भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 125

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०५


यतिको स्तुति नमस्कार और स्वधाकार (पैत्रकर्म) से रहित हो चल (शरीर) और अचल (आत्मा) में ही विश्राम करनेवाला होकर यादृच्छिक (अनायासलब्ध वस्तुद्वारा सन्तुष्ट रहनेवाला) हो जाना चाहिये ॥ ३७ ॥

स्तुतिनमस्कारादिसर्वकर्म-स्तुति नमस्कारादि सम्पूर्ण कर्मोंसे
वर्जितस्त्यक्तसर्वबाह्यैषणः प्रति-रहित तथा बाह्य एषणाओंका त्यागी
पन्नपरमहंसपारिव्राज्य इत्यभि-हो, अर्थात् "निश्चय इस उस
प्रायः—"एतं वै तमात्मानंआत्माको जानकर" इत्यादि श्रुति
विदित्वा" (बृ० उ० ३ । ५।१)और "जिनकी बुद्धि, आत्मा और
इत्यादिश्रुतेः; "तद्बुद्धयस्त-निष्ठा उसीमें लगी हुई हैं तथा जो
दात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः"उसीके शरणापन्न हैं" इस स्मृतिके
(गीता ५ । १७) इत्यादि-अनुसार परमहंस पारिव्राज्य भावको
स्मृतेश्च—चलं शरीरं प्रतिक्षण-प्राप्त हो—प्रतिक्षण अन्यथा भावको
मन्यथाभावात्, अचलमात्म-प्राप्त होनेवाला होनेसे 'चल' शरीर-
तत्त्वम् , यदाकदाचिद्भोजना-को कहते हैं तथा 'अचल' आत्म-
दिव्यवहारनिमित्तमाकाशवदचलंतत्त्वका नाम है—इस प्रकार जब-
स्वरूपमात्मतत्त्वमात्मनो निकेत-तब भोजनादि व्यवहारके निमित्तसे
माश्रयमात्मस्थितिं विस्मृत्याह-आकाशके समान अविचल अपने
मिति मन्यते यदा तदा चलो देहोस्वरूपभूत आत्मतत्त्वको जो अपना
निकेतो यस्य सोऽयमेवं चलाचल-निकेत यानी आश्रय है उसे अर्थात्
निकेतो विद्वान्न पुनर्बाह्यविषया-आत्मस्थितिको भूलकर जब 'मैं हूँ'
श्रयः; स च यादृच्छिको भवेत् ।इस प्रकार अभिमान करता है,
उस समय 'चल' यानी शरीर ही
जिसका निकेत है—इस प्रकार विद्वान्
चलाचलनिकेत होकर अर्थात् फिर
बाह्य विषयोंका आश्रय न करके
यादृच्छिक हो जाय; तात्पर्य यह कि