भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 144
१२४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

मरणे सम्भवे चैव गत्यागमनयोरपि ।
स्थितौ सर्वशरीरेषु आकाशेनाविलक्षणः ॥ ९ ॥

यह आत्मा सम्पूर्ण शरीरोंमें मृत्यु, जन्म, लोकान्तरमें गमनागमन और स्थित रहनेमें भी आकाशसे अविलक्षण है। [अर्थात् इन सब व्यवहारोंमें रहते हुए भी यह आकाशके समान निर्विकार और विभु है] ॥९॥

घटाकाशजन्मनाशगमना-घटाकाशके जन्म, नाश, गमन,
गमनस्थितिवत्सर्वशरीरेष्वात्मनोआगमन और स्थितिके समान सम्पूर्ण शरीरोंमें आत्माके जन्म-मरणादिको
जन्ममरणादिराकाशेनाविलक्षणःआकाशसे अविलक्षण (भेदरहित) ही अनुभव करना चाहिये—यह
प्रत्येतव्य इत्यर्थः ॥ ९ ॥इसका अभिप्राय है ॥ ९ ॥

संघाताः स्वप्नवत्सर्वे आत्ममायाविसर्जिताः ।
आधिक्ये सर्वसाम्ये वा नोपपत्तिर्हि विद्यते ॥ १० ॥

देहादि समस्त संघात स्वप्नके समान आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। उनके अपेक्षाकृत उत्कर्ष अथवा सबकी समानतामें भी कोई हेतु नहीं है ॥ १० ॥

घटादिस्थानीयास्तु देहादि-घटादिस्थानीय देहादिसंघात
संघाताः स्वप्नदृश्यदेहादिवन्मा-स्वप्नमें दीखनेवाले देहादिके समान
याविकृतदेहादिवच्चात्ममायावि-तथा मायावीके रचे हुए देहादिके
सर्जिताः, आत्मनो मायाविद्यासदृश आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। तात्पर्य यह है कि आत्माकी
तया प्रत्युपस्थापिता न परमार्थतःमाया जो अविद्या है उसके प्रस्तुत
सन्तीत्यर्थः । यद्याधिक्यमधिक-किये हुए हैं, परमार्थतः नहीं हैं।
भावस्तिर्यग्देहाद्यपेक्षया देवादि-यदि तिर्यगादि देहोंकी अपेक्षा देवता
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित) · पृष्ठ 144, कुल 301 में से · BharatKosha