माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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९६ मांडूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| अद्वयं चोत्पत्तिप्रलयवच्चेति विप्रतिषिद्धम् । | लीन नहीं होती । जो अद्वय हो वह उत्पत्ति-प्रलयवान् भी हो—यह तो सर्वथा विरुद्ध है । |
| यस्तु पुनर्द्वैतसंव्यवहारः स रज्जुसर्पवदात्मनि प्राणादिलक्षणः कल्पित इत्युक्तम् । न हि मनोविकल्पनाया रज्जुसर्पादिलक्षणाया रज्ज्यां प्रलयः उत्पत्तिर्वा । न च मनसि रज्जुसर्पस्योत्पत्तिः प्रलयो वा न चोभयतो वा । तथा मानसत्वाविशेषाद्द्वैतस्य । न हि नियते मनसि सुषुप्ते वा द्वैतं गृह्यते । | इसके सिवा जो प्राणादिरूप द्वैतव्यवहार है वह रज्जुमें सर्पके समान आत्मामें ही कल्पित है—यह बात पहले कही जा चुकी है । रज्जुसर्पादिरूप मनोविकल्पकी भी रज्जुमें उत्पत्ति या प्रलय नहीं होती । रज्जुसर्पकी उत्पत्ति या प्रलय न तो मनमें ही होती है और न [ मन और रज्जु ] दोनोंहीमें । इसी प्रकार द्वैतका मनोमयत्व भी समान ही है, क्योंकि मनके समाहित अथवा सुषुप्त हो जानेपर द्वैतका ग्रहण नहीं होता । |
| अतो मनोविकल्पनामात्रं द्वैतमिति सिद्धम् । तस्मात्सूक्तं द्वैतस्यासत्त्वान्निरोधाद्यभावः परमार्थतेति । | अतः यह सिद्ध हुआ कि द्वैत मनकी कल्पनामात्र है । इसलिये यह ठीक ही कहा है कि द्वैतकी असत्यता होनेके कारण निरोधादिका अभाव ही परमार्थता है । |
| यद्येवं द्वैताभावे शास्त्रव्यापारो <br> ^[शून्यवाद्याशङ्का] नाद्वैते विरोधात् । <br> ^[तन्निवर्त्तनञ्च] तथा च सत्यद्वैतस्य वस्तुत्वे प्रमाणाभावाच्छून्यवाद्- | पूर्व०—यदि ऐसा है तो शास्त्रका व्यापार द्वैतका अभाव प्रतिपादन करनेमें ही है, अद्वैत-बोधमें नहीं; क्योंकि इससे विरोध आता है ।* ऐसी अवस्थामें अद्वैतके वस्तुत्वमें कोई प्रमाण न होनेके कारण शून्यवादका |
* क्योंकि द्वैतका अभाव प्रतिपादन करनेसे ही यह नहीं समझा जा सकता कि शास्त्रको अद्वैतकी सत्ता अभीष्ट है ।