भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 118

९८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


कथं पुनः स्वरूपे व्यापाराभावे शास्त्रस्य द्वैतविज्ञाननिवर्तकत्वम् ?<br><br>नैष दोषः । रज्ज्वां सर्पादिवदात्मनि द्वैतस्याविद्याध्यस्तत्वात् । कथम् ? सुख्यहं दुःखी मूढो जातो मृतो जीर्णो देहवान् पश्यामि व्यक्तोऽव्यक्तः कर्ता फली संयुक्तो वियुक्तः क्षीणो वृद्धोऽहं ममैत इत्येवमादयः सर्व आत्मन्यध्यारोप्यन्ते । आत्मैतेष्वनुगतः सर्वत्राव्यभिचारात् । यथा सर्पधारादिभेदेषु रज्जुः ।<br><br>यदा चैवं विशेष्यस्वरूपप्रत्ययस्य सिद्धत्वान्न कर्तव्यत्वं शास्त्रेण । अकृतकर्तृ च शास्त्रं कृतानुकारित्वेऽप्रमाणम् । यतोऽविद्या-पूर्व०--किन्तु आत्मस्वरूपमें प्रमाणकी गति न होनेपर भी शास्त्र द्वैतविज्ञानका निवर्त्तक कैसे है ?<br><br>सिद्धान्ती--[यहाँ] यह दोष नहीं है, क्योंकि रज्जुमें सर्पादिके समान आत्मामें अविद्याके कारण द्वैतका अध्यास है । किस प्रकार ?--'मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ, मूढ़ हूँ, उत्पन्न हुआ हूँ, मरा हूँ, जराग्रस्त हूँ, देहधारी हूँ, देखता हूँ, व्यक्त हूँ, अव्यक्त हूँ, कर्ता हूँ, फलवान् हूँ, संयुक्त हूँ, वियुक्त हूँ, क्षीण हूँ, वृद्ध हूँ, ये मेरे हैं'--इत्यादि प्रकारके सम्पूर्ण विकल्प आत्मामें आरोपित किये जाते हैं, तथा आत्मा इनमें अनुस्यूत है, क्योंकि उसका कहीं भी व्यभिचार नहीं है, जैसे कि सर्प और धारा आदि भेदोंमें रज्जु ।<br><br>जब कि ऐसी बात है तो विशेष्यरूप ब्रह्मके स्वरूपकी प्रतीति सिद्ध होनेके कारण उसके सम्बन्धमें शास्त्रको कुछ कर्त्तव्य नहीं है । शास्त्र तो असिद्ध वस्तुको सिद्ध करनेवाला है; सिद्ध वस्तुका अनुवाद करनेसे वह प्रमाण नहीं माना जाता ।