माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण
| ते च प्राणादिभावा अप्यद्व- | वे प्राणादि भाव भी अद्वय सत्यस्वरूप |
| येनैव सतात्मना विकल्पिताः। | आत्मासे ही कल्पना किये गये हैं, |
| न हि निरास्पदा काचित्कल्प- | क्योंकि कोई भी कल्पना निराधार |
| नोपलभ्यते; अतः सर्वकल्पना- | नहीं हो सकती । अतः समस्त |
| स्पदत्वात्स्वेनात्मनाद्वयस्याव्य- | कल्पनाकी आश्रयभूता होनेसे और |
| भिचारात्कल्पनावस्थायामप्यद्व- | अपने स्वरूपसे अद्वयका कभी |
| यता शिवा । कल्पना एव | व्यभिचार न होनेसे कल्पना अवस्था- |
| त्वशिवाः । रज्जुसर्पादिवत्त्रासा- | में भी अद्वयता ही मङ्गलमयी है। केवल |
| दिकारिण्यो हि ताः । अद्वयता- | कल्पना ही अमङ्गलमयी है, क्योंकि |
| भयातः सैव शिवा ॥ ३३ ॥ | वह रज्जु-सर्पादिके समान भय आदि उत्पन्न करनेवाली है । अद्वयता अभयरूपा है, इसलिये वही मङ्गलमयी है ॥ ३३ ॥ |
तत्त्ववेत्ताकी दृष्टिमें नानात्वका अत्यन्ताभाव है
| कुतश्चाद्वयता शिवा ? नाना- | और भी अद्वयता क्यों मङ्गलमयी |
| भूतं पृथक्त्वमन्यस्यान्यस्माद्यत्र | है ?-जहाँ एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नानाभूत पार्थक्य देखा जाता है |
| दृष्टं तत्राशिवं भवेत् । | वहीं अमङ्गल हो सकता है । [ किन्तु—] |
नात्मभावेन नानेदं न स्वेनापि कथंचन ।
न पृथङ् नापृथक्किंचिदिति तत्त्वविदो विदुः ॥ ३४ ॥
यह नानात्व न तो आत्मस्वरूपसे है और न अपने ही पृथक् रूप में कुछ है। कोई भी वस्तु न तो ब्रह्मसे पृथक् है और न अपृथक् ही—ऐसा तत्त्ववेत्ता जानते हैं ॥ ३४ ॥