भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण

ते च प्राणादिभावा अप्यद्व-वे प्राणादि भाव भी अद्वय सत्यस्वरूप
येनैव सतात्मना विकल्पिताः।आत्मासे ही कल्पना किये गये हैं,
न हि निरास्पदा काचित्कल्प-क्योंकि कोई भी कल्पना निराधार
नोपलभ्यते; अतः सर्वकल्पना-नहीं हो सकती । अतः समस्त
स्पदत्वात्स्वेनात्मनाद्वयस्याव्य-कल्पनाकी आश्रयभूता होनेसे और
भिचारात्कल्पनावस्थायामप्यद्व-अपने स्वरूपसे अद्वयका कभी
यता शिवा । कल्पना एवव्यभिचार न होनेसे कल्पना अवस्था-
त्वशिवाः । रज्जुसर्पादिवत्त्रासा-में भी अद्वयता ही मङ्गलमयी है। केवल
दिकारिण्यो हि ताः । अद्वयता-कल्पना ही अमङ्गलमयी है, क्योंकि
भयातः सैव शिवा ॥ ३३ ॥वह रज्जु-सर्पादिके समान भय आदि उत्पन्न करनेवाली है । अद्वयता अभयरूपा है, इसलिये वही मङ्गलमयी है ॥ ३३ ॥

तत्त्ववेत्ताकी दृष्टिमें नानात्वका अत्यन्ताभाव है

कुतश्चाद्वयता शिवा ? नाना-और भी अद्वयता क्यों मङ्गलमयी
भूतं पृथक्त्वमन्यस्यान्यस्माद्यत्रहै ?-जहाँ एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नानाभूत पार्थक्य देखा जाता है
दृष्टं तत्राशिवं भवेत् ।वहीं अमङ्गल हो सकता है । [ किन्तु—]

नात्मभावेन नानेदं न स्वेनापि कथंचन ।
न पृथङ् नापृथक्किंचिदिति तत्त्वविदो विदुः ॥ ३४ ॥

यह नानात्व न तो आत्मस्वरूपसे है और न अपने ही पृथक् रूप में कुछ है। कोई भी वस्तु न तो ब्रह्मसे पृथक् है और न अपृथक् ही—ऐसा तत्त्ववेत्ता जानते हैं ॥ ३४ ॥