माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| १२४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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मरणे सम्भवे चैव गत्यागमनयोरपि ।
स्थितौ सर्वशरीरेषु आकाशेनाविलक्षणः ॥ ९ ॥
यह आत्मा सम्पूर्ण शरीरोंमें मृत्यु, जन्म, लोकान्तरमें गमनागमन और स्थित रहनेमें भी आकाशसे अविलक्षण है। [अर्थात् इन सब व्यवहारोंमें रहते हुए भी यह आकाशके समान निर्विकार और विभु है] ॥९॥
| घटाकाशजन्मनाशगमना- | घटाकाशके जन्म, नाश, गमन, |
| गमनस्थितिवत्सर्वशरीरेष्वात्मनो | आगमन और स्थितिके समान सम्पूर्ण शरीरोंमें आत्माके जन्म-मरणादिको |
| जन्ममरणादिराकाशेनाविलक्षणः | आकाशसे अविलक्षण (भेदरहित) ही अनुभव करना चाहिये—यह |
| प्रत्येतव्य इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | इसका अभिप्राय है ॥ ९ ॥ |
संघाताः स्वप्नवत्सर्वे आत्ममायाविसर्जिताः ।
आधिक्ये सर्वसाम्ये वा नोपपत्तिर्हि विद्यते ॥ १० ॥
देहादि समस्त संघात स्वप्नके समान आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। उनके अपेक्षाकृत उत्कर्ष अथवा सबकी समानतामें भी कोई हेतु नहीं है ॥ १० ॥
| घटादिस्थानीयास्तु देहादि- | घटादिस्थानीय देहादिसंघात |
| संघाताः स्वप्नदृश्यदेहादिवन्मा- | स्वप्नमें दीखनेवाले देहादिके समान |
| याविकृतदेहादिवच्चात्ममायावि- | तथा मायावीके रचे हुए देहादिके |
| सर्जिताः, आत्मनो मायाविद्या | सदृश आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। तात्पर्य यह है कि आत्माकी |
| तया प्रत्युपस्थापिता न परमार्थतः | माया जो अविद्या है उसके प्रस्तुत |
| सन्तीत्यर्थः । यद्याधिक्यमधिक- | किये हुए हैं, परमार्थतः नहीं हैं। |
| भावस्तिर्यग्देहाद्यपेक्षया देवादि- | यदि तिर्यगादि देहोंकी अपेक्षा देवता |