भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 143

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२३


जिस प्रकार मूर्ख लोगोंको [ धूलि आदि ] मलके कारण आकाश मलिन जान पड़ता है उसी प्रकार अविवेकी पुरुषोंकी दृष्टिमें आत्मा भी [ राग-द्वेषादि ] मलसे मलिन हो जाता है ॥ ८ ॥


यथा भवति लोके बालानाम-<br><br>विवेकिनां गगनमाकाशं घन-<br><br>रजोधूमादिमलैर्मलिनं मलवन्न<br><br>गगनं मलवद्याथात्म्यविवेकिनाम्,<br><br>तथा भवत्यात्मा परोऽपि यो<br><br>विज्ञाता प्रत्यक्क्लेशकर्मफलमलै-<br><br>र्मलिनोऽबुद्धानां प्रत्यगात्मविवेक-<br><br>रहितानां नात्मविवेकवताम् ।<br><br>नह्यूषरदेशस्तृड्वत्प्राण्यध्यारो-<br><br>पितोदकफेनतरङ्गादिमांस्तथा<br><br>नात्माबुद्धारोपितक्लेशादिमलै-<br><br>र्मलिनो भवतीत्यर्थः ॥ ८ ॥लोकमें जिस प्रकार बाल अर्थात् अविवेकी पुरुषोंकी दृष्टिमें आकाश मेघ, धूलि और धुआँ आदि मलोंके कारण मलिन-मलयुक्त हो जाता है, किन्तु आकाशके यथार्थ स्वरूपको जाननेवालोंकी दृष्टिमें ऐसा नहीं होता; उसी प्रकार अबुद्ध-प्रत्यगात्माके विवेकसे रहित पुरुषोंकी दृष्टिमें, जो प्रत्यक् और सबका साक्षी है वह परात्मा भी क्लेश, कर्म और फलरूप मलोंसे मलिन हो जाता है; किन्तु आत्मज्ञानियोंकी दृष्टिमें ऐसा नहीं होता ।<br><br>तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार ऊसरदेश तृषित प्राणीके आरोपित किये हुए जलके फेन और तरङ्गादि-से युक्त नहीं होता उसी प्रकार आत्मा भी अज्ञानियोंद्वारा आरोपित क्लेशादि मलोंसे मलिन नहीं होता ॥ ८ ॥

पुनरप्युक्तमेवार्थं प्रपञ्चयति—फिर भी पूर्वोक्त अर्थका ही विस्तार कहते हैं—