माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण १०७
| यथातत्त्वदर्शी कश्चिच्चित्तमात्मत्वेन प्रतिपन्नश्चित्तचलनमनु चलितमात्मानं मन्यमानस्तत्त्वाच्चलितं देहादिभूतमात्मानं कदाचिन्मन्यते प्रच्युतोऽहमात्मतत्त्वादिदानीमिति; समाहिते तु मनसि कदाचित्तत्त्वभूतं प्रसन्नात्मानं मन्यत इदानीमस्मि तत्त्वीभूत इति; न तथात्मविद्भवेत् । आत्मन एकरूपत्वात्स्वरूपप्रच्यवनासम्भवाच्च । सदैव ब्रह्मास्मीत्यप्रच्युतो भवेत्तत्त्वात्सदाऽप्रच्युतात्मतत्त्वदर्शनो भवेदित्यभिप्रायः “शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः” (गीता १२।१८) “समं सर्वेषु भूतेषु” ( गीता १३ । २७ ) इत्यादिस्मृतेः ॥३८॥ | ही आत्मा माननेवाला कोई अतत्त्वदर्शी पुरुष किसी समय चित्तके चञ्चल होनेपर आत्माको भी चलायमान मानकर अपनेको तत्त्वसे विचलित और देहादिरूप समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्वसे च्युत हो गया हूँ तथा किसी समय चित्तके समाहित होनेपर अपनेको तत्त्वीभूत और प्रसन्न समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्वस्थ हूँ उसी प्रकार आत्मवेत्ताको न हो जाना चाहिये; क्योंकि आत्मा सर्वदा एकरूप है और उसका स्वरूपसे च्युत होना भी सम्भव नहीं है। अतः वह सदा ही “मैं ब्रह्म हूँ” ऐसा निश्चयकर तत्त्वसे च्युत न हो; तात्पर्य यह कि सदा ही अच्युत आत्मदर्शी हो, जैसा कि “कुत्ते और चाण्डालमें भी विद्वानोंकी समान दृष्टि होती है” तथा “सम्पूर्ण भूतोंमें समान भावसे स्थित” आदि स्मृतियोंसे प्रमाणित होता है ॥३८॥ |
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रभाष्ये वैतथ्याख्यं द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥
३. तृतीय प्रकरण — अद्वैतप्रकरण (४८ कारिकाएँ)
अद्वैतप्रकरण
| ओङ्कारनिर्णय उक्तः प्रपञ्चो-<br>पशमः शिवोऽद्वैत आत्मेति<br>प्रतिज्ञामात्रेण । ज्ञाते द्वैतं न<br>विद्यत इति च । तत्र द्वैताभावस्तु<br>वैतथ्यप्रकरणेन स्वप्नमायागन्ध-<br>र्वनगरादिदृष्टान्तैर्दृश्यत्वादद्यन्त-<br>वत्त्वादिहेतुभिस्तर्केण च प्रति-<br>पादितः । अद्वैतं किमागममात्रेण<br>प्रतिपत्तव्यमाहोस्वित्तर्केणापीत्यत<br>आह-शक्यते तर्केणापि ज्ञातुम् ;<br>तत्कथमित्यद्वैतप्रकरणमारभ्यते ।<br>उपास्योपासनादिभेदजातं सर्वं<br>वितथं केवलश्चात्माद्वयः परमार्थ<br>इति स्थितमतीते प्रकरणे; यतः— | [ आगमप्रकरणमें ] ओङ्कारका<br>निर्णय करते समय यह बात केवल<br>प्रतिज्ञामात्रसे कही है कि आत्मा<br>प्रपञ्चका निवृत्तिस्थान शिव, और<br>अद्वैतस्वरूप है तथा ज्ञान हो जाने-<br>पर द्वैत नहीं रहता । फिर वैतथ्य-<br>प्रकरणमें स्वप्न, माया और गन्धर्व-<br>नगरादिके दृष्टान्तोंसे दृश्यत्व एवं<br>आदि-अन्तवत्त्व आदि हेतुओंद्वारा<br>तर्कसे भी द्वैतके अभावका प्रतिपादन<br>किया गया । किन्तु वह अद्वैत क्या<br>शास्त्रमात्रसे ही ज्ञातव्य है अथवा<br>तर्कसे भी जाना जा सकता है ?<br>इसपर कहते हैं—तर्कसे भी जाना<br>जा सकता है । सो किस प्रकार ?<br>इसी बातको बतलानेके लिये अद्वैत<br>प्रकरणका आरम्भ किया जाता है ।<br>उपास्य और उपासना आदि सम्पूर्ण<br>भेद मिथ्या है, केवल आत्मा ही अद्वय<br>परमार्थस्वरूप है—यह बात पिछले<br>प्रकरणमें निश्चित हुई है; क्योंकि— |
भेददर्शी कृपण है
उपासनाश्रितो धर्मो जाते ब्रह्मणि वर्तते ।
प्रागुत्पत्तेरजं सर्वं तेनासौ कृपणः स्मृतः ॥ १ ॥
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १०९
उपासनाका आश्रय लेनेवाला जीव कार्य ब्रह्ममें ही रहता है [ अर्थात् उसे ही अपना उपास्य मानता है, और समझता है कि ] उत्पत्तिसे पूर्व ही सब अज [ अर्थात् अजन्मा ब्रह्मस्वरूप ] था । इसलिये वह कृपण ( दीन ) माना गया है ॥ १ ॥
| उपासनाश्रित उपासनामात्मनो मोक्षसाधनत्वेन गत उपासकोऽहं ममोपास्यं ब्रह्म । तदुपासनं कृत्वा जाते ब्रह्मणीदानीं वर्तमानोऽजं ब्रह्म शरीरपातादूर्ध्वं प्रतिपत्स्ये प्रागुत्पत्तेश्चाजमिदं सर्वमहं च । यदात्मकोऽहं प्रागुत्पत्तेरिदानीं जातो जाते ब्रह्मणि च वर्तमान उपासनया पुनस्तदेव प्रतिपत्स्य इत्येवमुपासनाश्रितो धर्मः साधको येनैवं क्षुद्रब्रह्मवित्तेनासौ कारणेन कृपणो दीनोऽल्पकः स्मृतो नित्याजब्रह्मदर्शिभिरित्यभिप्रायः।<br><br>“यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते” (के० उ० १।४)<br>इत्यादिश्रुतेस्तलवकाराणाम् ॥१॥ | ‘उपासनाश्रितः’—उपासनाको अपने मोक्षके साधनरूपसे माननेवाला पुरुष अर्थात् ‘मैं उपासक हूँ, और ब्रह्म मेरा उपास्य है। उसकी उपासना करके इस समय कार्यब्रह्ममें रहता हुआ शरीरपातके अनन्तर मैं अजन्मा ब्रह्मको प्राप्त हो जाऊँगा तथा उत्पत्तिके पूर्व भी यह सब और मैं अजरूप ही थे । उत्पत्तिसे पूर्व मैं जैसा था अब उत्पन्न होकर जातब्रह्ममें वर्तमान हुआ अन्तमें उपासनाद्वारा मैं फिर उसी रूपको प्राप्त हो जाऊँगा’—इस प्रकार उपासनाका आश्रय लेनेवाला साधक जीव क्योंकि क्षुद्रब्रह्मवेत्ता है, इस कारणसे ही यह सर्वदा अजन्मा-ब्रह्मका दर्शन करनेवाले महात्माओं-द्वारा कृपण—दीन अर्थात् क्षुद्र माना गया है—यह इसका अभिप्राय है; जैसा कि “जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि जिससे वाणी प्रकट होती है, वही ब्रह्म है—ऐसा जान; जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है” इत्यादि तलवकार-श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ १ ॥ |
| ११० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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अकार्पण्यनिरूपणकी प्रतिज्ञा
| सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मानं प्रतिपत्तुमशक्नुवन्नविद्यया दीनमात्मानं मन्यमानो जातोऽहं जाते ब्रह्मणि वर्ते तदुपासनाश्रितः सन्ब्रह्म प्रतिपत्स्य इत्येवं प्रतिपन्नः कृपणो भवति यस्मात्— | बाहर और भीतर वर्तमान अजन्मा आत्माको प्राप्त करनेमें असमर्थ होनेके कारण अविद्यावश अपनेको दीन माननेवाला पुरुष, क्योंकि 'मैं उत्पन्न हुआ हूँ, उत्पन्न हुए ब्रह्ममें ही वर्तमान हूँ और उनकी उपासनाका आश्रय लेकर ही ब्रह्मको प्राप्त होऊँगा', इस प्रकार माननेके कारण दीन है— |
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अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतम् ।
यथा न जायते किंचिज्जायमानं समन्ततः ॥ २ ॥
इसलिये अब मैं सर्वत्र समताभावको प्राप्त जन्मरहित अकृपणभाव (अजन्मा ब्रह्म) का वर्णन करता हूँ [जिससे यह समझने में आ जायगा कि] किस प्रकार सब ओर उत्पन्न होनेपर भी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ ॥२॥
| अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमकृपणभावमजं ब्रह्म। तद्धि कार्पण्यास्पदम् “यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं मर्त्यमसन्” (छा० उ० ७।२४।१) “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तद्विपरीतं सबाह्याभ्यन्तरमजमकार्पण्यं भूमा- | इसलिये मैं अकार्पण्य अकृपणभाव अर्थात् अजन्मा ब्रह्मका वर्णन करता हूँ । “जहाँ अन्य अन्यको देखता है, अन्यको सुनता है और अन्यको ही जानता है वह अल्प है वह मरणशील और असत् है” “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार उपर्युक्त जातब्रह्म तो कृपणताका ही आश्रय है । उससे विपरीत बाहर-भीतर वर्तमान अजन्मा भूमासंज्ञक |
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| शां० भा० ] | अद्वैतप्रकरण | १११ |
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| ख्यं ब्रह्म । यत्प्राप्याविद्याकृत-सर्वकार्पण्यनिवृत्तिस्तदकार्पण्यं वक्ष्यामीत्यर्थः । | ब्रह्म अकार्पण्यरूप है, जिसे प्राप्त होनेपर अविद्याकृत सम्पूर्ण कृपणताकी निवृत्ति हो जाती है; उस कृपण भावसे रहित ब्रह्मका मैं वर्णन करूँगा—यह इसका तात्पर्य है । |
| तदजाति, अविद्यमाना जातिरस्य समतां गतं सर्वसाम्यं गतम् । कस्मात् ? अवयववैषम्याभावात् । यद्धि सावयवं वस्तु तदवयववैषम्यं गच्छज्जायत इत्युच्यते । इदं तु निरवयवत्वात्समतां गतमिति न कैश्चिदवयवैः स्फुटत्यतोऽजात्यकार्पण्यम् । समन्ततः समन्ताद्यथा न जायते किंचिदल्पमपि न स्फुटति रज्जुसर्पवदविद्याकृतदृष्ट्या जायमानं येन प्रकारेण न जायते सर्वतोऽजमेव ब्रह्म भवति तथा तं प्रकारं शृण्वित्यर्थः ॥२॥ | वह अजाति अर्थात् जिसकी जाति न हो और समताको प्राप्त अर्थात् सबकी समानताको प्राप्त है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि उसमें अवयवोंकी विषमताका अभाव है । जो वस्तु सावयव होती है वह अवयवोंकी विषमताको प्राप्त होनेके कारण 'उत्पन्न होती है' ऐसे कही जाती है । किन्तु यह ब्रह्म तो निरवयव होनेके कारण समताको प्राप्त है, इसलिये किन्हीं भी अवयवोंके रूपमें प्रस्फुटित नहीं होता । अतः यह सब ओरसे अजाति अर्थात् अकार्पण्यरूप है । जिस प्रकार कि कुछ भी उत्पन्न नहीं होता अर्थात् रज्जु-सर्पके समान आविद्यकदृष्टिसे उत्पन्न होता हुआ भी जिस प्रकार उत्पन्न नहीं होता—सब ओर अजन्मा ब्रह्म ही रहता है उस प्रकारको श्रवण करो—यह इसका अभिप्राय है ॥ २ ॥ |
११२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
जीवकी उत्पत्तिके विषयमें दृष्टान्त
| अजाति ब्रह्माकार्पण्यं वक्ष्या-<br>मीति प्रतिज्ञातम् । तत्सिद्धयर्थं<br>हेतुं दृष्टान्तं च वक्ष्यामीत्याह— | मैं अजन्मा ब्रह्मका जो कृपण-<br>भावसे रहित है, वर्णन करता हूँ—<br>ऐसी प्रतिज्ञा की है। उसकी सिद्धिके<br>लिये हेतु और दृष्टान्त भी बतलाता<br>हूँ—इस अभिप्रायसे कहते हैं— |
आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः । घटादिवच्च संघातैर्जातावेतन्रिदर्शनम् ॥ ३ ॥
आत्मा आकाशके समान है; वह घटाकाशोंके समान जीवरूपसे उत्पन्न हुआ है । तथा [ मृत्तिकासे ] घटादिके समान देहसंघातरूपसे भी उत्पन्न हुआ कहा जाता है । आत्माकी उत्पत्तिके विषयमें यही दृष्टान्त है ॥ ३ ॥
| आत्मा परो हि यस्मादाकाश-<br>वत्सूक्ष्मो निरवयवः सर्वगतः<br>आकाशवदुक्तो जीवैः क्षेत्रज्ञैर्घटा-<br>काशैरिव घटाकाशतुल्य उदितः<br>उक्तः स एवाकाशसमः पर<br>आत्मा । | क्योंकि परमात्मा ही आकाशवत्<br>अर्थात् आकाशके समान सूक्ष्म<br>निरवयव और सर्वगत कहा गया है<br>और वही घटाकाशसदृश - क्षेत्रज्ञ<br>जीवोंके रूपमें उत्पन्न हुआ कहा<br>गया है, इसलिये वह परमात्मा ही,<br>आकाशके समान है । |
| अथ वा घटाकाशैर्यथाकाश<br>उदित उत्पन्नस्तथा परो जीवात्म-<br>भिरुत्पन्नः । जीवात्मनां परस्मा-<br>दात्मन उत्पत्तिर्या श्रूयते वेदान्तेषु | अथवा यों समझो कि जिस<br>प्रकार घटाकाशोंके रूपमें आकाश<br>उत्पन्न हुआ है उसी प्रकार परमात्मा<br>जीवात्माओंके रूपसे उत्पन्न हुआ<br>है । तात्पर्य यह है कि वेदान्तोंमें<br>जो परमात्मासे जीवात्माओंकी उत्पत्ति |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११३
| सा महाकाशाद्धटाकाशोत्पत्तिसमा न परमार्थत इत्यभिप्रायः । <br><br> तस्मादेवाकाशाद्धटादयः संघाता यथोत्पद्यन्त एवमाकाशस्थानीयात्परमात्मनः पृथिव्यादिभूतसंघाता आध्यात्मिकाश्च कार्यकारणलक्षणा रज्जुसर्पवद्विकल्पिता जायन्ते । अत उच्यते घटादिवच्च संघातैरुदित इति । यदा मन्दबुद्धिप्रतिपिपादयिषया श्रुत्यात्मनो जातिरुच्यते जीवादीनां तदा जातावुपगम्यमानायामेतन्निदर्शनं दृष्टान्तो यथोदिताकाशवदित्यादिः ॥ ३ ॥ | सुनी जाती है वह महाकाशसे घटाकाशोंकी उत्पत्तिके समान है, परमार्थतः नहीं । <br><br> उसी आकाशसे जिस प्रकार घट आदि संघात उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार आकाशस्थानीय परमात्मासे रज्जुमें सर्पके समान विकल्पित हुए पृथिवी आदि भूतसंघात और शरीर तथा इन्द्रियरूप आध्यात्मिकभाव उत्पन्न होते हैं । इसीसे कहा जाता है—घटादिके समान देहादिसंघातरूपसे भी उदित हुआ है । जिस समय मन्दबुद्धि पुरुषोंके प्रति प्रतिपादन करनेकी इच्छासे श्रुतिने आत्मासे जीवादिकी उत्पत्तिका वर्णन किया है उस समय उनकी उत्पत्ति माननेमें यह उपर्युक्त आकाशादिके समान ही निदर्शन-दृष्टान्त है ॥३॥ |
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जीवके विलीन होनेमें दृष्टान्त
घटादिषु प्रलीनेषु घटाकाशादयो यथा ।
आकाशे संप्रलीयन्ते तद्वज्जीवा इहात्मनि ॥ ४ ॥
घटादिके लीन होनेपर जिस प्रकार घटाकाशादि महाकाशमें लीन हो जाते हैं उसी प्रकार जीव इस आत्मामें विलीन हो जाते हैं ॥ ४ ॥
| यथा घटाद्युत्पत्त्या घटाकाशाद्युत्पत्तिः; यथा वा घटादिप्रलये | जिस प्रकार घटादिकी उत्पत्तिसे घटाकाशादिकी उत्पत्ति होती है और जिस प्रकार घटादिके नाशसे घटा- |
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१५-१६
११४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| घटाकाशादिप्रलयस्तद्वद्देहादि- | काशादिका नाश होता है उसी प्रकार देहादि * संघातकी उत्पत्तिसे जीवकी उत्पत्ति होती है और उनका लय होनेपर जीवोंका इस आत्मामें लय हो जाता है । तात्पर्य यह है कि स्वतः उनका लय नहीं होता॥४॥ |
| संघातोत्पत्त्या जीवोत्पत्तिस्त- | |
| त्प्रलये च जीवानामिहात्मनि | |
| प्रलयो न स्वत इत्यर्थः ॥ ४ ॥ |
आत्माकी असङ्गतामें दृष्टान्त
| सर्वदेहेष्वात्मैकत्व एकस्मि- | सम्पूर्ण देहोंमें एक ही आत्मा होनेपर तो एक आत्माके जन्म-मरण और सुख-दुःखादिमान् होनेपर सभीको उसका सम्बन्ध होगा तथा कर्म और फलकी संकरता हो जायगी [अर्थात् कर्म किसीका होगा और उसका फल कोई और ही भोगेगा] इस प्रकार जो द्वैतवादी कहते हैं उनके प्रति कहा जाता है— |
| ञ्जनन मरणसुखादिमत्यात्मनि | |
| सर्वात्मनां तत्सम्बन्धः क्रियाफल- | |
| साङ्कर्यं च स्यादिति य आहुद्वैति- | |
| नस्तान्प्रतीदमुच्यते— |
यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमादिभिर्युते ।
न सर्वे संप्रयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभिः ॥ ५ ॥
जिस प्रकार एक घटाकाशके धूलि और धुएँ आदिसे युक्त होनेपर समस्त घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुखादि धर्मोंसे लिप्त नहीं होते । [अर्थात् एक जीवके सुखादिमान् होनेपर सब जीव सुखादिमान् नहीं हो जाते ] ॥ ५ ॥
* यहाँ 'देह' शब्दसे लिङ्ग-देह समझना चाहिये, क्योंकि जीवत्वका नाश लिङ्ग-देहके नाशसे ही हो सकता है, स्थूल देहके नाशसे नहीं ।
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११५
| यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमा-<br>दिभिर्युते संयुक्ते न सर्वे घटा-<br>काशादयस्तद्रजोधूमादिभिः<br>संयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभिः।<br><br>नन्वेक एवात्मा ?<br>बाढम्; ननु न श्रुतं त्वया-<br>काशवत्सर्वसंघातेष्वेक एवात्मेति ?<br><br>यद्येक एवात्मा तर्हि सर्वत्र सुखी दुःखी च स्यात् ।<br><br>न चेदं सांख्यचोद्यं सम्भवति ।<br><br>(आत्मैकत्वे सांख्याक्षेप-निवृत्तिः)<br>न हि सांख्य आत्मनः सुखदुःखादिमत्त्वमिच्छति बुद्धिसमवायाभ्युपगमात्सुखदुःखादीनाम् । न चोपलब्धिस्वरूपस्यात्मनो भेदकल्पनायां प्रमाणमस्ति ।<br><br>भेदाभावे प्रधानस्य परार्थ्यानुपपत्तिरिति चेत्, न; प्रधानकृतस्यार्थस्यात्मन्यसमवायात् । यदि हि प्रधानकृतो बन्धो मोक्षो वार्थः पुरुषेषु भेदेन समवैति | जिस प्रकार एक घटाकाशके धूलि और धुएँसे युक्त होनेपर समस्त घटाकाशादि उस धूलि और धुएँसे संयुक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुखादिसे लिप्त नहीं होते ।<br><br>पूर्व०—आत्मा तो एक ही है न ?<br>सिद्धान्ती—हाँ, क्या तूने यह नहीं सुना कि सम्पूर्ण संघातोंमें आकाशके समान व्याप्त एक ही आत्मा है ?<br><br>पूर्व०—यदि आत्मा एक ही है तो वह सर्वत्र सुखी-दुःखी होगा ।<br><br>सिद्धान्ती—सांख्यवादीकी यह आपत्ति सम्भव नहीं है । सांख्य आत्माका सुख-दुःखादिमत्त्व स्वीकार नहीं करता, क्योंकि सुख-दुःखादि तो बुद्धिसमवेत माने गये हैं तथा इसके सिवा अनुभवस्वरूप आत्माकी भेद-कल्पनामें कोई प्रमाण भी नहीं है ।<br><br>यदि कहो कि भेद न होनेपर तो प्रधानकी परार्थता भी सम्भव नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि प्रधानद्वारा सम्पादित कार्यका आत्माके साथ सम्बन्ध नहीं है। यदि प्रधानकर्तृक बन्ध या मोक्ष पुरुषोंमें पृथक्-पृथक्रूपसे समवेत |
| ११६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| ततः प्रधानस्य परार्थ्यमात्मैकत्वे नोपपद्यत इति युक्ता पुरुषभेदकल्पना । न च सांख्यैर्बन्धो मोक्षो वार्थः पुरुषसमवेतोऽभ्युपगम्यते । निर्विशेषाश्च चेतनमात्रा आत्मानोऽभ्युपगम्यन्ते । अतः पुरुषसत्तामात्रप्रयुक्तमेव प्रधानस्य परार्थ्यं सिद्धं न तु पुरुषभेदप्रयुक्तमिति । अतः पुरुषभेदकल्पनायां न प्रधानस्य परार्थ्यं हेतुः । | होते तो आत्माका एकत्व माननेमें प्रधानकी परार्थता सम्भव नहीं हो सकती थी और तब पुरुषोंके भेदकी कल्पना करनी ठीक थी । किन्तु सांख्यवादी तो बन्ध या मोक्षको पुरुषसे सम्बद्ध ही नहीं मानते; वे तो आत्माओंको निर्विशेष और चेतनमात्र ही मानते हैं । अतः प्रधानकी परार्थता तो केवल पुरुषकी सत्तामात्रसे ही सिद्ध है, पुरुषोंके भेदके कारण नहीं । इसलिये पुरुषोंकी भेदकल्पनामें प्रधानकी परार्थता कारण नहीं है । |
| न चान्यत्पुरुषभेदकल्पनायां प्रमाणमस्ति सांख्यानाम् । परसत्तामात्रमेव चैतन्निमित्तीकृत्य स्वयं बध्यते मुच्यते च प्रधानम् । परश्चोपलब्धिमात्रसत्तास्वरूपेण प्रधानप्रवृत्तौ हेतुर्न केनचिद्विशेषेणेति केवलमूढतयैव पुरुषभेदकल्पना वेदार्थपरित्यागश्च । | इसके सिवा सांख्यवादियोंके पास पुरुषोंका भेद माननेमें और कोई प्रमाण नहीं है । पर-( आत्मा ) की सत्तामात्रको ही निमित्त बनाकर प्रधान स्वयं बन्ध और मोक्षको प्राप्त होता है और वह पर केवल उपलब्धिमात्र सत्तास्वरूपसे ही प्रधानकी प्रवृत्तिमें हेतु है, किसी विशेषताके कारण नहीं । अतः केवल मूढ़तासे ही पुरुषोंकी भेदकल्पना और वेदार्थका परित्याग किया जाता है । |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११७
[वैशेषिकमत-समीक्षा]
| ये त्वाहुर्वैशेषिकादय इच्छादय आत्मसमवायिन इति; तदप्यसत् । स्मृतिहेतूनां संस्काराणामप्रदेशवत्यात्मन्यसमवायात् । आत्ममनःसंयोगाच्च स्मृत्युत्पत्तेः स्मृतिनियमानुपपत्तिः । युगपद्वा सर्वस्मृत्युत्पत्तिप्रसङ्गः । | इसके सिवा वैशेषिकादि मतावलम्बी जो कहते हैं कि इच्छा आदि आत्माके धर्म हैं, सो उनका यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्मृतिके हेतुभूत संस्कारोंका प्रदेशहीन (निरवयव) आत्मासे समवाय सम्बन्ध नहीं हो सकता । यदि आत्मा और मनके संयोगसे स्मृतिकी उत्पत्ति मानी जाय तो स्मृतिका कोई नियम ही सम्भव नहीं है अथवा एक साथ ही सम्पूर्ण स्मृतियोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । * |
|---|---|
| [मन आदिभिः आत्मसंयोगानुपपत्तिः]<br><br>न च भिन्नजातीयानां स्पर्शादिहीनानामात्मनां मन आदिभिः संबन्धो युक्तः । न च द्रव्याद्रूपादयो गुणाः कर्मसामान्यविशेषसमवाया वा भिन्नाः सन्ति परेषाम् । यदि | इसके सिवा स्पर्शादिसे रहित भिन्नजातीय आत्माओंका मन आदिके साथ सम्बन्ध मानना ठीक भी नहीं है । तथा दूसरोंके मतमें द्रव्यसे रूप आदि उसके गुण एवं कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय भिन्न भी नहीं हैं । † यदि दूसरोंके मतमें |
* उस समय ऐसा नियम नहीं हो सकेगा कि वस्तुके प्रत्यक्ष अनुभवके समय उसकी स्मृति न हो, क्योंकि स्मृतिका असमवायी कारण आत्मा और मनका संयोग तो अनुभवकालमें भी है ही । इसके सिवा असमवायी कारणकी तुल्यताके कारण एक साथ समस्त स्मृतियोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग भी उपस्थित हो जायगा । यदि कहो कि स्मृतिके संस्कारोंका उद्बोध न होनेके कारण एक साथ स्मृति नहीं हो सकती तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि संस्कार और उनका उद्बोध ये दोनों आत्मामें ही रहते हैं—इस विषयमें उनका एक मत नहीं है । इसलिये इनकी गणना स्मृतिकी सामग्रीके अन्तर्गत नहीं हो सकती ।
† वैशेषिक मतमें साधारणतया द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय ये छः प्रकारके भाव पदार्थ हैं । उनमें द्रव्य उसे कहते हैं जिसके साथ
| ११८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| ह्यत्यन्तभिन्ना एव द्रव्यात्स्यु- | वे इच्छा आदि द्रव्यसे तथा आत्मासे अत्यन्त भिन्न ही हों तो ऐसा होनेपर तो द्रव्यके साथ उनका सम्बन्ध ही सिद्ध नहीं हो सकता। |
| रिच्छादयश्चात्मनस्तथा च सति | |
| द्रव्येण तेषां सम्बन्धानुपपत्तिः । | |
| अयुतसिद्धानां समवायलक्षणः | यदि कहो कि अयुतसिद्ध¹ पदार्थों- का समवाय-सम्बन्ध माननेमें विरोध नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं;* क्योंकि इच्छा आदि अनित्य धर्मोंसे नित्य आत्मा पूर्वसिद्ध होनेके कारण उनका परस्पर अयुतसिद्धत्व सम्भव नहीं है। यदि इच्छा आदि आत्माके साथ अयुतसिद्ध हों तो आत्मगत महत्त्वके समान उनकी भी नित्यता- का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । और यह बात इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे आत्माके अनिर्मोक्षका प्रसङ्ग आ जाता है । |
| संबन्धो न विरुध्यत इति चेत्, | |
| न । इच्छादिभ्योऽनित्येभ्य | |
| आत्मनो नित्यस्य पूर्वसिद्धत्वा- | |
| न्नायुतसिद्धत्वोपपत्तिः। आत्मना- | |
| युतसिद्धत्वे चेच्छादीनामात्म- | |
| गतमहत्त्ववन्नित्यत्वप्रसङ्गः । स | |
| चानिष्टः । आत्मनोऽनिर्मोक्ष- | |
| प्रसङ्गात् । | |
| समवायस्य च द्रव्यादन्यत्वे सति द्रव्येण सम्बन्धान्तरं वाच्यं | यदि समवाय द्रव्यसे भिन्न है तो द्रव्यके साथ उसका कोई अन्य |
गुण एवं क्रिया आदि समवाय-सम्बन्धसे रहें। गुण—रूप, रस एवं गन्ध आदिको कहते हैं। कर्म—गमनादि क्रिया। सामान्य—जाति, मनुष्यत्व, पशुत्वादि। विशेष—परमाणुओंका परस्पर भेद करनेवाला धर्म, जिसके कारण विभिन्न प्रकारके परमाणुओंसे विभिन्न प्रकारका कार्य उत्पन्न होता है। समवाय—एक प्रकारका सम्बन्ध जैसा कि गुण एवं क्रिया आदिका द्रव्यके साथ है।
१. जो पदार्थ परस्पर मिलकर सिद्ध हुए हों।
* अयुतसिद्धत्वमें चार पक्ष हैं—१ अभिन्नकालमें होना; २ अभिन्न देशमें होना; ३ अभिन्न स्वभाववाले होना; ४ संयोग और वियोगकी अयोग्यतावाले होना। उनमेंसे प्रथम पक्षका खण्डन करते हैं—
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११९
| [आत्मनो व्यावहारिकबन्धमोक्षाद्युपपादनम्] | |
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| यथा द्रव्यगुणयोः । समवायो नित्यसम्बन्ध एवेति न वाच्यमिति चेत्तथा च समवायसम्बन्धवतां नित्यसम्बन्धप्रसङ्गात्पृथक्त्वानुपपत्तिः । अत्यन्तपृथक्त्वे च द्रव्यादीनां स्पर्शवदस्पर्शद्रव्ययोरिव षष्ठ्यर्थानुपपत्तिः । | सम्बन्ध बतलाना चाहिये, जैसा कि द्रव्य और गुणका है। और यदि कोई कहे कि समवाय तो नित्य सम्बन्ध ही है, इसलिये उसके साथ कोई सम्बन्ध बतलानेकी आवश्यकता नहीं है तो ऐसी अवस्थामें समवायसम्बन्धवालोंका नित्यसम्बन्ध होनेके कारण उनकी पृथक्ता सम्भव नहीं है। और यदि द्रव्यादिको परस्पर अत्यन्त भिन्न माना जाय तो जिस प्रकार स्पर्शवान् और स्पर्शहीन द्रव्योंमें परस्पर सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है उसी प्रकार उसका सम्बन्ध ही नहीं हो सकता। |
| इच्छाद्युपजनापायवद्गुणवत्त्वे चात्मनोऽनित्यत्वप्रसङ्गः । देहफलादिवत्सावयवत्वं विक्रियावत्त्वं च देहादिवदेवेति दोषावपरिहार्यौ । | यदि आत्माको इच्छादि उत्पत्ति-विनाशशील गुणोंवाला माना जाय तो उसकी अनित्यताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। तथा उसके देह और फलादिके समान सावयवत्व एवं देहादिके समान ही विक्रियावत्त्व—ये दो दोष भी अपरिहार्य ही होंगे। |
| यथा त्वाकाशस्याविद्याध्यारोपितरजोधूममलवत्तादिदोषवत्त्वं तथात्मनोऽविद्याध्यारोपितबुद्ध्याद्युपाधिकृतसुखदुःखादिदोषवत्त्वे बन्धमोक्षादयो व्यावहारिका न विरुध्यन्ते । सर्ववादिभिरविद्या- | जिस प्रकार कि आकाशका अविद्याध्यारोपित घटादिउपाधियोंके कारण ही धूलि, धूम और मलसे युक्त होना है उसी प्रकार आत्माका भी, अविद्यासे आरोपित बुद्धि आदि उपाधिके कारण सुख-दुःखादि दोषसे युक्त होनेपर, व्यावहारिक बन्ध, मोक्ष आदि होनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि सभी वादियोंने |
| १२० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| कृतव्यवहाराभ्युपगमात्परमार्था- | व्यवहारको अविद्याकृत माना है, | | नभ्युपगमाच्च । तस्मादात्मभेद- | परमार्थरूप नहीं माना । अतः | | परिकल्पना वृथैव तार्किकैः | तार्किकलोग जीवोंके भेदकी कल्पना | | क्रियत इति ॥ ५ ॥ | वृथा ही करते हैं ॥ ५ ॥ |
व्यावहारिक जीवभेद
| कथं पुनरात्मभेदनिमित्त इव | किन्तु एक ही आत्मामें, आत्माओं- | | व्यवहार एकस्मिन्नात्मन्यविद्या- | के भेदके कारण होनेवालेके समान, | | कृत उपपद्यत इति, उच्यते— | अविद्याकृत व्यवहार किस प्रकार | | | सम्भव है ? इसपर कहते हैं— |
रूपकार्यसमाख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै ।
आकाशस्य न भेदोऽस्ति तद्वज्जीवेषु निर्णयः ॥ ६ ॥
[घटादि उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले] भिन्न-भिन्न आकाशोंके रूप, कार्य और नामोंमें तो भेद है, परन्तु आकाशमें तो कोई भेद नहीं है । उसी प्रकार जीवोंके विषयमें भी निश्चय समझना चाहिये ॥ ६ ॥
| यथेहाकाश एकस्मिन्घटकर- | जिस प्रकार इस एक ही | | कापवरकाद्याकाशानामल्पत्वम- | आकाशमें घट, कमण्डलु और मठादि | | हत्त्वादिरूपाणि भिद्यन्ते तथा | आकाशोंके अल्पत्व-महत्त्वादि रूपोंमें | | कार्यमुदकाहरणधारणशयनादि- | भेद है, तथा जहाँ-तहाँ व्यवहारमें | | समाख्याश्च घटाकाशकरकाकाश | उनके किये हुए जल लाना, जल | | इत्याद्यास्तत्कृताश्च भिन्ना दृश्यन्ते । | धारण करना और शयन करना | | तत्र तत्र वै व्यवहारविषय | आदिकार्य एवं घटाकाश करकाकाश | | इत्यर्थः। सर्वोऽयमाकाशे रूपादि- | आदि नाम भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। | | भेदकृतो व्यवहारो न परमार्थ | किन्तु आकाशमें रूपादिके कारण | | | होनेवाला यह सब व्यवहार पार- |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२१
| एव । परमार्थतस्त्वाकाशस्य न भेदोऽस्ति । न चाकाशभेदनिमित्तो व्यवहारोऽस्त्यन्तरेण परोपाधिकृतं द्वारम् । यथैतत्त्वद्देहोपाधिभेदकृतेषु जीवेषु घटाकाशस्थानीयेष्वात्मसु निरूपणात्कृतो बुद्धिमद्भिर्निर्णयो निश्चय इत्यर्थः ॥ ६ ॥ | मार्थिक ही नहीं हैं। परमार्थतः तो आकाशका कोई भेद नहीं है। अन्य उपाधिकृत निमित्तके सिवा वस्तुतः आकाशके भेदके कारण होनेवाला कोई व्यवहार है ही नहीं। जैसा कि यह [ आकाशका भेद ] है उसी प्रकार देहादि उपाधिके भेदसे किये हुए घटाकाशस्थानीय जीवोंमें भेदका निरूपण किया जानेके कारण बुद्धिमानोंने [ उस भेदका अपारमार्थिकत्व ] निश्चय किया है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ६ ॥ |
जीव आत्माका विकार या अवयव नहीं है
| ननु तत्र परमार्थकृत एव घटाकाशादिषु रूपकार्यादिभेदव्यवहार इति ? नैतदस्ति, यस्मात् | किन्तु घटाकाशादिमें जो रूप और कार्य आदिका भेद-व्यवहार है वह तो वास्तविक ही है ? [ ऐसी शंका होनेपर कहते हैं—] यह बात नहीं है, क्योंकि— |
नाकाशस्य घटाकाशो विकारावयवौ यथा ।
नैवात्मनः सदा जीवो विकारावयवौ तथा ॥ ७ ॥
जिस प्रकार घटाकाश आकाशका विकार या अवयव नहीं है उसी प्रकार जीव भी आत्माका विकार या अवयव कभी नहीं है ॥ ७ ॥
| परमार्थाकाशस्य घटाकाशो न विकारः; यथा सुवर्णस्य | परमार्थाकाशका घटाकाश न तो विकार है, जैसे कि सुवर्णके रुचकादि |
| १२२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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रुचकादिर्यथा वाप्रां फेनबुद्- | आभूषण तथा जलके फेन, बुद्बुद बुदाहिमादिः; नाप्यवयवो यथा | और हिम आदि हैं, और न जैसे वृक्षस्य शाखादिः । न तथा | शाखादि वृक्षके अवयव हैं उस आकाशस्य घटाकाशो विकारा- | प्रकार उसका अवयव ही है। इसी वयवौ यथा तथा नैवात्मनः | तरह, जैसे कि महाकाशका घटाकाश परस्य परमार्थसतो महाकाशस्था- | विकार या अवयव नहीं है उसी नीयस्य घटाकाशस्थानीयो जीवः | प्रकार, अर्थात् उपर्युक्त दृष्टान्तानुसार सदा सर्वदा यथोक्तदृष्टान्तवन्न | ही, महाकाशस्थानीय परमार्थ सत् विकारो नाप्यवयवः । अत | परमात्माका घटाकाशस्थानीय जीव, आत्मभेदकृतो व्यवहारो मृषै- | किसी अवस्थामें विकार या अवयव वेत्यर्थः ॥ ७ ॥ | नहीं है । अतः तात्पर्य यह है कि आत्मभेदजनित व्यवहार मिथ्या ही है ॥ ७ ॥
आत्माकी मलिनता अज्ञानियोंकी दृष्टिमें है
यस्माद्यथा घटाकाशादिभेद- | क्योंकि जिस प्रकार घटाकाशादि बुद्धिनिबन्धनो रूपकार्यादिभेद- | भेदबुद्धिके कारण उसका रूप एवं व्यवहारस्तथा देहोपाधिजीवभेद- | कार्य आदि भेदव्यवहार है उसी कृतो जन्ममरणादिव्यवहारः । | प्रकार देहोपाधिक जीवभेदके कारण तस्मात्तत्कृतमेवं क्लेशकर्मफलमल- | ही जन्म-मरण आदि व्यवहार है; वत्त्वमात्मनो न परमार्थत | इसलिये उसका किया हुआ ही इत्येतमर्थं दृष्टान्तेन प्रतिपिपा- | आत्माका क्लेश, कर्मफल और मलसे दयिषन्नाह— | युक्त होना है, परमार्थतः नहीं—इसी बातको दृष्टान्तसे प्रतिपादन करनेकी इच्छासे कहते हैं—
यथा भवति बालानां गगनं मलिनं मलैः । तथा भवत्यबुद्धानामात्मापि मलिनो मलैः ॥ ८ ॥
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२३
जिस प्रकार मूर्ख लोगोंको [ धूलि आदि ] मलके कारण आकाश मलिन जान पड़ता है उसी प्रकार अविवेकी पुरुषोंकी दृष्टिमें आत्मा भी [ राग-द्वेषादि ] मलसे मलिन हो जाता है ॥ ८ ॥
| यथा भवति लोके बालानाम-<br><br>विवेकिनां गगनमाकाशं घन-<br><br>रजोधूमादिमलैर्मलिनं मलवन्न<br><br>गगनं मलवद्याथात्म्यविवेकिनाम्,<br><br>तथा भवत्यात्मा परोऽपि यो<br><br>विज्ञाता प्रत्यक्क्लेशकर्मफलमलै-<br><br>र्मलिनोऽबुद्धानां प्रत्यगात्मविवेक-<br><br>रहितानां नात्मविवेकवताम् ।<br><br>नह्यूषरदेशस्तृड्वत्प्राण्यध्यारो-<br><br>पितोदकफेनतरङ्गादिमांस्तथा<br><br>नात्माबुद्धारोपितक्लेशादिमलै-<br><br>र्मलिनो भवतीत्यर्थः ॥ ८ ॥ | लोकमें जिस प्रकार बाल अर्थात् अविवेकी पुरुषोंकी दृष्टिमें आकाश मेघ, धूलि और धुआँ आदि मलोंके कारण मलिन-मलयुक्त हो जाता है, किन्तु आकाशके यथार्थ स्वरूपको जाननेवालोंकी दृष्टिमें ऐसा नहीं होता; उसी प्रकार अबुद्ध-प्रत्यगात्माके विवेकसे रहित पुरुषोंकी दृष्टिमें, जो प्रत्यक् और सबका साक्षी है वह परात्मा भी क्लेश, कर्म और फलरूप मलोंसे मलिन हो जाता है; किन्तु आत्मज्ञानियोंकी दृष्टिमें ऐसा नहीं होता ।<br><br>तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार ऊसरदेश तृषित प्राणीके आरोपित किये हुए जलके फेन और तरङ्गादि-से युक्त नहीं होता उसी प्रकार आत्मा भी अज्ञानियोंद्वारा आरोपित क्लेशादि मलोंसे मलिन नहीं होता ॥ ८ ॥ |
| पुनरप्युक्तमेवार्थं प्रपञ्चयति— | फिर भी पूर्वोक्त अर्थका ही विस्तार कहते हैं— |
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| १२४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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मरणे सम्भवे चैव गत्यागमनयोरपि ।
स्थितौ सर्वशरीरेषु आकाशेनाविलक्षणः ॥ ९ ॥
यह आत्मा सम्पूर्ण शरीरोंमें मृत्यु, जन्म, लोकान्तरमें गमनागमन और स्थित रहनेमें भी आकाशसे अविलक्षण है। [अर्थात् इन सब व्यवहारोंमें रहते हुए भी यह आकाशके समान निर्विकार और विभु है] ॥९॥
| घटाकाशजन्मनाशगमना- | घटाकाशके जन्म, नाश, गमन, |
| गमनस्थितिवत्सर्वशरीरेष्वात्मनो | आगमन और स्थितिके समान सम्पूर्ण शरीरोंमें आत्माके जन्म-मरणादिको |
| जन्ममरणादिराकाशेनाविलक्षणः | आकाशसे अविलक्षण (भेदरहित) ही अनुभव करना चाहिये—यह |
| प्रत्येतव्य इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | इसका अभिप्राय है ॥ ९ ॥ |
संघाताः स्वप्नवत्सर्वे आत्ममायाविसर्जिताः ।
आधिक्ये सर्वसाम्ये वा नोपपत्तिर्हि विद्यते ॥ १० ॥
देहादि समस्त संघात स्वप्नके समान आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। उनके अपेक्षाकृत उत्कर्ष अथवा सबकी समानतामें भी कोई हेतु नहीं है ॥ १० ॥
| घटादिस्थानीयास्तु देहादि- | घटादिस्थानीय देहादिसंघात |
| संघाताः स्वप्नदृश्यदेहादिवन्मा- | स्वप्नमें दीखनेवाले देहादिके समान |
| याविकृतदेहादिवच्चात्ममायावि- | तथा मायावीके रचे हुए देहादिके |
| सर्जिताः, आत्मनो मायाविद्या | सदृश आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। तात्पर्य यह है कि आत्माकी |
| तया प्रत्युपस्थापिता न परमार्थतः | माया जो अविद्या है उसके प्रस्तुत |
| सन्तीत्यर्थः । यद्याधिक्यमधिक- | किये हुए हैं, परमार्थतः नहीं हैं। |
| भावस्तिर्यग्देहाद्यपेक्षया देवादि- | यदि तिर्यगादि देहोंकी अपेक्षा देवता |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२५
| कार्यकरणसंघातानां यदि वा सर्वेषां समतैव नैषामुपपत्तिः सम्भवः सद्भावप्रतिपादको हेतुर्विद्यते नास्ति, हि यस्मात्तस्मादविद्याकृता एव न परमार्थतः सन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥ | आदिके शरीर और इन्द्रियोंकी अधिकता-उत्कृष्टता है अथवा यदि [ तत्त्वदृष्टिसे ] सबकी समानता ही है, तो भी, क्योंकि उनके सद्भावका प्रतिपादक कोई हेतु नहीं है, इसलिये वे अविद्याकृत ही हैं, परमार्थतः नहीं हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १० ॥ |
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| उत्पत्त्यादिवर्जितस्याद्वयस्यात्मतत्त्वस्य श्रुतिप्रमाणकत्वप्रदर्शनार्थवाक्यान्युपन्यस्यन्ते— | उत्पत्ति आदिसे रहित अद्वितीय आत्मतत्त्वका श्रुतिप्रमाणकत्व प्रदर्शित करनेके लिये [ उपनिषद्के ] वाक्योंका उल्लेख किया जाता है— |
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रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके ।
तेषामात्मा परो जीवः खं यथा संप्रकाशितः ॥ ११ ॥
तैत्तिरीय श्रुतिमें जिन रसादि [ अन्नमयादि ] कोशोंकी व्याख्या की गयी है, आकाशवत् परमात्मा ही उनके आत्मा जीवरूपसे प्रकाशित किया गया है ॥ ११ ॥
| रसादयोऽन्नरसमयः प्राणमय इत्येवमादयः कोशा इव कोशा अस्यादेरिवोत्तरोत्तरस्यापेक्षया बहिर्भावात्पूर्वपूर्वस्य व्याख्याता विस्पष्टमाख्यातास्तैत्तिरीयके तैत्तिरीयकशाखोपनिषद्वल्ल्यां तेषां कोशानामात्मा येनात्मना पञ्चापि | तैत्तिरीयकमें अर्थात् तैत्तिरीयकशाखोपनिषद्वल्लीमें जिन रसादि—अन्नरसमय एवं प्राणमय इत्यादि कोशोंकी व्याख्या—स्पष्ट विवेचना की गयी है और जो उत्तरोत्तरकी अपेक्षा पूर्व-पूर्व बहिःस्थित होनेके कारण खड्गके कोशके समान कोश कहे गये हैं उन कोशोंका आत्मा, |
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| १२६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| कोशा आत्मवन्तोऽन्तरतमेन, स हि सर्वेषां जीवननिमित्तत्वाज्जीवः । | जिस अन्तरतम आत्माके कारण पाँचों कोश आत्मवान् हैं, वही सबके जीवनका निमित्त होनेके कारण 'जीव' कहलाता है । |
| कोऽसावित्याह—पर एवात्मा यः पूर्वं "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० उ० २ । १) इति प्रकृतः। यस्मादात्मनः खममायादिवदाकाशादिक्रमेण रसादयः कोशलक्षणाः संघाता आत्ममायाविसर्जिता इत्युक्तम् । स आत्मास्माभिर्यथा खं तथेति संप्रकाशित "आत्मा ह्याकाशवत्" (अद्वैत० ३) इत्यादिश्लोकैः । न तार्किकपरिकल्पितात्मवत्पुरुषबुद्धिप्रमाणगम्य इत्यभिप्रायः ॥११॥ | वह कौन है ? इसपर कहते हैं—वह परमात्मा ही है, जिसका पहले "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म " इत्यादि वाक्योंमें प्रसङ्ग है और जिस आत्मासे खप्न और माया आदिके समान आकाशादि क्रमसे कोशरूप संघात आत्माकी मायासे ही रचे गये हैं-ऐसा कहा गया है । उस आत्माको हमने "आत्मा ह्याकाशवत्" इत्यादि श्लोकोंमें, जैसा आकाश है उसीके समान प्रकाशित किया है । तात्पर्य यह है कि वह तार्किकोंके कल्पना किये हुए आत्माके समान मनुष्यकी बुद्धिसे प्रमाणित होनेवाला नहीं है ॥ ११ ॥ |
द्वयोर्द्वयोर्मधुज्ञाने परं ब्रह्म प्रकाशितम् ।
पृथिव्यामुदरे चैव यथाकाशः प्रकाशितः ॥ १२ ॥
लोकमें, जिस प्रकार पृथिवी और उदरमें एक ही आकाश प्रकाशित हो रहा है उसी प्रकार [ बृहदारण्योक्त ] मधु ब्राह्मणमें [ अध्यात्म और अधिदैवत-इन ] दोनों स्थानोंमें एक ही ब्रह्म निरूपित किया गया है ॥१२॥