भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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१०६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का०

यदृच्छाप्राप्तकौपीनाच्छादनग्रास- | अनायास ही प्राप्त हुए कौपीन, मात्रदेहस्थितिरित्यर्थः ॥ ३७ ॥ | आच्छादन और ग्रासमात्रसे जिसकी देहस्थिति है—ऐसा हो जाय ॥ ३७ ॥


अविचल तत्त्वनिष्ठाका विधान

तत्त्वमाध्यात्मिकं दृष्ट्वा तत्त्वं दृष्ट्वा तु बाह्यतः । तत्त्वीभूतस्तदारामस्तत्त्वादप्रच्युतो भवेत् ॥ ३८ ॥

[फिर वह विवेकी पुरुष] आध्यात्मिक तत्त्वको देखकर और बाह्य तत्त्वका भी अनुभव कर, तत्त्वीभूत और तत्त्वमें ही रमण करनेवाला होकर तत्त्वसे च्युत न हो ॥ ३८ ॥

बाह्यं पृथिव्यादितत्त्वम् आध्यात्मिकं च देहादिलक्षणं रज्जुसर्पादिवत्स्वप्नमायादिवच्च असत् "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० उ० ६ । १ । ४) इत्यादिश्रुतेः । आत्मा च सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजोऽपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्न आकाशवत्सर्वगतः सूक्ष्मोऽचलो निर्गुणो निष्कलो निष्क्रियः "तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि" (छा० उ० ६ । ८-१६) इति श्रुतेः । इत्येवं तत्त्वं दृष्ट्वा तत्त्वीभूतस्तदारामो न बाह्यरमणोपृथिवी आदि बाह्य तत्त्व और देहादिलक्षण आध्यात्मिक तत्त्व "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" इत्यादि श्रुतिके अनुसार रज्जुसर्पादिके समान एवं स्वप्न या मायाके समान मिथ्या हैं; तथा "वह सत्य है, वह आत्मा है और वही तू है" इस श्रुतिके अनुसार आत्मा बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, कारणरहित, कार्यरहित, अन्तर्बाह्यशून्य, परिपूर्ण, आकाशके समान सर्वगत, सूक्ष्म, अचल, निर्गुण, निष्कल और निष्क्रिय है। इस प्रकार तत्त्वका साक्षात्कार कर तत्त्वीभूत और उसीमें रमण करनेवाला होकर अर्थात् बाह्य-रत न होकर; जिस प्रकार मनको