रकारके सम्पूर्ण विकल्प आत्मामें आरोपित किये जाते हैं, तथा आत्मा इनमें अनुस्यूत है, क्योंकि उसका कहीं भी व्यभिचार नहीं है, जैसे कि सर्प और धारा आदि भेदोंमें रज्जु ।<br><br>जब कि ऐसी बात है तो विशेष्यरूप ब्रह्मके स्वरूपकी प्रतीति सिद्ध होनेके कारण उसके सम्बन्धमें शास्त्रको कुछ कर्त्तव्य नहीं है । शास्त्र तो असिद्ध वस्तुको सिद्ध करनेवाला है; सिद्ध वस्तुका अनुवाद करनेसे वह प्रमाण नहीं माना जाता ।
शां० भा० ]वैतथ्यप्रकरण९९
ध्यारोपितसुखित्वादिविशेषप्रति-क्योंकि अविद्यासे आरोपित सुखित्व
बन्धादेवात्मनः स्वरूपेणानवस्थानंआदि विशेष प्रतिबन्धकोंके कारण ही
स्वरूपावस्थानं च श्रेय इतिआत्माकी स्वरूपसे स्थिति नहीं है,
सुखित्वादिनिवर्तकं शास्त्रम्और स्वरूपसे स्थिति ही श्रेय है; इस-
आत्मन्यसुखित्वादिप्रत्ययकरणेनलिये 'नेति-नेति' और 'अस्थूलम्'
नेति नेत्यस्थूलादिवाक्यैः। आत्म-आदि वाक्योंसे आत्मामें असुखि-
स्वरूपवदसुखित्वाद्यपि सुखित्वा-त्वादिकी प्रतीति करानेके द्वारा
दिभेदेषु नानुवृत्तोऽस्ति धर्मः।शास्त्र [ उसमें आरोपित ] सुखित्व
यद्यनुवृत्तः स्यान्नाध्यारोपित-आदिकी निवृत्ति करनेवाला है।
सुखित्वादिलक्षणो विशेषः।आत्मस्वरूपके समान असुखित्व
यथोष्णत्वगुणविशेषवत्यग्नौआदि भी सुखित्व आदि भेदोंमें
शीतता। तस्मान्निर्विशेष एवा-अनुवृत्त धर्म नहीं है। यदि वह भी
त्मनि सुखित्वादयो विशेषाःअनुवृत्त होता तो उसमें सुखित्व
कल्पिताः। यच्चासुखित्वादि शास्त्र-आदिरूप विशेष धर्मका आरोप नहीं
मात्मनस्तत्सुखित्वादि विशेषनि-किया जा सकता था, जिस प्रकार कि
वृत्त्यर्थमेवेति सिद्धम्। “सिद्धं तुउष्णत्वधर्मविशिष्ट अग्निमें शीतत्वका
निवर्तकत्वात्” इत्यागमविदांआरोप नहीं किया जा सकता।
सूत्रम् ॥ ३२ ॥अतः सुखित्वादि विशेष निर्विशेष
आत्मामें ही कल्पना किये गये हैं।
इससे सिद्ध हुआ कि आत्माके
विषयमें जो असुखित्व आदि
शास्त्र है वह सुखित्व आदि विशेषकी
निवृत्तिके ही लिये है। शास्त्र-
वेत्ताओंका सूत्र भी है—“[सुखित्व
आदि धर्मोंका ] निवर्तक होनेसे
[ अस्थूलम् आदि ] शास्त्रकी प्रामा-
णिकता सिद्ध होती है” ॥३२॥
१००माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अद्वैतभाव ही मङ्गलमय है

पूर्वश्लोकार्थस्य हेतुमाह—पूर्व श्लोकके अर्थका हेतु बतलाते हैं—

भावैरसद्भिरेवायमद्वयेन च कल्पितः ।
भावा अप्यद्वयेनैव तस्मादद्वयता शिवा ॥ ३३॥

यह (आत्मतत्त्व) प्राणादि असद्भावोंसे और अद्वैतरूपसे कल्पित है। वे असद्भाव भी अद्वैतसे ही कल्पना किये गये हैं। इसलिये अद्वैतभाव ही मङ्गलमय है ॥ ३३ ॥

यथा रज्ज्वामसद्भिः सर्पधारादिभिरद्वयेन च रज्जुद्रव्येण सतार्थं सर्प इयं धारा दण्डोऽयमिति वा रज्जुद्रव्यमेव कल्प्यत एवं प्राणादिभिरनन्तैरसद्भिरेवाविद्यमानैः, न परमार्थतः—न ह्यप्रचलिते मनसि कश्चिद्भाव उपलक्षयितुं शक्यते केनचित्; न चात्मनः प्रचलनमस्ति; प्रचलितस्यैवोपलभ्यमाना भावा न परमार्थतः सन्तः कल्पयितुं शक्याः—अतोऽसद्भिरेव प्राणादिभावैरद्वयेन च परमार्थसतात्मना रज्जुवत्सर्वविकल्पास्पदभूतेनायं स्वयमेवात्मा कल्पितः सदैकस्वभावोऽपि सन् ।जिस प्रकार रज्जुमें अविद्यमान सर्प धारा आदि भावोंसे तथा विद्यमान अद्वितीय रज्जुद्रव्यसे 'यह सर्प है, यह धारा है, यह दण्ड है' इस प्रकार रज्जुद्रव्य ही कल्पना किया जाता है उसी प्रकार प्राणादि अनन्त असत्—अविद्यमान अर्थात् जो परमार्थतः नहीं हैं, [उन भावोंसे आत्मा विकल्पित हो रहा है]—क्योंकि चित्तके चलायमान न होनेपर किसीके द्वारा कोई भाव उपलक्षित नहीं हो सकता, और आत्मामें प्रचलन है नहीं; तथा केवल चलायमान चित्तमें ही उपलब्ध होनेवाले भाव परमार्थतः सत्य हैं—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती । अतः यह आत्मा, स्वयं एकमात्र सत्स्वभाव होनेपर भी, असत्स्वरूप प्राणादि भावोंसे तथा रज्जुके समान सब प्रकारके विकल्पके आश्रयभूत परमार्थ सत्-आत्मस्वरूपसे कल्पित है ।

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण

ते च प्राणादिभावा अप्यद्व-वे प्राणादि भाव भी अद्वय सत्यस्वरूप
येनैव सतात्मना विकल्पिताः।आत्मासे ही कल्पना किये गये हैं,
न हि निरास्पदा काचित्कल्प-क्योंकि कोई भी कल्पना निराधार
नोपलभ्यते; अतः सर्वकल्पना-नहीं हो सकती । अतः समस्त
स्पदत्वात्स्वेनात्मनाद्वयस्याव्य-कल्पनाकी आश्रयभूता होनेसे और
भिचारात्कल्पनावस्थायामप्यद्व-अपने स्वरूपसे अद्वयका कभी
यता शिवा । कल्पना एवव्यभिचार न होनेसे कल्पना अवस्था-
त्वशिवाः । रज्जुसर्पादिवत्त्रासा-में भी अद्वयता ही मङ्गलमयी है। केवल
दिकारिण्यो हि ताः । अद्वयता-कल्पना ही अमङ्गलमयी है, क्योंकि
भयातः सैव शिवा ॥ ३३ ॥वह रज्जु-सर्पादिके समान भय आदि उत्पन्न करनेवाली है । अद्वयता अभयरूपा है, इसलिये वही मङ्गलमयी है ॥ ३३ ॥

तत्त्ववेत्ताकी दृष्टिमें नानात्वका अत्यन्ताभाव है

कुतश्चाद्वयता शिवा ? नाना-और भी अद्वयता क्यों मङ्गलमयी
भूतं पृथक्त्वमन्यस्यान्यस्माद्यत्रहै ?-जहाँ एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नानाभूत पार्थक्य देखा जाता है
दृष्टं तत्राशिवं भवेत् ।वहीं अमङ्गल हो सकता है । [ किन्तु—]

नात्मभावेन नानेदं न स्वेनापि कथंचन ।
न पृथङ् नापृथक्किंचिदिति तत्त्वविदो विदुः ॥ ३४ ॥

यह नानात्व न तो आत्मस्वरूपसे है और न अपने ही पृथक् रूप में कुछ है। कोई भी वस्तु न तो ब्रह्मसे पृथक् है और न अपृथक् ही—ऐसा तत्त्ववेत्ता जानते हैं ॥ ३४ ॥

१०२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
न ह्यत्राद्वये परमार्थसत्यात्मनि प्राणादिसंसारजातमिदं जगदात्मभावेन परमार्थस्वरूपेण निरूप्यमाणं नाना वस्त्वन्तरभूतं भवति । यथा रज्जुस्वरूपेण प्रकाशेन निरूप्यमाणो न नानाभूतः कल्पितः सर्पोऽस्ति तद्वत् । नापि स्वेन प्राणाद्यात्मनेदं विद्यते कदाचिदपि रज्जुसर्पवत्कल्पितत्वादेव ।<br><br>तथान्योन्यं न पृथक्प्राणादि वस्तु यथाश्वान्महिषः पृथग्विद्यत एवम् । अतोऽसत्त्वान्नापृथग्विद्यते अन्योन्यं परेण वा किंचिदिति एवं परमार्थतत्त्वमात्मविदो ब्राह्मणा विदुः । अतोऽशिवहेतुत्वाभावादद्वयतैव शिवेत्यभिप्रायः ॥ ३४ ॥इस अद्वितीय परमार्थ सत्य आत्मामें यह प्राणादि संसारजातरूप जगत् आत्मभावसे—परमार्थ सत्यरूपसे निरूपण किये जानेपर नाना अर्थात् पृथक् वस्तुके अन्तर्भूत नहीं रहता। जिस प्रकार प्रकाशद्वारा रज्जुरूपसे निरूपित होनेपर कल्पित सर्प पृथक्-रूपसे नहीं रहता उसी प्रकार [परमार्थरूपसे निरूपण किया जानेपर जगत् आत्मासे पृथक् वस्तु नहीं ठहरता]; और न यह, रज्जु-सर्पके समान कल्पित होनेके कारण ही, अपने प्राणादिस्वरूपसे कभी कुछ रहता है।<br><br>तथा जिस प्रकार घोड़ेसे भैंस पृथक् है उस प्रकार प्राणादि वस्तु आपसमें भी पृथक् नहीं हैं। इसीलिये असद्रूप होनेसे आपसमें अथवा किसी अन्यसे कोई वस्तु अपृथक् भी नहीं है—ऐसा आत्मज्ञ ब्राह्मणलोग परमार्थतत्त्वको जानते हैं। अतः अमङ्गलके हेतुताका अभाव होनेसे अद्वयता ही मङ्गलमयी है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ३४ ॥

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०३


इस रहस्यके साक्षी कौन थे ?

तदेतत्सम्पग्दर्शनं स्तूयते—अब इस सम्यग्ज्ञानकी स्तुति की जाती है—

वीतरागभयक्रोधैर्मुनिभिर्वेदपारगैः ।

निर्विकल्पो ह्ययं दृष्टः प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः ॥ ३५ ॥

जिनके राग, भय और क्रोध निवृत्त हो गये हैं उन वेदके पारगामी मुनियोंद्वारा ही यह निर्विकल्प प्रपञ्चोपशम अद्वय तत्त्व देखा गया है ॥३५॥

विगतरागभयद्वेषक्रोधादिसर्वदोषैः सर्वदा मुनिभिर्मननशीलैर्विवेकिभिर्वेदपारगैरवगतवेदार्थतत्त्वैर्ज्ञानिभिर्निर्विकल्पः सर्वविकल्पशून्योऽयमात्मा दृष्ट उपलब्घो वेदान्तार्थतत्परैः प्रपञ्चोपशमः—प्रपञ्चो द्वैतभेदविस्तारस्तस्योपशमोऽभावो यस्मिन्स आत्मा प्रपञ्चोपशमोऽत एवाद्वयो विगतदोषैरेव पण्डितैर्वेदान्तार्थतत्परैः संन्यासिभिः परमात्मा द्रष्टुं शक्यः, नान्यै रागादिकल्लुषितचेतोभिः स्वपक्षपातिदर्शनैस्तार्किकादिभिरित्यभिप्रायः॥३५॥जिनके राग भय और क्रोधादि समस्त दोष निवृत्त हां गये हैं उन मुनियों अर्थात् सर्वदा मननशील विवेकियों और वेदके पारगामियों यानी वेदार्थके मर्मज्ञ वेदान्तार्थ-परायण तत्त्वज्ञानियोंद्वारा यह सब प्रकारके विकल्पोंसे रहित निर्विकल्प और प्रपञ्चोपशम—द्वैतरूप भेदके विस्तारका नाम प्रपञ्च है उसकी जिसमें निवृत्ति हो जाती है वह आत्मा प्रपञ्चोपशम है—इसीलिये जो अद्वय है ऐसा यह आत्मा पण्डित यानी वेदान्तार्थमें तत्पर, दोषहीन संन्यासियोंद्वारा ही देखा जा सकता है। जिनके चित्त रागादि दोषसे दूषित हैं और जिनके दर्शन अपने पक्षका आग्रह करनेवाले हैं उन अन्य तार्किकादिको इस आत्माका साक्षात्कार नहीं हो सकता—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३५ ॥
१०४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

तत्त्वदर्शनका आदेश

यस्मात्सर्वानर्थप्रशमरूपत्वादद्वयं शिवमभयम्—क्योंकि सम्पूर्ण अनर्थोंका निवृत्तिस्थान होनेसे अद्वयत्व ही मङ्गलमय और अभयरूप है—

तस्मादेवं विदित्वैनमद्वैते योजयेत्स्मृतिम् ।
अद्वैतं समनुप्राप्य जडवल्लोकमाचरेत् ॥ ३६ ॥

इसलिये इस (आत्मतत्त्व) को ऐसा जानकर अद्वैतमें मनोनिवेश करे और अद्वैततत्त्वको प्राप्त कर लोकमें जडवत् व्यवहार करे ॥ ३६ ॥

अत एवं विदित्वैनमद्वैते स्मृतिं योजयेत् । अद्वैतावगमायैव स्मृतिं कुर्यादित्यर्थः। तच्चाद्वैतमवगम्याहमस्मि परं ब्रह्मेति विदित्वाशनायाद्यतीतं साक्षादपरोक्षादजमात्मानं सर्वलोकव्यवहारातीतं जडवल्लोकमाचरेत् । अप्रख्यापयन्नात्मानमहमेवंविध इत्यभिप्रायः ॥ ३६ ॥इसलिये इसे ऐसा जानकर अद्वैतमें मनोनिवेश करे; अर्थात् अद्वैतबोधके लिये ही चिन्तन करे । और उस अद्वैतको जानकर अर्थात् 'मैं ही परब्रह्म हूँ' ऐसा ज्ञान प्राप्तकर, यानी सम्पूर्ण लोकव्यवहारसे शून्य, भोजनेच्छा आदिसे अतीत; साक्षात् अपरोक्ष अजन्मा आत्माको अनुभवकर लोकमें जडवत् आचरण करे । तात्पर्य यह है कि 'मैं ऐसा हूँ' इस प्रकार अपनेको प्रकट न करता हुआ व्यवहार करे ॥ ३६ ॥

तत्त्वदर्शीका आचरण

कया चर्यया लोकमाचरेदित्यह—लोकमें कैसे व्यवहारसे आचरण करे ? इसपर कहते हैं—

निस्तुतिर्निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च ।
चलाचलनिकेतश्च यतिर्यादृच्छिको भवेत् ॥ ३७ ॥

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०५


यतिको स्तुति नमस्कार और स्वधाकार (पैत्रकर्म) से रहित हो चल (शरीर) और अचल (आत्मा) में ही विश्राम करनेवाला होकर यादृच्छिक (अनायासलब्ध वस्तुद्वारा सन्तुष्ट रहनेवाला) हो जाना चाहिये ॥ ३७ ॥

स्तुतिनमस्कारादिसर्वकर्म-स्तुति नमस्कारादि सम्पूर्ण कर्मोंसे
वर्जितस्त्यक्तसर्वबाह्यैषणः प्रति-रहित तथा बाह्य एषणाओंका त्यागी
पन्नपरमहंसपारिव्राज्य इत्यभि-हो, अर्थात् "निश्चय इस उस
प्रायः—"एतं वै तमात्मानंआत्माको जानकर" इत्यादि श्रुति
विदित्वा" (बृ० उ० ३ । ५।१)और "जिनकी बुद्धि, आत्मा और
इत्यादिश्रुतेः; "तद्बुद्धयस्त-निष्ठा उसीमें लगी हुई हैं तथा जो
दात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः"उसीके शरणापन्न हैं" इस स्मृतिके
(गीता ५ । १७) इत्यादि-अनुसार परमहंस पारिव्राज्य भावको
स्मृतेश्च—चलं शरीरं प्रतिक्षण-प्राप्त हो—प्रतिक्षण अन्यथा भावको
मन्यथाभावात्, अचलमात्म-प्राप्त होनेवाला होनेसे 'चल' शरीर-
तत्त्वम् , यदाकदाचिद्भोजना-को कहते हैं तथा 'अचल' आत्म-
दिव्यवहारनिमित्तमाकाशवदचलंतत्त्वका नाम है—इस प्रकार जब-
स्वरूपमात्मतत्त्वमात्मनो निकेत-तब भोजनादि व्यवहारके निमित्तसे
माश्रयमात्मस्थितिं विस्मृत्याह-आकाशके समान अविचल अपने
मिति मन्यते यदा तदा चलो देहोस्वरूपभूत आत्मतत्त्वको जो अपना
निकेतो यस्य सोऽयमेवं चलाचल-निकेत यानी आश्रय है उसे अर्थात्
निकेतो विद्वान्न पुनर्बाह्यविषया-आत्मस्थितिको भूलकर जब 'मैं हूँ'
श्रयः; स च यादृच्छिको भवेत् ।इस प्रकार अभिमान करता है,
उस समय 'चल' यानी शरीर ही
जिसका निकेत है—इस प्रकार विद्वान्
चलाचलनिकेत होकर अर्थात् फिर
बाह्य विषयोंका आश्रय न करके
यादृच्छिक हो जाय; तात्पर्य यह कि

१०६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का०

यदृच्छाप्राप्तकौपीनाच्छादनग्रास- | अनायास ही प्राप्त हुए कौपीन, मात्रदेहस्थितिरित्यर्थः ॥ ३७ ॥ | आच्छादन और ग्रासमात्रसे जिसकी देहस्थिति है—ऐसा हो जाय ॥ ३७ ॥


अविचल तत्त्वनिष्ठाका विधान

तत्त्वमाध्यात्मिकं दृष्ट्वा तत्त्वं दृष्ट्वा तु बाह्यतः । तत्त्वीभूतस्तदारामस्तत्त्वादप्रच्युतो भवेत् ॥ ३८ ॥

[फिर वह विवेकी पुरुष] आध्यात्मिक तत्त्वको देखकर और बाह्य तत्त्वका भी अनुभव कर, तत्त्वीभूत और तत्त्वमें ही रमण करनेवाला होकर तत्त्वसे च्युत न हो ॥ ३८ ॥

बाह्यं पृथिव्यादितत्त्वम् आध्यात्मिकं च देहादिलक्षणं रज्जुसर्पादिवत्स्वप्नमायादिवच्च असत् "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० उ० ६ । १ । ४) इत्यादिश्रुतेः । आत्मा च सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजोऽपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्न आकाशवत्सर्वगतः सूक्ष्मोऽचलो निर्गुणो निष्कलो निष्क्रियः "तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि" (छा० उ० ६ । ८-१६) इति श्रुतेः । इत्येवं तत्त्वं दृष्ट्वा तत्त्वीभूतस्तदारामो न बाह्यरमणोपृथिवी आदि बाह्य तत्त्व और देहादिलक्षण आध्यात्मिक तत्त्व "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" इत्यादि श्रुतिके अनुसार रज्जुसर्पादिके समान एवं स्वप्न या मायाके समान मिथ्या हैं; तथा "वह सत्य है, वह आत्मा है और वही तू है" इस श्रुतिके अनुसार आत्मा बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, कारणरहित, कार्यरहित, अन्तर्बाह्यशून्य, परिपूर्ण, आकाशके समान सर्वगत, सूक्ष्म, अचल, निर्गुण, निष्कल और निष्क्रिय है। इस प्रकार तत्त्वका साक्षात्कार कर तत्त्वीभूत और उसीमें रमण करनेवाला होकर अर्थात् बाह्य-रत न होकर; जिस प्रकार मनको

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०७


यथातत्त्वदर्शी कश्चिच्चित्तमात्मत्वेन प्रतिपन्नश्चित्तचलनमनु चलितमात्मानं मन्यमानस्तत्त्वाच्चलितं देहादिभूतमात्मानं कदाचिन्मन्यते प्रच्युतोऽहमात्मतत्त्वादिदानीमिति; समाहिते तु मनसि कदाचित्तत्त्वभूतं प्रसन्नात्मानं मन्यत इदानीमस्मि तत्त्वीभूत इति; न तथात्मविद्भवेत् । आत्मन एकरूपत्वात्स्वरूपप्रच्यवनासम्भवाच्च । सदैव ब्रह्मास्मीत्यप्रच्युतो भवेत्तत्त्वात्सदाऽप्रच्युतात्मतत्त्वदर्शनो भवेदित्यभिप्रायः “शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः” (गीता १२।१८) “समं सर्वेषु भूतेषु” ( गीता १३ । २७ ) इत्यादिस्मृतेः ॥३८॥ही आत्मा माननेवाला कोई अतत्त्वदर्शी पुरुष किसी समय चित्तके चञ्चल होनेपर आत्माको भी चलायमान मानकर अपनेको तत्त्वसे विचलित और देहादिरूप समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्वसे च्युत हो गया हूँ तथा किसी समय चित्तके समाहित होनेपर अपनेको तत्त्वीभूत और प्रसन्न समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्वस्थ हूँ उसी प्रकार आत्मवेत्ताको न हो जाना चाहिये; क्योंकि आत्मा सर्वदा एकरूप है और उसका स्वरूपसे च्युत होना भी सम्भव नहीं है। अतः वह सदा ही “मैं ब्रह्म हूँ” ऐसा निश्चयकर तत्त्वसे च्युत न हो; तात्पर्य यह कि सदा ही अच्युत आत्मदर्शी हो, जैसा कि “कुत्ते और चाण्डालमें भी विद्वानोंकी समान दृष्टि होती है” तथा “सम्पूर्ण भूतोंमें समान भावसे स्थित” आदि स्मृतियोंसे प्रमाणित होता है ॥३८॥

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रभाष्ये वैतथ्याख्यं द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥

३. तृतीय प्रकरण — अद्वैतप्रकरण (४८ कारिकाएँ)

अद्वैतप्रकरण


| ओङ्कारनिर्णय उक्तः प्रपञ्चो-<br>पशमः शिवोऽद्वैत आत्मेति<br>प्रतिज्ञामात्रेण । ज्ञाते द्वैतं न<br>विद्यत इति च । तत्र द्वैताभावस्तु<br>वैतथ्यप्रकरणेन स्वप्नमायागन्ध-<br>र्वनगरादिदृष्टान्तैर्दृश्यत्वादद्यन्त-<br>वत्त्वादिहेतुभिस्तर्केण च प्रति-<br>पादितः । अद्वैतं किमागममात्रेण<br>प्रतिपत्तव्यमाहोस्वित्तर्केणापीत्यत<br>आह-शक्यते तर्केणापि ज्ञातुम् ;<br>तत्कथमित्यद्वैतप्रकरणमारभ्यते ।<br>उपास्योपासनादिभेदजातं सर्वं<br>वितथं केवलश्चात्माद्वयः परमार्थ<br>इति स्थितमतीते प्रकरणे; यतः— | [ आगमप्रकरणमें ] ओङ्कारका<br>निर्णय करते समय यह बात केवल<br>प्रतिज्ञामात्रसे कही है कि आत्मा<br>प्रपञ्चका निवृत्तिस्थान शिव, और<br>अद्वैतस्वरूप है तथा ज्ञान हो जाने-<br>पर द्वैत नहीं रहता । फिर वैतथ्य-<br>प्रकरणमें स्वप्न, माया और गन्धर्व-<br>नगरादिके दृष्टान्तोंसे दृश्यत्व एवं<br>आदि-अन्तवत्त्व आदि हेतुओं‌द्वारा<br>तर्कसे भी द्वैतके अभावका प्रतिपादन<br>किया गया । किन्तु वह अद्वैत क्या<br>शास्त्रमात्रसे ही ज्ञातव्य है अथवा<br>तर्कसे भी जाना जा सकता है ?<br>इसपर कहते हैं—तर्कसे भी जाना<br>जा सकता है । सो किस प्रकार ?<br>इसी बातको बतलानेके लिये अद्वैत<br>प्रकरणका आरम्भ किया जाता है ।<br>उपास्य और उपासना आदि सम्पूर्ण<br>भेद मिथ्या है, केवल आत्मा ही अद्वय<br>परमार्थस्वरूप है—यह बात पिछले<br>प्रकरणमें निश्चित हुई है; क्योंकि— |

भेददर्शी कृपण है

उपासनाश्रितो धर्मो जाते ब्रह्मणि वर्तते ।
प्रागुत्पत्तेरजं सर्वं तेनासौ कृपणः स्मृतः ॥ १ ॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १०९


उपासनाका आश्रय लेनेवाला जीव कार्य ब्रह्ममें ही रहता है [ अर्थात् उसे ही अपना उपास्य मानता है, और समझता है कि ] उत्पत्तिसे पूर्व ही सब अज [ अर्थात् अजन्मा ब्रह्मस्वरूप ] था । इसलिये वह कृपण ( दीन ) माना गया है ॥ १ ॥

उपासनाश्रित उपासनामात्मनो मोक्षसाधनत्वेन गत उपासकोऽहं ममोपास्यं ब्रह्म । तदुपासनं कृत्वा जाते ब्रह्मणीदानीं वर्तमानोऽजं ब्रह्म शरीरपातादूर्ध्वं प्रतिपत्स्ये प्रागुत्पत्तेश्चाजमिदं सर्वमहं च । यदात्मकोऽहं प्रागुत्पत्तेरिदानीं जातो जाते ब्रह्मणि च वर्तमान उपासनया पुनस्तदेव प्रतिपत्स्य इत्येवमुपासनाश्रितो धर्मः साधको येनैवं क्षुद्रब्रह्मवित्तेनासौ कारणेन कृपणो दीनोऽल्पकः स्मृतो नित्याजब्रह्मदर्शिभिरित्यभिप्रायः।<br><br>“यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते” (के० उ० १।४)<br>इत्यादिश्रुतेस्तलवकाराणाम् ॥१॥‘उपासनाश्रितः’—उपासनाको अपने मोक्षके साधनरूपसे माननेवाला पुरुष अर्थात् ‘मैं उपासक हूँ, और ब्रह्म मेरा उपास्य है। उसकी उपासना करके इस समय कार्यब्रह्ममें रहता हुआ शरीरपातके अनन्तर मैं अजन्मा ब्रह्मको प्राप्त हो जाऊँगा तथा उत्पत्तिके पूर्व भी यह सब और मैं अजरूप ही थे । उत्पत्तिसे पूर्व मैं जैसा था अब उत्पन्न होकर जातब्रह्ममें वर्तमान हुआ अन्तमें उपासनाद्वारा मैं फिर उसी रूपको प्राप्त हो जाऊँगा’—इस प्रकार उपासनाका आश्रय लेनेवाला साधक जीव क्योंकि क्षुद्रब्रह्मवेत्ता है, इस कारणसे ही यह सर्वदा अजन्मा-ब्रह्मका दर्शन करनेवाले महात्माओं-द्वारा कृपण—दीन अर्थात् क्षुद्र माना गया है—यह इसका अभिप्राय है; जैसा कि “जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि जिससे वाणी प्रकट होती है, वही ब्रह्म है—ऐसा जान; जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है” इत्यादि तलवकार-श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ १ ॥
११०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अकार्पण्यनिरूपणकी प्रतिज्ञा

सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मानं प्रतिपत्तुमशक्नुवन्नविद्यया दीनमात्मानं मन्यमानो जातोऽहं जाते ब्रह्मणि वर्ते तदुपासनाश्रितः सन्ब्रह्म प्रतिपत्स्य इत्येवं प्रतिपन्नः कृपणो भवति यस्मात्—बाहर और भीतर वर्तमान अजन्मा आत्माको प्राप्त करनेमें असमर्थ होनेके कारण अविद्यावश अपनेको दीन माननेवाला पुरुष, क्योंकि 'मैं उत्पन्न हुआ हूँ, उत्पन्न हुए ब्रह्ममें ही वर्तमान हूँ और उनकी उपासनाका आश्रय लेकर ही ब्रह्मको प्राप्त होऊँगा', इस प्रकार माननेके कारण दीन है—

अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतम् ।
यथा न जायते किंचिज्जायमानं समन्ततः ॥ २ ॥

इसलिये अब मैं सर्वत्र समताभावको प्राप्त जन्मरहित अकृपणभाव (अजन्मा ब्रह्म) का वर्णन करता हूँ [जिससे यह समझने में आ जायगा कि] किस प्रकार सब ओर उत्पन्न होनेपर भी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ ॥२॥

अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमकृपणभावमजं ब्रह्म। तद्धि कार्पण्यास्पदम् “यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं मर्त्यमसन्” (छा० उ० ७।२४।१) “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तद्विपरीतं सबाह्याभ्यन्तरमजमकार्पण्यं भूमा-इसलिये मैं अकार्पण्य अकृपणभाव अर्थात् अजन्मा ब्रह्मका वर्णन करता हूँ । “जहाँ अन्य अन्यको देखता है, अन्यको सुनता है और अन्यको ही जानता है वह अल्प है वह मरणशील और असत् है” “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार उपर्युक्त जातब्रह्म तो कृपणताका ही आश्रय है । उससे विपरीत बाहर-भीतर वर्तमान अजन्मा भूमासंज्ञक