माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| शां० भा० ] | वैतथ्यप्रकरण | ९७ |
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| प्रसङ्गः, द्वैतस्य चाभावात् ।<br><br>न; रज्जुसर्पादिविकल्पनाया निरास्पदत्वानुपपत्तिरिति प्रत्युक्तमेतत्कथमुज्जीवयसीत्याह—<br><br>रज्जुरपि सर्पविकल्पस्यास्पदभूता विकल्पितैवेति दृष्टान्तानुपपत्तिः ।<br><br>न, विकल्पनाक्षयेऽविकल्पितस्याविकल्पितत्वादेव सत्त्वोपपत्तेः । रज्जुसर्पवदसत्त्वमिति चेत् ? न; एकान्तेनाविकल्पितत्वादविकल्पितरज्जुवंशवत्प्राक् सर्पभावविज्ञानात् । विकल्पयितुश्च प्राग्विकल्पोत्पत्तेः सिद्धत्वाभ्युपगमादसत्त्वानुपपत्तिः । | प्रसंग उपस्थित हो जाता है; क्योंकि द्वैतका तो अभाव ही है ।<br><br>सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि रज्जु-सर्पादि विकल्पका निराधार होना सम्भव नहीं है—इस प्रकार पहले निराकरण कर दिये जानेपर भी इसी शंकाको फिर क्यों उठाता है ? इसपर [ शून्यवादी ] कहता है—'सर्पभ्रमकी अधिष्ठानभूता रज्जु भी कल्पिता ही है । इसलिये यह दृष्टान्त ठीक नहीं है ।'<br><br>सिद्धान्ती—नहीं, कल्पनाका क्षय हो जानेपर अविकल्पित आत्माकी सत्ता उसके अविकल्पितत्वके कारण ही सम्भव हो सकती है । यदि कहो कि रज्जु-सर्पके समान उसकी असत्ता है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह अविकल्पित रज्जु-अंशके समान सर्पाभावके विज्ञानके पहलेसे ही सर्वथा अविकल्पित रूपसे विद्यमान है । इसके सिवा, जो विकल्पना करनेवाला होता है उसे विकल्पकी उत्पत्तिसे पहले ही विद्यमान स्वीकार करनेके कारण उसकी असत्ता नहीं मानी जा सकती । |