भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 130
११०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अकार्पण्यनिरूपणकी प्रतिज्ञा

सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मानं प्रतिपत्तुमशक्नुवन्नविद्यया दीनमात्मानं मन्यमानो जातोऽहं जाते ब्रह्मणि वर्ते तदुपासनाश्रितः सन्ब्रह्म प्रतिपत्स्य इत्येवं प्रतिपन्नः कृपणो भवति यस्मात्—बाहर और भीतर वर्तमान अजन्मा आत्माको प्राप्त करनेमें असमर्थ होनेके कारण अविद्यावश अपनेको दीन माननेवाला पुरुष, क्योंकि 'मैं उत्पन्न हुआ हूँ, उत्पन्न हुए ब्रह्ममें ही वर्तमान हूँ और उनकी उपासनाका आश्रय लेकर ही ब्रह्मको प्राप्त होऊँगा', इस प्रकार माननेके कारण दीन है—

अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतम् ।
यथा न जायते किंचिज्जायमानं समन्ततः ॥ २ ॥

इसलिये अब मैं सर्वत्र समताभावको प्राप्त जन्मरहित अकृपणभाव (अजन्मा ब्रह्म) का वर्णन करता हूँ [जिससे यह समझने में आ जायगा कि] किस प्रकार सब ओर उत्पन्न होनेपर भी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ ॥२॥

अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमकृपणभावमजं ब्रह्म। तद्धि कार्पण्यास्पदम् “यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं मर्त्यमसन्” (छा० उ० ७।२४।१) “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तद्विपरीतं सबाह्याभ्यन्तरमजमकार्पण्यं भूमा-इसलिये मैं अकार्पण्य अकृपणभाव अर्थात् अजन्मा ब्रह्मका वर्णन करता हूँ । “जहाँ अन्य अन्यको देखता है, अन्यको सुनता है और अन्यको ही जानता है वह अल्प है वह मरणशील और असत् है” “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार उपर्युक्त जातब्रह्म तो कृपणताका ही आश्रय है । उससे विपरीत बाहर-भीतर वर्तमान अजन्मा भूमासंज्ञक