भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ]वैतथ्यप्रकरण९९
ध्यारोपितसुखित्वादिविशेषप्रति-क्योंकि अविद्यासे आरोपित सुखित्व
बन्धादेवात्मनः स्वरूपेणानवस्थानंआदि विशेष प्रतिबन्धकोंके कारण ही
स्वरूपावस्थानं च श्रेय इतिआत्माकी स्वरूपसे स्थिति नहीं है,
सुखित्वादिनिवर्तकं शास्त्रम्और स्वरूपसे स्थिति ही श्रेय है; इस-
आत्मन्यसुखित्वादिप्रत्ययकरणेनलिये 'नेति-नेति' और 'अस्थूलम्'
नेति नेत्यस्थूलादिवाक्यैः। आत्म-आदि वाक्योंसे आत्मामें असुखि-
स्वरूपवदसुखित्वाद्यपि सुखित्वा-त्वादिकी प्रतीति करानेके द्वारा
दिभेदेषु नानुवृत्तोऽस्ति धर्मः।शास्त्र [ उसमें आरोपित ] सुखित्व
यद्यनुवृत्तः स्यान्नाध्यारोपित-आदिकी निवृत्ति करनेवाला है।
सुखित्वादिलक्षणो विशेषः।आत्मस्वरूपके समान असुखित्व
यथोष्णत्वगुणविशेषवत्यग्नौआदि भी सुखित्व आदि भेदोंमें
शीतता। तस्मान्निर्विशेष एवा-अनुवृत्त धर्म नहीं है। यदि वह भी
त्मनि सुखित्वादयो विशेषाःअनुवृत्त होता तो उसमें सुखित्व
कल्पिताः। यच्चासुखित्वादि शास्त्र-आदिरूप विशेष धर्मका आरोप नहीं
मात्मनस्तत्सुखित्वादि विशेषनि-किया जा सकता था, जिस प्रकार कि
वृत्त्यर्थमेवेति सिद्धम्। “सिद्धं तुउष्णत्वधर्मविशिष्ट अग्निमें शीतत्वका
निवर्तकत्वात्” इत्यागमविदांआरोप नहीं किया जा सकता।
सूत्रम् ॥ ३२ ॥अतः सुखित्वादि विशेष निर्विशेष
आत्मामें ही कल्पना किये गये हैं।
इससे सिद्ध हुआ कि आत्माके
विषयमें जो असुखित्व आदि
शास्त्र है वह सुखित्व आदि विशेषकी
निवृत्तिके ही लिये है। शास्त्र-
वेत्ताओंका सूत्र भी है—“[सुखित्व
आदि धर्मोंका ] निवर्तक होनेसे
[ अस्थूलम् आदि ] शास्त्रकी प्रामा-
णिकता सिद्ध होती है” ॥३२॥