भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ]अद्वैतप्रकरण१११
ख्यं ब्रह्म । यत्प्राप्याविद्याकृत-सर्वकार्पण्यनिवृत्तिस्तदकार्पण्यं वक्ष्यामीत्यर्थः ।ब्रह्म अकार्पण्यरूप है, जिसे प्राप्त होनेपर अविद्याकृत सम्पूर्ण कृपणताकी निवृत्ति हो जाती है; उस कृपण भावसे रहित ब्रह्मका मैं वर्णन करूँगा—यह इसका तात्पर्य है ।
तदजाति, अविद्यमाना जातिरस्य समतां गतं सर्वसाम्यं गतम् । कस्मात् ? अवयववैषम्याभावात् । यद्धि सावयवं वस्तु तदवयववैषम्यं गच्छज्जायत इत्युच्यते । इदं तु निरवयवत्वात्समतां गतमिति न कैश्चिदवयवैः स्फुटत्यतोऽजात्यकार्पण्यम् । समन्ततः समन्ताद्यथा न जायते किंचिदल्पमपि न स्फुटति रज्जुसर्पवदविद्याकृतदृष्ट्या जायमानं येन प्रकारेण न जायते सर्वतोऽजमेव ब्रह्म भवति तथा तं प्रकारं शृण्वित्यर्थः ॥२॥वह अजाति अर्थात् जिसकी जाति न हो और समताको प्राप्त अर्थात् सबकी समानताको प्राप्त है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि उसमें अवयवोंकी विषमताका अभाव है । जो वस्तु सावयव होती है वह अवयवोंकी विषमताको प्राप्त होनेके कारण 'उत्पन्न होती है' ऐसे कही जाती है । किन्तु यह ब्रह्म तो निरवयव होनेके कारण समताको प्राप्त है, इसलिये किन्हीं भी अवयवोंके रूपमें प्रस्फुटित नहीं होता । अतः यह सब ओरसे अजाति अर्थात् अकार्पण्यरूप है । जिस प्रकार कि कुछ भी उत्पन्न नहीं होता अर्थात् रज्जु-सर्पके समान आविद्यकदृष्टिसे उत्पन्न होता हुआ भी जिस प्रकार उत्पन्न नहीं होता—सब ओर अजन्मा ब्रह्म ही रहता है उस प्रकारको श्रवण करो—यह इसका अभिप्राय है ॥ २ ॥