माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| १०४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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तत्त्वदर्शनका आदेश
| यस्मात्सर्वानर्थप्रशमरूपत्वादद्वयं शिवमभयम्— | क्योंकि सम्पूर्ण अनर्थोंका निवृत्तिस्थान होनेसे अद्वयत्व ही मङ्गलमय और अभयरूप है— |
तस्मादेवं विदित्वैनमद्वैते योजयेत्स्मृतिम् ।
अद्वैतं समनुप्राप्य जडवल्लोकमाचरेत् ॥ ३६ ॥
इसलिये इस (आत्मतत्त्व) को ऐसा जानकर अद्वैतमें मनोनिवेश करे और अद्वैततत्त्वको प्राप्त कर लोकमें जडवत् व्यवहार करे ॥ ३६ ॥
| अत एवं विदित्वैनमद्वैते स्मृतिं योजयेत् । अद्वैतावगमायैव स्मृतिं कुर्यादित्यर्थः। तच्चाद्वैतमवगम्याहमस्मि परं ब्रह्मेति विदित्वाशनायाद्यतीतं साक्षादपरोक्षादजमात्मानं सर्वलोकव्यवहारातीतं जडवल्लोकमाचरेत् । अप्रख्यापयन्नात्मानमहमेवंविध इत्यभिप्रायः ॥ ३६ ॥ | इसलिये इसे ऐसा जानकर अद्वैतमें मनोनिवेश करे; अर्थात् अद्वैतबोधके लिये ही चिन्तन करे । और उस अद्वैतको जानकर अर्थात् 'मैं ही परब्रह्म हूँ' ऐसा ज्ञान प्राप्तकर, यानी सम्पूर्ण लोकव्यवहारसे शून्य, भोजनेच्छा आदिसे अतीत; साक्षात् अपरोक्ष अजन्मा आत्माको अनुभवकर लोकमें जडवत् आचरण करे । तात्पर्य यह है कि 'मैं ऐसा हूँ' इस प्रकार अपनेको प्रकट न करता हुआ व्यवहार करे ॥ ३६ ॥ |
तत्त्वदर्शीका आचरण
| कया चर्यया लोकमाचरेदित्यह— | लोकमें कैसे व्यवहारसे आचरण करे ? इसपर कहते हैं— |
निस्तुतिर्निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च ।
चलाचलनिकेतश्च यतिर्यादृच्छिको भवेत् ॥ ३७ ॥