भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 128

अद्वैतप्रकरण


| ओङ्कारनिर्णय उक्तः प्रपञ्चो-<br>पशमः शिवोऽद्वैत आत्मेति<br>प्रतिज्ञामात्रेण । ज्ञाते द्वैतं न<br>विद्यत इति च । तत्र द्वैताभावस्तु<br>वैतथ्यप्रकरणेन स्वप्नमायागन्ध-<br>र्वनगरादिदृष्टान्तैर्दृश्यत्वादद्यन्त-<br>वत्त्वादिहेतुभिस्तर्केण च प्रति-<br>पादितः । अद्वैतं किमागममात्रेण<br>प्रतिपत्तव्यमाहोस्वित्तर्केणापीत्यत<br>आह-शक्यते तर्केणापि ज्ञातुम् ;<br>तत्कथमित्यद्वैतप्रकरणमारभ्यते ।<br>उपास्योपासनादिभेदजातं सर्वं<br>वितथं केवलश्चात्माद्वयः परमार्थ<br>इति स्थितमतीते प्रकरणे; यतः— | [ आगमप्रकरणमें ] ओङ्कारका<br>निर्णय करते समय यह बात केवल<br>प्रतिज्ञामात्रसे कही है कि आत्मा<br>प्रपञ्चका निवृत्तिस्थान शिव, और<br>अद्वैतस्वरूप है तथा ज्ञान हो जाने-<br>पर द्वैत नहीं रहता । फिर वैतथ्य-<br>प्रकरणमें स्वप्न, माया और गन्धर्व-<br>नगरादिके दृष्टान्तोंसे दृश्यत्व एवं<br>आदि-अन्तवत्त्व आदि हेतुओं‌द्वारा<br>तर्कसे भी द्वैतके अभावका प्रतिपादन<br>किया गया । किन्तु वह अद्वैत क्या<br>शास्त्रमात्रसे ही ज्ञातव्य है अथवा<br>तर्कसे भी जाना जा सकता है ?<br>इसपर कहते हैं—तर्कसे भी जाना<br>जा सकता है । सो किस प्रकार ?<br>इसी बातको बतलानेके लिये अद्वैत<br>प्रकरणका आरम्भ किया जाता है ।<br>उपास्य और उपासना आदि सम्पूर्ण<br>भेद मिथ्या है, केवल आत्मा ही अद्वय<br>परमार्थस्वरूप है—यह बात पिछले<br>प्रकरणमें निश्चित हुई है; क्योंकि— |

भेददर्शी कृपण है

उपासनाश्रितो धर्मो जाते ब्रह्मणि वर्तते ।
प्रागुत्पत्तेरजं सर्वं तेनासौ कृपणः स्मृतः ॥ १ ॥