माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 129, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 129
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १०९
उपासनाका आश्रय लेनेवाला जीव कार्य ब्रह्ममें ही रहता है [ अर्थात् उसे ही अपना उपास्य मानता है, और समझता है कि ] उत्पत्तिसे पूर्व ही सब अज [ अर्थात् अजन्मा ब्रह्मस्वरूप ] था । इसलिये वह कृपण ( दीन ) माना गया है ॥ १ ॥
| उपासनाश्रित उपासनामात्मनो मोक्षसाधनत्वेन गत उपासकोऽहं ममोपास्यं ब्रह्म । तदुपासनं कृत्वा जाते ब्रह्मणीदानीं वर्तमानोऽजं ब्रह्म शरीरपातादूर्ध्वं प्रतिपत्स्ये प्रागुत्पत्तेश्चाजमिदं सर्वमहं च । यदात्मकोऽहं प्रागुत्पत्तेरिदानीं जातो जाते ब्रह्मणि च वर्तमान उपासनया पुनस्तदेव प्रतिपत्स्य इत्येवमुपासनाश्रितो धर्मः साधको येनैवं क्षुद्रब्रह्मवित्तेनासौ कारणेन कृपणो दीनोऽल्पकः स्मृतो नित्याजब्रह्मदर्शिभिरित्यभिप्रायः।<br><br>“यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते” (के० उ० १।४)<br>इत्यादिश्रुतेस्तलवकाराणाम् ॥१॥ | ‘उपासनाश्रितः’—उपासनाको अपने मोक्षके साधनरूपसे माननेवाला पुरुष अर्थात् ‘मैं उपासक हूँ, और ब्रह्म मेरा उपास्य है। उसकी उपासना करके इस समय कार्यब्रह्ममें रहता हुआ शरीरपातके अनन्तर मैं अजन्मा ब्रह्मको प्राप्त हो जाऊँगा तथा उत्पत्तिके पूर्व भी यह सब और मैं अजरूप ही थे । उत्पत्तिसे पूर्व मैं जैसा था अब उत्पन्न होकर जातब्रह्ममें वर्तमान हुआ अन्तमें उपासनाद्वारा मैं फिर उसी रूपको प्राप्त हो जाऊँगा’—इस प्रकार उपासनाका आश्रय लेनेवाला साधक जीव क्योंकि क्षुद्रब्रह्मवेत्ता है, इस कारणसे ही यह सर्वदा अजन्मा-ब्रह्मका दर्शन करनेवाले महात्माओं-द्वारा कृपण—दीन अर्थात् क्षुद्र माना गया है—यह इसका अभिप्राय है; जैसा कि “जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि जिससे वाणी प्रकट होती है, वही ब्रह्म है—ऐसा जान; जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है” इत्यादि तलवकार-श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ १ ॥ |