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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
१०२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
न ह्यत्राद्वये परमार्थसत्यात्मनि प्राणादिसंसारजातमिदं जगदात्मभावेन परमार्थस्वरूपेण निरूप्यमाणं नाना वस्त्वन्तरभूतं भवति । यथा रज्जुस्वरूपेण प्रकाशेन निरूप्यमाणो न नानाभूतः कल्पितः सर्पोऽस्ति तद्वत् । नापि स्वेन प्राणाद्यात्मनेदं विद्यते कदाचिदपि रज्जुसर्पवत्कल्पितत्वादेव ।<br><br>तथान्योन्यं न पृथक्प्राणादि वस्तु यथाश्वान्महिषः पृथग्विद्यत एवम् । अतोऽसत्त्वान्नापृथग्विद्यते अन्योन्यं परेण वा किंचिदिति एवं परमार्थतत्त्वमात्मविदो ब्राह्मणा विदुः । अतोऽशिवहेतुत्वाभावादद्वयतैव शिवेत्यभिप्रायः ॥ ३४ ॥इस अद्वितीय परमार्थ सत्य आत्मामें यह प्राणादि संसारजातरूप जगत् आत्मभावसे—परमार्थ सत्यरूपसे निरूपण किये जानेपर नाना अर्थात् पृथक् वस्तुके अन्तर्भूत नहीं रहता। जिस प्रकार प्रकाशद्वारा रज्जुरूपसे निरूपित होनेपर कल्पित सर्प पृथक्-रूपसे नहीं रहता उसी प्रकार [परमार्थरूपसे निरूपण किया जानेपर जगत् आत्मासे पृथक् वस्तु नहीं ठहरता]; और न यह, रज्जु-सर्पके समान कल्पित होनेके कारण ही, अपने प्राणादिस्वरूपसे कभी कुछ रहता है।<br><br>तथा जिस प्रकार घोड़ेसे भैंस पृथक् है उस प्रकार प्राणादि वस्तु आपसमें भी पृथक् नहीं हैं। इसीलिये असद्रूप होनेसे आपसमें अथवा किसी अन्यसे कोई वस्तु अपृथक् भी नहीं है—ऐसा आत्मज्ञ ब्राह्मणलोग परमार्थतत्त्वको जानते हैं। अतः अमङ्गलके हेतुताका अभाव होनेसे अद्वयता ही मङ्गलमयी है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ३४ ॥

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०३


इस रहस्यके साक्षी कौन थे ?

तदेतत्सम्पग्दर्शनं स्तूयते—अब इस सम्यग्ज्ञानकी स्तुति की जाती है—

वीतरागभयक्रोधैर्मुनिभिर्वेदपारगैः ।

निर्विकल्पो ह्ययं दृष्टः प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः ॥ ३५ ॥

जिनके राग, भय और क्रोध निवृत्त हो गये हैं उन वेदके पारगामी मुनियोंद्वारा ही यह निर्विकल्प प्रपञ्चोपशम अद्वय तत्त्व देखा गया है ॥३५॥

विगतरागभयद्वेषक्रोधादिसर्वदोषैः सर्वदा मुनिभिर्मननशीलैर्विवेकिभिर्वेदपारगैरवगतवेदार्थतत्त्वैर्ज्ञानिभिर्निर्विकल्पः सर्वविकल्पशून्योऽयमात्मा दृष्ट उपलब्घो वेदान्तार्थतत्परैः प्रपञ्चोपशमः—प्रपञ्चो द्वैतभेदविस्तारस्तस्योपशमोऽभावो यस्मिन्स आत्मा प्रपञ्चोपशमोऽत एवाद्वयो विगतदोषैरेव पण्डितैर्वेदान्तार्थतत्परैः संन्यासिभिः परमात्मा द्रष्टुं शक्यः, नान्यै रागादिकल्लुषितचेतोभिः स्वपक्षपातिदर्शनैस्तार्किकादिभिरित्यभिप्रायः॥३५॥जिनके राग भय और क्रोधादि समस्त दोष निवृत्त हां गये हैं उन मुनियों अर्थात् सर्वदा मननशील विवेकियों और वेदके पारगामियों यानी वेदार्थके मर्मज्ञ वेदान्तार्थ-परायण तत्त्वज्ञानियोंद्वारा यह सब प्रकारके विकल्पोंसे रहित निर्विकल्प और प्रपञ्चोपशम—द्वैतरूप भेदके विस्तारका नाम प्रपञ्च है उसकी जिसमें निवृत्ति हो जाती है वह आत्मा प्रपञ्चोपशम है—इसीलिये जो अद्वय है ऐसा यह आत्मा पण्डित यानी वेदान्तार्थमें तत्पर, दोषहीन संन्यासियोंद्वारा ही देखा जा सकता है। जिनके चित्त रागादि दोषसे दूषित हैं और जिनके दर्शन अपने पक्षका आग्रह करनेवाले हैं उन अन्य तार्किकादिको इस आत्माका साक्षात्कार नहीं हो सकता—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३५ ॥
१०४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

तत्त्वदर्शनका आदेश

यस्मात्सर्वानर्थप्रशमरूपत्वादद्वयं शिवमभयम्—क्योंकि सम्पूर्ण अनर्थोंका निवृत्तिस्थान होनेसे अद्वयत्व ही मङ्गलमय और अभयरूप है—

तस्मादेवं विदित्वैनमद्वैते योजयेत्स्मृतिम् ।
अद्वैतं समनुप्राप्य जडवल्लोकमाचरेत् ॥ ३६ ॥

इसलिये इस (आत्मतत्त्व) को ऐसा जानकर अद्वैतमें मनोनिवेश करे और अद्वैततत्त्वको प्राप्त कर लोकमें जडवत् व्यवहार करे ॥ ३६ ॥

अत एवं विदित्वैनमद्वैते स्मृतिं योजयेत् । अद्वैतावगमायैव स्मृतिं कुर्यादित्यर्थः। तच्चाद्वैतमवगम्याहमस्मि परं ब्रह्मेति विदित्वाशनायाद्यतीतं साक्षादपरोक्षादजमात्मानं सर्वलोकव्यवहारातीतं जडवल्लोकमाचरेत् । अप्रख्यापयन्नात्मानमहमेवंविध इत्यभिप्रायः ॥ ३६ ॥इसलिये इसे ऐसा जानकर अद्वैतमें मनोनिवेश करे; अर्थात् अद्वैतबोधके लिये ही चिन्तन करे । और उस अद्वैतको जानकर अर्थात् 'मैं ही परब्रह्म हूँ' ऐसा ज्ञान प्राप्तकर, यानी सम्पूर्ण लोकव्यवहारसे शून्य, भोजनेच्छा आदिसे अतीत; साक्षात् अपरोक्ष अजन्मा आत्माको अनुभवकर लोकमें जडवत् आचरण करे । तात्पर्य यह है कि 'मैं ऐसा हूँ' इस प्रकार अपनेको प्रकट न करता हुआ व्यवहार करे ॥ ३६ ॥

तत्त्वदर्शीका आचरण

कया चर्यया लोकमाचरेदित्यह—लोकमें कैसे व्यवहारसे आचरण करे ? इसपर कहते हैं—

निस्तुतिर्निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च ।
चलाचलनिकेतश्च यतिर्यादृच्छिको भवेत् ॥ ३७ ॥

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०५


यतिको स्तुति नमस्कार और स्वधाकार (पैत्रकर्म) से रहित हो चल (शरीर) और अचल (आत्मा) में ही विश्राम करनेवाला होकर यादृच्छिक (अनायासलब्ध वस्तुद्वारा सन्तुष्ट रहनेवाला) हो जाना चाहिये ॥ ३७ ॥

स्तुतिनमस्कारादिसर्वकर्म-स्तुति नमस्कारादि सम्पूर्ण कर्मोंसे
वर्जितस्त्यक्तसर्वबाह्यैषणः प्रति-रहित तथा बाह्य एषणाओंका त्यागी
पन्नपरमहंसपारिव्राज्य इत्यभि-हो, अर्थात् "निश्चय इस उस
प्रायः—"एतं वै तमात्मानंआत्माको जानकर" इत्यादि श्रुति
विदित्वा" (बृ० उ० ३ । ५।१)और "जिनकी बुद्धि, आत्मा और
इत्यादिश्रुतेः; "तद्बुद्धयस्त-निष्ठा उसीमें लगी हुई हैं तथा जो
दात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः"उसीके शरणापन्न हैं" इस स्मृतिके
(गीता ५ । १७) इत्यादि-अनुसार परमहंस पारिव्राज्य भावको
स्मृतेश्च—चलं शरीरं प्रतिक्षण-प्राप्त हो—प्रतिक्षण अन्यथा भावको
मन्यथाभावात्, अचलमात्म-प्राप्त होनेवाला होनेसे 'चल' शरीर-
तत्त्वम् , यदाकदाचिद्भोजना-को कहते हैं तथा 'अचल' आत्म-
दिव्यवहारनिमित्तमाकाशवदचलंतत्त्वका नाम है—इस प्रकार जब-
स्वरूपमात्मतत्त्वमात्मनो निकेत-तब भोजनादि व्यवहारके निमित्तसे
माश्रयमात्मस्थितिं विस्मृत्याह-आकाशके समान अविचल अपने
मिति मन्यते यदा तदा चलो देहोस्वरूपभूत आत्मतत्त्वको जो अपना
निकेतो यस्य सोऽयमेवं चलाचल-निकेत यानी आश्रय है उसे अर्थात्
निकेतो विद्वान्न पुनर्बाह्यविषया-आत्मस्थितिको भूलकर जब 'मैं हूँ'
श्रयः; स च यादृच्छिको भवेत् ।इस प्रकार अभिमान करता है,
उस समय 'चल' यानी शरीर ही
जिसका निकेत है—इस प्रकार विद्वान्
चलाचलनिकेत होकर अर्थात् फिर
बाह्य विषयोंका आश्रय न करके
यादृच्छिक हो जाय; तात्पर्य यह कि

१०६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का०

यदृच्छाप्राप्तकौपीनाच्छादनग्रास- | अनायास ही प्राप्त हुए कौपीन, मात्रदेहस्थितिरित्यर्थः ॥ ३७ ॥ | आच्छादन और ग्रासमात्रसे जिसकी देहस्थिति है—ऐसा हो जाय ॥ ३७ ॥


अविचल तत्त्वनिष्ठाका विधान

तत्त्वमाध्यात्मिकं दृष्ट्वा तत्त्वं दृष्ट्वा तु बाह्यतः । तत्त्वीभूतस्तदारामस्तत्त्वादप्रच्युतो भवेत् ॥ ३८ ॥

[फिर वह विवेकी पुरुष] आध्यात्मिक तत्त्वको देखकर और बाह्य तत्त्वका भी अनुभव कर, तत्त्वीभूत और तत्त्वमें ही रमण करनेवाला होकर तत्त्वसे च्युत न हो ॥ ३८ ॥

बाह्यं पृथिव्यादितत्त्वम् आध्यात्मिकं च देहादिलक्षणं रज्जुसर्पादिवत्स्वप्नमायादिवच्च असत् "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० उ० ६ । १ । ४) इत्यादिश्रुतेः । आत्मा च सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजोऽपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्न आकाशवत्सर्वगतः सूक्ष्मोऽचलो निर्गुणो निष्कलो निष्क्रियः "तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि" (छा० उ० ६ । ८-१६) इति श्रुतेः । इत्येवं तत्त्वं दृष्ट्वा तत्त्वीभूतस्तदारामो न बाह्यरमणोपृथिवी आदि बाह्य तत्त्व और देहादिलक्षण आध्यात्मिक तत्त्व "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" इत्यादि श्रुतिके अनुसार रज्जुसर्पादिके समान एवं स्वप्न या मायाके समान मिथ्या हैं; तथा "वह सत्य है, वह आत्मा है और वही तू है" इस श्रुतिके अनुसार आत्मा बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, कारणरहित, कार्यरहित, अन्तर्बाह्यशून्य, परिपूर्ण, आकाशके समान सर्वगत, सूक्ष्म, अचल, निर्गुण, निष्कल और निष्क्रिय है। इस प्रकार तत्त्वका साक्षात्कार कर तत्त्वीभूत और उसीमें रमण करनेवाला होकर अर्थात् बाह्य-रत न होकर; जिस प्रकार मनको

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०७


यथातत्त्वदर्शी कश्चिच्चित्तमात्मत्वेन प्रतिपन्नश्चित्तचलनमनु चलितमात्मानं मन्यमानस्तत्त्वाच्चलितं देहादिभूतमात्मानं कदाचिन्मन्यते प्रच्युतोऽहमात्मतत्त्वादिदानीमिति; समाहिते तु मनसि कदाचित्तत्त्वभूतं प्रसन्नात्मानं मन्यत इदानीमस्मि तत्त्वीभूत इति; न तथात्मविद्भवेत् । आत्मन एकरूपत्वात्स्वरूपप्रच्यवनासम्भवाच्च । सदैव ब्रह्मास्मीत्यप्रच्युतो भवेत्तत्त्वात्सदाऽप्रच्युतात्मतत्त्वदर्शनो भवेदित्यभिप्रायः “शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः” (गीता १२।१८) “समं सर्वेषु भूतेषु” ( गीता १३ । २७ ) इत्यादिस्मृतेः ॥३८॥ही आत्मा माननेवाला कोई अतत्त्वदर्शी पुरुष किसी समय चित्तके चञ्चल होनेपर आत्माको भी चलायमान मानकर अपनेको तत्त्वसे विचलित और देहादिरूप समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्वसे च्युत हो गया हूँ तथा किसी समय चित्तके समाहित होनेपर अपनेको तत्त्वीभूत और प्रसन्न समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्वस्थ हूँ उसी प्रकार आत्मवेत्ताको न हो जाना चाहिये; क्योंकि आत्मा सर्वदा एकरूप है और उसका स्वरूपसे च्युत होना भी सम्भव नहीं है। अतः वह सदा ही “मैं ब्रह्म हूँ” ऐसा निश्चयकर तत्त्वसे च्युत न हो; तात्पर्य यह कि सदा ही अच्युत आत्मदर्शी हो, जैसा कि “कुत्ते और चाण्डालमें भी विद्वानोंकी समान दृष्टि होती है” तथा “सम्पूर्ण भूतोंमें समान भावसे स्थित” आदि स्मृतियोंसे प्रमाणित होता है ॥३८॥

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रभाष्ये वैतथ्याख्यं द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥

३. तृतीय प्रकरण — अद्वैतप्रकरण (४८ कारिकाएँ)

अद्वैतप्रकरण


| ओङ्कारनिर्णय उक्तः प्रपञ्चो-<br>पशमः शिवोऽद्वैत आत्मेति<br>प्रतिज्ञामात्रेण । ज्ञाते द्वैतं न<br>विद्यत इति च । तत्र द्वैताभावस्तु<br>वैतथ्यप्रकरणेन स्वप्नमायागन्ध-<br>र्वनगरादिदृष्टान्तैर्दृश्यत्वादद्यन्त-<br>वत्त्वादिहेतुभिस्तर्केण च प्रति-<br>पादितः । अद्वैतं किमागममात्रेण<br>प्रतिपत्तव्यमाहोस्वित्तर्केणापीत्यत<br>आह-शक्यते तर्केणापि ज्ञातुम् ;<br>तत्कथमित्यद्वैतप्रकरणमारभ्यते ।<br>उपास्योपासनादिभेदजातं सर्वं<br>वितथं केवलश्चात्माद्वयः परमार्थ<br>इति स्थितमतीते प्रकरणे; यतः— | [ आगमप्रकरणमें ] ओङ्कारका<br>निर्णय करते समय यह बात केवल<br>प्रतिज्ञामात्रसे कही है कि आत्मा<br>प्रपञ्चका निवृत्तिस्थान शिव, और<br>अद्वैतस्वरूप है तथा ज्ञान हो जाने-<br>पर द्वैत नहीं रहता । फिर वैतथ्य-<br>प्रकरणमें स्वप्न, माया और गन्धर्व-<br>नगरादिके दृष्टान्तोंसे दृश्यत्व एवं<br>आदि-अन्तवत्त्व आदि हेतुओं‌द्वारा<br>तर्कसे भी द्वैतके अभावका प्रतिपादन<br>किया गया । किन्तु वह अद्वैत क्या<br>शास्त्रमात्रसे ही ज्ञातव्य है अथवा<br>तर्कसे भी जाना जा सकता है ?<br>इसपर कहते हैं—तर्कसे भी जाना<br>जा सकता है । सो किस प्रकार ?<br>इसी बातको बतलानेके लिये अद्वैत<br>प्रकरणका आरम्भ किया जाता है ।<br>उपास्य और उपासना आदि सम्पूर्ण<br>भेद मिथ्या है, केवल आत्मा ही अद्वय<br>परमार्थस्वरूप है—यह बात पिछले<br>प्रकरणमें निश्चित हुई है; क्योंकि— |

भेददर्शी कृपण है

उपासनाश्रितो धर्मो जाते ब्रह्मणि वर्तते ।
प्रागुत्पत्तेरजं सर्वं तेनासौ कृपणः स्मृतः ॥ १ ॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १०९


उपासनाका आश्रय लेनेवाला जीव कार्य ब्रह्ममें ही रहता है [ अर्थात् उसे ही अपना उपास्य मानता है, और समझता है कि ] उत्पत्तिसे पूर्व ही सब अज [ अर्थात् अजन्मा ब्रह्मस्वरूप ] था । इसलिये वह कृपण ( दीन ) माना गया है ॥ १ ॥

उपासनाश्रित उपासनामात्मनो मोक्षसाधनत्वेन गत उपासकोऽहं ममोपास्यं ब्रह्म । तदुपासनं कृत्वा जाते ब्रह्मणीदानीं वर्तमानोऽजं ब्रह्म शरीरपातादूर्ध्वं प्रतिपत्स्ये प्रागुत्पत्तेश्चाजमिदं सर्वमहं च । यदात्मकोऽहं प्रागुत्पत्तेरिदानीं जातो जाते ब्रह्मणि च वर्तमान उपासनया पुनस्तदेव प्रतिपत्स्य इत्येवमुपासनाश्रितो धर्मः साधको येनैवं क्षुद्रब्रह्मवित्तेनासौ कारणेन कृपणो दीनोऽल्पकः स्मृतो नित्याजब्रह्मदर्शिभिरित्यभिप्रायः।<br><br>“यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते” (के० उ० १।४)<br>इत्यादिश्रुतेस्तलवकाराणाम् ॥१॥‘उपासनाश्रितः’—उपासनाको अपने मोक्षके साधनरूपसे माननेवाला पुरुष अर्थात् ‘मैं उपासक हूँ, और ब्रह्म मेरा उपास्य है। उसकी उपासना करके इस समय कार्यब्रह्ममें रहता हुआ शरीरपातके अनन्तर मैं अजन्मा ब्रह्मको प्राप्त हो जाऊँगा तथा उत्पत्तिके पूर्व भी यह सब और मैं अजरूप ही थे । उत्पत्तिसे पूर्व मैं जैसा था अब उत्पन्न होकर जातब्रह्ममें वर्तमान हुआ अन्तमें उपासनाद्वारा मैं फिर उसी रूपको प्राप्त हो जाऊँगा’—इस प्रकार उपासनाका आश्रय लेनेवाला साधक जीव क्योंकि क्षुद्रब्रह्मवेत्ता है, इस कारणसे ही यह सर्वदा अजन्मा-ब्रह्मका दर्शन करनेवाले महात्माओं-द्वारा कृपण—दीन अर्थात् क्षुद्र माना गया है—यह इसका अभिप्राय है; जैसा कि “जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि जिससे वाणी प्रकट होती है, वही ब्रह्म है—ऐसा जान; जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है” इत्यादि तलवकार-श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ १ ॥
११०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अकार्पण्यनिरूपणकी प्रतिज्ञा

सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मानं प्रतिपत्तुमशक्नुवन्नविद्यया दीनमात्मानं मन्यमानो जातोऽहं जाते ब्रह्मणि वर्ते तदुपासनाश्रितः सन्ब्रह्म प्रतिपत्स्य इत्येवं प्रतिपन्नः कृपणो भवति यस्मात्—बाहर और भीतर वर्तमान अजन्मा आत्माको प्राप्त करनेमें असमर्थ होनेके कारण अविद्यावश अपनेको दीन माननेवाला पुरुष, क्योंकि 'मैं उत्पन्न हुआ हूँ, उत्पन्न हुए ब्रह्ममें ही वर्तमान हूँ और उनकी उपासनाका आश्रय लेकर ही ब्रह्मको प्राप्त होऊँगा', इस प्रकार माननेके कारण दीन है—

अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतम् ।
यथा न जायते किंचिज्जायमानं समन्ततः ॥ २ ॥

इसलिये अब मैं सर्वत्र समताभावको प्राप्त जन्मरहित अकृपणभाव (अजन्मा ब्रह्म) का वर्णन करता हूँ [जिससे यह समझने में आ जायगा कि] किस प्रकार सब ओर उत्पन्न होनेपर भी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ ॥२॥

अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमकृपणभावमजं ब्रह्म। तद्धि कार्पण्यास्पदम् “यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं मर्त्यमसन्” (छा० उ० ७।२४।१) “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तद्विपरीतं सबाह्याभ्यन्तरमजमकार्पण्यं भूमा-इसलिये मैं अकार्पण्य अकृपणभाव अर्थात् अजन्मा ब्रह्मका वर्णन करता हूँ । “जहाँ अन्य अन्यको देखता है, अन्यको सुनता है और अन्यको ही जानता है वह अल्प है वह मरणशील और असत् है” “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार उपर्युक्त जातब्रह्म तो कृपणताका ही आश्रय है । उससे विपरीत बाहर-भीतर वर्तमान अजन्मा भूमासंज्ञक
शां० भा० ]अद्वैतप्रकरण१११
ख्यं ब्रह्म । यत्प्राप्याविद्याकृत-सर्वकार्पण्यनिवृत्तिस्तदकार्पण्यं वक्ष्यामीत्यर्थः ।ब्रह्म अकार्पण्यरूप है, जिसे प्राप्त होनेपर अविद्याकृत सम्पूर्ण कृपणताकी निवृत्ति हो जाती है; उस कृपण भावसे रहित ब्रह्मका मैं वर्णन करूँगा—यह इसका तात्पर्य है ।
तदजाति, अविद्यमाना जातिरस्य समतां गतं सर्वसाम्यं गतम् । कस्मात् ? अवयववैषम्याभावात् । यद्धि सावयवं वस्तु तदवयववैषम्यं गच्छज्जायत इत्युच्यते । इदं तु निरवयवत्वात्समतां गतमिति न कैश्चिदवयवैः स्फुटत्यतोऽजात्यकार्पण्यम् । समन्ततः समन्ताद्यथा न जायते किंचिदल्पमपि न स्फुटति रज्जुसर्पवदविद्याकृतदृष्ट्या जायमानं येन प्रकारेण न जायते सर्वतोऽजमेव ब्रह्म भवति तथा तं प्रकारं शृण्वित्यर्थः ॥२॥वह अजाति अर्थात् जिसकी जाति न हो और समताको प्राप्त अर्थात् सबकी समानताको प्राप्त है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि उसमें अवयवोंकी विषमताका अभाव है । जो वस्तु सावयव होती है वह अवयवोंकी विषमताको प्राप्त होनेके कारण 'उत्पन्न होती है' ऐसे कही जाती है । किन्तु यह ब्रह्म तो निरवयव होनेके कारण समताको प्राप्त है, इसलिये किन्हीं भी अवयवोंके रूपमें प्रस्फुटित नहीं होता । अतः यह सब ओरसे अजाति अर्थात् अकार्पण्यरूप है । जिस प्रकार कि कुछ भी उत्पन्न नहीं होता अर्थात् रज्जु-सर्पके समान आविद्यकदृष्टिसे उत्पन्न होता हुआ भी जिस प्रकार उत्पन्न नहीं होता—सब ओर अजन्मा ब्रह्म ही रहता है उस प्रकारको श्रवण करो—यह इसका अभिप्राय है ॥ २ ॥

११२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०

जीवकी उत्पत्तिके विषयमें दृष्टान्त

अजाति ब्रह्माकार्पण्यं वक्ष्या-<br>मीति प्रतिज्ञातम् । तत्सिद्धयर्थं<br>हेतुं दृष्टान्तं च वक्ष्यामीत्याह—मैं अजन्मा ब्रह्मका जो कृपण-<br>भावसे रहित है, वर्णन करता हूँ—<br>ऐसी प्रतिज्ञा की है। उसकी सिद्धिके<br>लिये हेतु और दृष्टान्त भी बतलाता<br>हूँ—इस अभिप्रायसे कहते हैं—

आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः । घटादिवच्च संघातैर्जातावेतन्रिदर्शनम् ॥ ३ ॥

आत्मा आकाशके समान है; वह घटाकाशोंके समान जीवरूपसे उत्पन्न हुआ है । तथा [ मृत्तिकासे ] घटादिके समान देहसंघातरूपसे भी उत्पन्न हुआ कहा जाता है । आत्माकी उत्पत्तिके विषयमें यही दृष्टान्त है ॥ ३ ॥

आत्मा परो हि यस्मादाकाश-<br>वत्सूक्ष्मो निरवयवः सर्वगतः<br>आकाशवदुक्तो जीवैः क्षेत्रज्ञैर्घटा-<br>काशैरिव घटाकाशतुल्य उदितः<br>उक्तः स एवाकाशसमः पर<br>आत्मा ।क्योंकि परमात्मा ही आकाशवत्<br>अर्थात् आकाशके समान सूक्ष्म<br>निरवयव और सर्वगत कहा गया है<br>और वही घटाकाशसदृश - क्षेत्रज्ञ<br>जीवोंके रूपमें उत्पन्न हुआ कहा<br>गया है, इसलिये वह परमात्मा ही,<br>आकाशके समान है ।
अथ वा घटाकाशैर्यथाकाश<br>उदित उत्पन्नस्तथा परो जीवात्म-<br>भिरुत्पन्नः । जीवात्मनां परस्मा-<br>दात्मन उत्पत्तिर्या श्रूयते वेदान्तेषुअथवा यों समझो कि जिस<br>प्रकार घटाकाशोंके रूपमें आकाश<br>उत्पन्न हुआ है उसी प्रकार परमात्मा<br>जीवात्माओंके रूपसे उत्पन्न हुआ<br>है । तात्पर्य यह है कि वेदान्तोंमें<br>जो परमात्मासे जीवात्माओंकी उत्पत्ति

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११३


सा महाकाशाद्धटाकाशोत्पत्तिसमा न परमार्थत इत्यभिप्रायः । <br><br> तस्मादेवाकाशाद्धटादयः संघाता यथोत्पद्यन्त एवमाकाशस्थानीयात्परमात्मनः पृथिव्यादिभूतसंघाता आध्यात्मिकाश्च कार्यकारणलक्षणा रज्जुसर्पवद्विकल्पिता जायन्ते । अत उच्यते घटादिवच्च संघातैरुदित इति । यदा मन्दबुद्धिप्रतिपिपादयिषया श्रुत्यात्मनो जातिरुच्यते जीवादीनां तदा जातावुपगम्यमानायामेतन्निदर्शनं दृष्टान्तो यथोदिताकाशवदित्यादिः ॥ ३ ॥सुनी जाती है वह महाकाशसे घटाकाशोंकी उत्पत्तिके समान है, परमार्थतः नहीं । <br><br> उसी आकाशसे जिस प्रकार घट आदि संघात उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार आकाशस्थानीय परमात्मासे रज्जुमें सर्पके समान विकल्पित हुए पृथिवी आदि भूतसंघात और शरीर तथा इन्द्रियरूप आध्यात्मिकभाव उत्पन्न होते हैं । इसीसे कहा जाता है—घटादिके समान देहादिसंघातरूपसे भी उदित हुआ है । जिस समय मन्दबुद्धि पुरुषोंके प्रति प्रतिपादन करनेकी इच्छासे श्रुतिने आत्मासे जीवादिकी उत्पत्तिका वर्णन किया है उस समय उनकी उत्पत्ति माननेमें यह उपर्युक्त आकाशादिके समान ही निदर्शन-दृष्टान्त है ॥३॥

जीवके विलीन होनेमें दृष्टान्त

घटादिषु प्रलीनेषु घटाकाशादयो यथा ।
आकाशे संप्रलीयन्ते तद्वज्जीवा इहात्मनि ॥ ४ ॥

घटादिके लीन होनेपर जिस प्रकार घटाकाशादि महाकाशमें लीन हो जाते हैं उसी प्रकार जीव इस आत्मामें विलीन हो जाते हैं ॥ ४ ॥

यथा घटाद्युत्पत्त्या घटाकाशाद्युत्पत्तिः; यथा वा घटादिप्रलयेजिस प्रकार घटादिकी उत्पत्तिसे घटाकाशादिकी उत्पत्ति होती है और जिस प्रकार घटादिके नाशसे घटा-

१५-१६

११४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


घटाकाशादिप्रलयस्तद्वद्देहादि-काशादिका नाश होता है उसी प्रकार देहादि * संघातकी उत्पत्तिसे जीवकी उत्पत्ति होती है और उनका लय होनेपर जीवोंका इस आत्मामें लय हो जाता है । तात्पर्य यह है कि स्वतः उनका लय नहीं होता॥४॥
संघातोत्पत्त्या जीवोत्पत्तिस्त-
त्प्रलये च जीवानामिहात्मनि
प्रलयो न स्वत इत्यर्थः ॥ ४ ॥

आत्माकी असङ्गतामें दृष्टान्त

सर्वदेहेष्वात्मैकत्व एकस्मि-सम्पूर्ण देहोंमें एक ही आत्मा होनेपर तो एक आत्माके जन्म-मरण और सुख-दुःखादिमान् होनेपर सभीको उसका सम्बन्ध होगा तथा कर्म और फलकी संकरता हो जायगी [अर्थात् कर्म किसीका होगा और उसका फल कोई और ही भोगेगा] इस प्रकार जो द्वैतवादी कहते हैं उनके प्रति कहा जाता है—
ञ्जनन मरणसुखादिमत्यात्मनि
सर्वात्मनां तत्सम्बन्धः क्रियाफल-
साङ्कर्यं च स्यादिति य आहुद्वैति-
नस्तान्प्रतीदमुच्यते—

यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमादिभिर्युते ।
न सर्वे संप्रयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभिः ॥ ५ ॥

जिस प्रकार एक घटाकाशके धूलि और धुएँ आदिसे युक्त होनेपर समस्त घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुखादि धर्मोंसे लिप्त नहीं होते । [अर्थात् एक जीवके सुखादिमान् होनेपर सब जीव सुखादिमान् नहीं हो जाते ] ॥ ५ ॥


* यहाँ 'देह' शब्दसे लिङ्ग-देह समझना चाहिये, क्योंकि जीवत्वका नाश लिङ्ग-देहके नाशसे ही हो सकता है, स्थूल देहके नाशसे नहीं ।

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११५


यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमा-<br>दिभिर्युते संयुक्ते न सर्वे घटा-<br>काशादयस्तद्रजोधूमादिभिः<br>संयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभिः।<br><br>नन्वेक एवात्मा ?<br>बाढम्; ननु न श्रुतं त्वया-<br>काशवत्सर्वसंघातेष्वेक एवात्मेति ?<br><br>यद्येक एवात्मा तर्हि सर्वत्र सुखी दुःखी च स्यात् ।<br><br>न चेदं सांख्यचोद्यं सम्भवति ।<br><br>(आत्मैकत्वे सांख्याक्षेप-निवृत्तिः)<br>न हि सांख्य आत्मनः सुखदुःखादिमत्त्वमिच्छति बुद्धिसमवायाभ्युपगमात्सुखदुःखादीनाम् । न चोपलब्धिस्वरूपस्यात्मनो भेदकल्पनायां प्रमाणमस्ति ।<br><br>भेदाभावे प्रधानस्य परार्थ्यानुपपत्तिरिति चेत्, न; प्रधानकृतस्यार्थस्यात्मन्यसमवायात् । यदि हि प्रधानकृतो बन्धो मोक्षो वार्थः पुरुषेषु भेदेन समवैतिजिस प्रकार एक घटाकाशके धूलि और धुएँसे युक्त होनेपर समस्त घटाकाशादि उस धूलि और धुएँसे संयुक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुखादिसे लिप्त नहीं होते ।<br><br>पूर्व०—आत्मा तो एक ही है न ?<br>सिद्धान्ती—हाँ, क्या तूने यह नहीं सुना कि सम्पूर्ण संघातोंमें आकाशके समान व्याप्त एक ही आत्मा है ?<br><br>पूर्व०—यदि आत्मा एक ही है तो वह सर्वत्र सुखी-दुःखी होगा ।<br><br>सिद्धान्ती—सांख्यवादीकी यह आपत्ति सम्भव नहीं है । सांख्य आत्माका सुख-दुःखादिमत्त्व स्वीकार नहीं करता, क्योंकि सुख-दुःखादि तो बुद्धिसमवेत माने गये हैं तथा इसके सिवा अनुभवस्वरूप आत्माकी भेद-कल्पनामें कोई प्रमाण भी नहीं है ।<br><br>यदि कहो कि भेद न होनेपर तो प्रधानकी परार्थता भी सम्भव नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि प्रधानद्वारा सम्पादित कार्यका आत्माके साथ सम्बन्ध नहीं है। यदि प्रधानकर्तृक बन्ध या मोक्ष पुरुषोंमें पृथक्-पृथक्रूपसे समवेत
११६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
ततः प्रधानस्य परार्थ्यमात्मैकत्वे नोपपद्यत इति युक्ता पुरुषभेदकल्पना । न च सांख्यैर्बन्धो मोक्षो वार्थः पुरुषसमवेतोऽभ्युपगम्यते । निर्विशेषाश्च चेतनमात्रा आत्मानोऽभ्युपगम्यन्ते । अतः पुरुषसत्तामात्रप्रयुक्तमेव प्रधानस्य परार्थ्यं सिद्धं न तु पुरुषभेदप्रयुक्तमिति । अतः पुरुषभेदकल्पनायां न प्रधानस्य परार्थ्यं हेतुः ।होते तो आत्माका एकत्व माननेमें प्रधानकी परार्थता सम्भव नहीं हो सकती थी और तब पुरुषोंके भेदकी कल्पना करनी ठीक थी । किन्तु सांख्यवादी तो बन्ध या मोक्षको पुरुषसे सम्बद्ध ही नहीं मानते; वे तो आत्माओंको निर्विशेष और चेतनमात्र ही मानते हैं । अतः प्रधानकी परार्थता तो केवल पुरुषकी सत्तामात्रसे ही सिद्ध है, पुरुषोंके भेदके कारण नहीं । इसलिये पुरुषोंकी भेदकल्पनामें प्रधानकी परार्थता कारण नहीं है ।
न चान्यत्पुरुषभेदकल्पनायां प्रमाणमस्ति सांख्यानाम् । परसत्तामात्रमेव चैतन्निमित्तीकृत्य स्वयं बध्यते मुच्यते च प्रधानम् । परश्चोपलब्धिमात्रसत्तास्वरूपेण प्रधानप्रवृत्तौ हेतुर्न केनचिद्विशेषेणेति केवलमूढतयैव पुरुषभेदकल्पना वेदार्थपरित्यागश्च ।इसके सिवा सांख्यवादियोंके पास पुरुषोंका भेद माननेमें और कोई प्रमाण नहीं है । पर-( आत्मा ) की सत्तामात्रको ही निमित्त बनाकर प्रधान स्वयं बन्ध और मोक्षको प्राप्त होता है और वह पर केवल उपलब्धिमात्र सत्तास्वरूपसे ही प्रधानकी प्रवृत्तिमें हेतु है, किसी विशेषताके कारण नहीं । अतः केवल मूढ़तासे ही पुरुषोंकी भेदकल्पना और वेदार्थका परित्याग किया जाता है ।

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११७


[वैशेषिकमत-समीक्षा]

ये त्वाहुर्वैशेषिकादय इच्छादय आत्मसमवायिन इति; तदप्यसत् । स्मृतिहेतूनां संस्काराणामप्रदेशवत्यात्मन्यसमवायात् । आत्ममनःसंयोगाच्च स्मृत्युत्पत्तेः स्मृतिनियमानुपपत्तिः । युगपद्वा सर्वस्मृत्युत्पत्तिप्रसङ्गः ।इसके सिवा वैशेषिकादि मतावलम्बी जो कहते हैं कि इच्छा आदि आत्माके धर्म हैं, सो उनका यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्मृतिके हेतुभूत संस्कारोंका प्रदेशहीन (निरवयव) आत्मासे समवाय सम्बन्ध नहीं हो सकता । यदि आत्मा और मनके संयोगसे स्मृतिकी उत्पत्ति मानी जाय तो स्मृतिका कोई नियम ही सम्भव नहीं है अथवा एक साथ ही सम्पूर्ण स्मृतियोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । *
[मन आदिभिः आत्मसंयोगानुपपत्तिः]<br><br>न च भिन्नजातीयानां स्पर्शादिहीनानामात्मनां मन आदिभिः संबन्धो युक्तः । न च द्रव्याद्रूपादयो गुणाः कर्मसामान्यविशेषसमवाया वा भिन्नाः सन्ति परेषाम् । यदिइसके सिवा स्पर्शादिसे रहित भिन्नजातीय आत्माओंका मन आदिके साथ सम्बन्ध मानना ठीक भी नहीं है । तथा दूसरोंके मतमें द्रव्यसे रूप आदि उसके गुण एवं कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय भिन्न भी नहीं हैं । † यदि दूसरोंके मतमें

* उस समय ऐसा नियम नहीं हो सकेगा कि वस्तुके प्रत्यक्ष अनुभवके समय उसकी स्मृति न हो, क्योंकि स्मृतिका असमवायी कारण आत्मा और मनका संयोग तो अनुभवकालमें भी है ही । इसके सिवा असमवायी कारणकी तुल्यताके कारण एक साथ समस्त स्मृतियोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग भी उपस्थित हो जायगा । यदि कहो कि स्मृतिके संस्कारोंका उद्बोध न होनेके कारण एक साथ स्मृति नहीं हो सकती तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि संस्कार और उनका उद्बोध ये दोनों आत्मामें ही रहते हैं—इस विषयमें उनका एक मत नहीं है । इसलिये इनकी गणना स्मृतिकी सामग्रीके अन्तर्गत नहीं हो सकती ।
† वैशेषिक मतमें साधारणतया द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय ये छः प्रकारके भाव पदार्थ हैं । उनमें द्रव्य उसे कहते हैं जिसके साथ

११८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
ह्यत्यन्तभिन्ना एव द्रव्यात्स्यु-वे इच्छा आदि द्रव्यसे तथा आत्मासे अत्यन्त भिन्न ही हों तो ऐसा होनेपर तो द्रव्यके साथ उनका सम्बन्ध ही सिद्ध नहीं हो सकता।
रिच्छादयश्चात्मनस्तथा च सति
द्रव्येण तेषां सम्बन्धानुपपत्तिः ।
अयुतसिद्धानां समवायलक्षणःयदि कहो कि अयुतसिद्ध¹ पदार्थों- का समवाय-सम्बन्ध माननेमें विरोध नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं;* क्योंकि इच्छा आदि अनित्य धर्मोंसे नित्य आत्मा पूर्वसिद्ध होनेके कारण उनका परस्पर अयुतसिद्धत्व सम्भव नहीं है। यदि इच्छा आदि आत्माके साथ अयुतसिद्ध हों तो आत्मगत महत्त्वके समान उनकी भी नित्यता- का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । और यह बात इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे आत्माके अनिर्मोक्षका प्रसङ्ग आ जाता है ।
संबन्धो न विरुध्यत इति चेत्,
न । इच्छादिभ्योऽनित्येभ्य
आत्मनो नित्यस्य पूर्वसिद्धत्वा-
न्नायुतसिद्धत्वोपपत्तिः। आत्मना-
युतसिद्धत्वे चेच्छादीनामात्म-
गतमहत्त्ववन्नित्यत्वप्रसङ्गः । स
चानिष्टः । आत्मनोऽनिर्मोक्ष-
प्रसङ्गात् ।
समवायस्य च द्रव्यादन्यत्वे सति द्रव्येण सम्बन्धान्तरं वाच्यंयदि समवाय द्रव्यसे भिन्न है तो द्रव्यके साथ उसका कोई अन्य

गुण एवं क्रिया आदि समवाय-सम्बन्धसे रहें। गुण—रूप, रस एवं गन्ध आदिको कहते हैं। कर्म—गमनादि क्रिया। सामान्य—जाति, मनुष्यत्व, पशुत्वादि। विशेष—परमाणुओंका परस्पर भेद करनेवाला धर्म, जिसके कारण विभिन्न प्रकारके परमाणुओंसे विभिन्न प्रकारका कार्य उत्पन्न होता है। समवाय—एक प्रकारका सम्बन्ध जैसा कि गुण एवं क्रिया आदिका द्रव्यके साथ है।

१. जो पदार्थ परस्पर मिलकर सिद्ध हुए हों।

* अयुतसिद्धत्वमें चार पक्ष हैं—१ अभिन्नकालमें होना; २ अभिन्न देशमें होना; ३ अभिन्न स्वभाववाले होना; ४ संयोग और वियोगकी अयोग्यतावाले होना। उनमेंसे प्रथम पक्षका खण्डन करते हैं—

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११९


[आत्मनो व्यावहारिकबन्धमोक्षाद्युपपादनम्]
यथा द्रव्यगुणयोः । समवायो नित्यसम्बन्ध एवेति न वाच्यमिति चेत्तथा च समवायसम्बन्धवतां नित्यसम्बन्धप्रसङ्गात्पृथक्त्वानुपपत्तिः । अत्यन्तपृथक्त्वे च द्रव्यादीनां स्पर्शवदस्पर्शद्रव्ययोरिव षष्ठ्यर्थानुपपत्तिः ।सम्बन्ध बतलाना चाहिये, जैसा कि द्रव्य और गुणका है। और यदि कोई कहे कि समवाय तो नित्य सम्बन्ध ही है, इसलिये उसके साथ कोई सम्बन्ध बतलानेकी आवश्यकता नहीं है तो ऐसी अवस्थामें समवायसम्बन्धवालोंका नित्यसम्बन्ध होनेके कारण उनकी पृथक्ता सम्भव नहीं है। और यदि द्रव्यादिको परस्पर अत्यन्त भिन्न माना जाय तो जिस प्रकार स्पर्शवान् और स्पर्शहीन द्रव्योंमें परस्पर सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है उसी प्रकार उसका सम्बन्ध ही नहीं हो सकता।
इच्छाद्युपजनापायवद्गुणवत्त्वे चात्मनोऽनित्यत्वप्रसङ्गः । देहफलादिवत्सावयवत्वं विक्रियावत्त्वं च देहादिवदेवेति दोषावपरिहार्यौ ।यदि आत्माको इच्छादि उत्पत्ति-विनाशशील गुणोंवाला माना जाय तो उसकी अनित्यताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। तथा उसके देह और फलादिके समान सावयवत्व एवं देहादिके समान ही विक्रियावत्त्व—ये दो दोष भी अपरिहार्य ही होंगे।
यथा त्वाकाशस्याविद्याध्यारोपितरजोधूममलवत्तादिदोषवत्त्वं तथात्मनोऽविद्याध्यारोपितबुद्ध्याद्युपाधिकृतसुखदुःखादिदोषवत्त्वे बन्धमोक्षादयो व्यावहारिका न विरुध्यन्ते । सर्ववादिभिरविद्या-जिस प्रकार कि आकाशका अविद्याध्यारोपित घटादिउपाधियोंके कारण ही धूलि, धूम और मलसे युक्त होना है उसी प्रकार आत्माका भी, अविद्यासे आरोपित बुद्धि आदि उपाधिके कारण सुख-दुःखादि दोषसे युक्त होनेपर, व्यावहारिक बन्ध, मोक्ष आदि होनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि सभी वादियोंने
१२०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| कृतव्यवहाराभ्युपगमात्परमार्था- | व्यवहारको अविद्याकृत माना है, | | नभ्युपगमाच्च । तस्मादात्मभेद- | परमार्थरूप नहीं माना । अतः | | परिकल्पना वृथैव तार्किकैः | तार्किकलोग जीवोंके भेदकी कल्पना | | क्रियत इति ॥ ५ ॥ | वृथा ही करते हैं ॥ ५ ॥ |

व्यावहारिक जीवभेद

| कथं पुनरात्मभेदनिमित्त इव | किन्तु एक ही आत्मामें, आत्माओं- | | व्यवहार एकस्मिन्नात्मन्यविद्या- | के भेदके कारण होनेवालेके समान, | | कृत उपपद्यत इति, उच्यते— | अविद्याकृत व्यवहार किस प्रकार | | | सम्भव है ? इसपर कहते हैं— |

रूपकार्यसमाख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै ।
आकाशस्य न भेदोऽस्ति तद्वज्जीवेषु निर्णयः ॥ ६ ॥

[घटादि उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले] भिन्न-भिन्न आकाशोंके रूप, कार्य और नामोंमें तो भेद है, परन्तु आकाशमें तो कोई भेद नहीं है । उसी प्रकार जीवोंके विषयमें भी निश्चय समझना चाहिये ॥ ६ ॥

| यथेहाकाश एकस्मिन्घटकर- | जिस प्रकार इस एक ही | | कापवरकाद्याकाशानामल्पत्वम- | आकाशमें घट, कमण्डलु और मठादि | | हत्त्वादिरूपाणि भिद्यन्ते तथा | आकाशोंके अल्पत्व-महत्त्वादि रूपोंमें | | कार्यमुदकाहरणधारणशयनादि- | भेद है, तथा जहाँ-तहाँ व्यवहारमें | | समाख्याश्च घटाकाशकरकाकाश | उनके किये हुए जल लाना, जल | | इत्याद्यास्तत्कृताश्च भिन्ना दृश्यन्ते । | धारण करना और शयन करना | | तत्र तत्र वै व्यवहारविषय | आदिकार्य एवं घटाकाश करकाकाश | | इत्यर्थः। सर्वोऽयमाकाशे रूपादि- | आदि नाम भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। | | भेदकृतो व्यवहारो न परमार्थ | किन्तु आकाशमें रूपादिके कारण | | | होनेवाला यह सब व्यवहार पार- |

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२१


एव । परमार्थतस्त्वाकाशस्य न भेदोऽस्ति । न चाकाशभेदनिमित्तो व्यवहारोऽस्त्यन्तरेण परोपाधिकृतं द्वारम् । यथैतत्त्वद्देहोपाधिभेदकृतेषु जीवेषु घटाकाशस्थानीयेष्वात्मसु निरूपणात्कृतो बुद्धिमद्भिर्निर्णयो निश्चय इत्यर्थः ॥ ६ ॥मार्थिक ही नहीं हैं। परमार्थतः तो आकाशका कोई भेद नहीं है। अन्य उपाधिकृत निमित्तके सिवा वस्तुतः आकाशके भेदके कारण होनेवाला कोई व्यवहार है ही नहीं। जैसा कि यह [ आकाशका भेद ] है उसी प्रकार देहादि उपाधिके भेदसे किये हुए घटाकाशस्थानीय जीवोंमें भेदका निरूपण किया जानेके कारण बुद्धिमानोंने [ उस भेदका अपारमार्थिकत्व ] निश्चय किया है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ६ ॥

जीव आत्माका विकार या अवयव नहीं है

ननु तत्र परमार्थकृत एव घटाकाशादिषु रूपकार्यादिभेदव्यवहार इति ? नैतदस्ति, यस्मात्किन्तु घटाकाशादिमें जो रूप और कार्य आदिका भेद-व्यवहार है वह तो वास्तविक ही है ? [ ऐसी शंका होनेपर कहते हैं—] यह बात नहीं है, क्योंकि—

नाकाशस्य घटाकाशो विकारावयवौ यथा ।

नैवात्मनः सदा जीवो विकारावयवौ तथा ॥ ७ ॥

जिस प्रकार घटाकाश आकाशका विकार या अवयव नहीं है उसी प्रकार जीव भी आत्माका विकार या अवयव कभी नहीं है ॥ ७ ॥

परमार्थाकाशस्य घटाकाशो न विकारः; यथा सुवर्णस्यपरमार्थाकाशका घटाकाश न तो विकार है, जैसे कि सुवर्णके रुचकादि