भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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१०२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
न ह्यत्राद्वये परमार्थसत्यात्मनि प्राणादिसंसारजातमिदं जगदात्मभावेन परमार्थस्वरूपेण निरूप्यमाणं नाना वस्त्वन्तरभूतं भवति । यथा रज्जुस्वरूपेण प्रकाशेन निरूप्यमाणो न नानाभूतः कल्पितः सर्पोऽस्ति तद्वत् । नापि स्वेन प्राणाद्यात्मनेदं विद्यते कदाचिदपि रज्जुसर्पवत्कल्पितत्वादेव ।<br><br>तथान्योन्यं न पृथक्प्राणादि वस्तु यथाश्वान्महिषः पृथग्विद्यत एवम् । अतोऽसत्त्वान्नापृथग्विद्यते अन्योन्यं परेण वा किंचिदिति एवं परमार्थतत्त्वमात्मविदो ब्राह्मणा विदुः । अतोऽशिवहेतुत्वाभावादद्वयतैव शिवेत्यभिप्रायः ॥ ३४ ॥इस अद्वितीय परमार्थ सत्य आत्मामें यह प्राणादि संसारजातरूप जगत् आत्मभावसे—परमार्थ सत्यरूपसे निरूपण किये जानेपर नाना अर्थात् पृथक् वस्तुके अन्तर्भूत नहीं रहता। जिस प्रकार प्रकाशद्वारा रज्जुरूपसे निरूपित होनेपर कल्पित सर्प पृथक्-रूपसे नहीं रहता उसी प्रकार [परमार्थरूपसे निरूपण किया जानेपर जगत् आत्मासे पृथक् वस्तु नहीं ठहरता]; और न यह, रज्जु-सर्पके समान कल्पित होनेके कारण ही, अपने प्राणादिस्वरूपसे कभी कुछ रहता है।<br><br>तथा जिस प्रकार घोड़ेसे भैंस पृथक् है उस प्रकार प्राणादि वस्तु आपसमें भी पृथक् नहीं हैं। इसीलिये असद्रूप होनेसे आपसमें अथवा किसी अन्यसे कोई वस्तु अपृथक् भी नहीं है—ऐसा आत्मज्ञ ब्राह्मणलोग परमार्थतत्त्वको जानते हैं। अतः अमङ्गलके हेतुताका अभाव होनेसे अद्वयता ही मङ्गलमयी है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ३४ ॥