माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 123, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 123
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०३
इस रहस्यके साक्षी कौन थे ?
| तदेतत्सम्पग्दर्शनं स्तूयते— | अब इस सम्यग्ज्ञानकी स्तुति की जाती है— |
|---|
वीतरागभयक्रोधैर्मुनिभिर्वेदपारगैः ।
निर्विकल्पो ह्ययं दृष्टः प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः ॥ ३५ ॥
जिनके राग, भय और क्रोध निवृत्त हो गये हैं उन वेदके पारगामी मुनियोंद्वारा ही यह निर्विकल्प प्रपञ्चोपशम अद्वय तत्त्व देखा गया है ॥३५॥
| विगतरागभयद्वेषक्रोधादिसर्वदोषैः सर्वदा मुनिभिर्मननशीलैर्विवेकिभिर्वेदपारगैरवगतवेदार्थतत्त्वैर्ज्ञानिभिर्निर्विकल्पः सर्वविकल्पशून्योऽयमात्मा दृष्ट उपलब्घो वेदान्तार्थतत्परैः प्रपञ्चोपशमः—प्रपञ्चो द्वैतभेदविस्तारस्तस्योपशमोऽभावो यस्मिन्स आत्मा प्रपञ्चोपशमोऽत एवाद्वयो विगतदोषैरेव पण्डितैर्वेदान्तार्थतत्परैः संन्यासिभिः परमात्मा द्रष्टुं शक्यः, नान्यै रागादिकल्लुषितचेतोभिः स्वपक्षपातिदर्शनैस्तार्किकादिभिरित्यभिप्रायः॥३५॥ | जिनके राग भय और क्रोधादि समस्त दोष निवृत्त हां गये हैं उन मुनियों अर्थात् सर्वदा मननशील विवेकियों और वेदके पारगामियों यानी वेदार्थके मर्मज्ञ वेदान्तार्थ-परायण तत्त्वज्ञानियोंद्वारा यह सब प्रकारके विकल्पोंसे रहित निर्विकल्प और प्रपञ्चोपशम—द्वैतरूप भेदके विस्तारका नाम प्रपञ्च है उसकी जिसमें निवृत्ति हो जाती है वह आत्मा प्रपञ्चोपशम है—इसीलिये जो अद्वय है ऐसा यह आत्मा पण्डित यानी वेदान्तार्थमें तत्पर, दोषहीन संन्यासियोंद्वारा ही देखा जा सकता है। जिनके चित्त रागादि दोषसे दूषित हैं और जिनके दर्शन अपने पक्षका आग्रह करनेवाले हैं उन अन्य तार्किकादिको इस आत्माका साक्षात्कार नहीं हो सकता—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३५ ॥ |
|---|