भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०७


यथातत्त्वदर्शी कश्चिच्चित्तमात्मत्वेन प्रतिपन्नश्चित्तचलनमनु चलितमात्मानं मन्यमानस्तत्त्वाच्चलितं देहादिभूतमात्मानं कदाचिन्मन्यते प्रच्युतोऽहमात्मतत्त्वादिदानीमिति; समाहिते तु मनसि कदाचित्तत्त्वभूतं प्रसन्नात्मानं मन्यत इदानीमस्मि तत्त्वीभूत इति; न तथात्मविद्भवेत् । आत्मन एकरूपत्वात्स्वरूपप्रच्यवनासम्भवाच्च । सदैव ब्रह्मास्मीत्यप्रच्युतो भवेत्तत्त्वात्सदाऽप्रच्युतात्मतत्त्वदर्शनो भवेदित्यभिप्रायः “शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः” (गीता १२।१८) “समं सर्वेषु भूतेषु” ( गीता १३ । २७ ) इत्यादिस्मृतेः ॥३८॥ही आत्मा माननेवाला कोई अतत्त्वदर्शी पुरुष किसी समय चित्तके चञ्चल होनेपर आत्माको भी चलायमान मानकर अपनेको तत्त्वसे विचलित और देहादिरूप समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्वसे च्युत हो गया हूँ तथा किसी समय चित्तके समाहित होनेपर अपनेको तत्त्वीभूत और प्रसन्न समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्वस्थ हूँ उसी प्रकार आत्मवेत्ताको न हो जाना चाहिये; क्योंकि आत्मा सर्वदा एकरूप है और उसका स्वरूपसे च्युत होना भी सम्भव नहीं है। अतः वह सदा ही “मैं ब्रह्म हूँ” ऐसा निश्चयकर तत्त्वसे च्युत न हो; तात्पर्य यह कि सदा ही अच्युत आत्मदर्शी हो, जैसा कि “कुत्ते और चाण्डालमें भी विद्वानोंकी समान दृष्टि होती है” तथा “सम्पूर्ण भूतोंमें समान भावसे स्थित” आदि स्मृतियोंसे प्रमाणित होता है ॥३८॥

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रभाष्ये वैतथ्याख्यं द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥