भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 142
१२२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

रुचकादिर्यथा वाप्रां फेनबुद्- | आभूषण तथा जलके फेन, बुद्बुद बुदाहिमादिः; नाप्यवयवो यथा | और हिम आदि हैं, और न जैसे वृक्षस्य शाखादिः । न तथा | शाखादि वृक्षके अवयव हैं उस आकाशस्य घटाकाशो विकारा- | प्रकार उसका अवयव ही है। इसी वयवौ यथा तथा नैवात्मनः | तरह, जैसे कि महाकाशका घटाकाश परस्य परमार्थसतो महाकाशस्था- | विकार या अवयव नहीं है उसी नीयस्य घटाकाशस्थानीयो जीवः | प्रकार, अर्थात् उपर्युक्त दृष्टान्तानुसार सदा सर्वदा यथोक्तदृष्टान्तवन्न | ही, महाकाशस्थानीय परमार्थ सत् विकारो नाप्यवयवः । अत | परमात्माका घटाकाशस्थानीय जीव, आत्मभेदकृतो व्यवहारो मृषै- | किसी अवस्थामें विकार या अवयव वेत्यर्थः ॥ ७ ॥ | नहीं है । अतः तात्पर्य यह है कि आत्मभेदजनित व्यवहार मिथ्या ही है ॥ ७ ॥

आत्माकी मलिनता अज्ञानियोंकी दृष्टिमें है

यस्माद्यथा घटाकाशादिभेद- | क्योंकि जिस प्रकार घटाकाशादि बुद्धिनिबन्धनो रूपकार्यादिभेद- | भेदबुद्धिके कारण उसका रूप एवं व्यवहारस्तथा देहोपाधिजीवभेद- | कार्य आदि भेदव्यवहार है उसी कृतो जन्ममरणादिव्यवहारः । | प्रकार देहोपाधिक जीवभेदके कारण तस्मात्तत्कृतमेवं क्लेशकर्मफलमल- | ही जन्म-मरण आदि व्यवहार है; वत्त्वमात्मनो न परमार्थत | इसलिये उसका किया हुआ ही इत्येतमर्थं दृष्टान्तेन प्रतिपिपा- | आत्माका क्लेश, कर्मफल और मलसे दयिषन्नाह— | युक्त होना है, परमार्थतः नहीं—इसी बातको दृष्टान्तसे प्रतिपादन करनेकी इच्छासे कहते हैं—

यथा भवति बालानां गगनं मलिनं मलैः । तथा भवत्यबुद्धानामात्मापि मलिनो मलैः ॥ ८ ॥