माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२१
| एव । परमार्थतस्त्वाकाशस्य न भेदोऽस्ति । न चाकाशभेदनिमित्तो व्यवहारोऽस्त्यन्तरेण परोपाधिकृतं द्वारम् । यथैतत्त्वद्देहोपाधिभेदकृतेषु जीवेषु घटाकाशस्थानीयेष्वात्मसु निरूपणात्कृतो बुद्धिमद्भिर्निर्णयो निश्चय इत्यर्थः ॥ ६ ॥ | मार्थिक ही नहीं हैं। परमार्थतः तो आकाशका कोई भेद नहीं है। अन्य उपाधिकृत निमित्तके सिवा वस्तुतः आकाशके भेदके कारण होनेवाला कोई व्यवहार है ही नहीं। जैसा कि यह [ आकाशका भेद ] है उसी प्रकार देहादि उपाधिके भेदसे किये हुए घटाकाशस्थानीय जीवोंमें भेदका निरूपण किया जानेके कारण बुद्धिमानोंने [ उस भेदका अपारमार्थिकत्व ] निश्चय किया है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ६ ॥ |
जीव आत्माका विकार या अवयव नहीं है
| ननु तत्र परमार्थकृत एव घटाकाशादिषु रूपकार्यादिभेदव्यवहार इति ? नैतदस्ति, यस्मात् | किन्तु घटाकाशादिमें जो रूप और कार्य आदिका भेद-व्यवहार है वह तो वास्तविक ही है ? [ ऐसी शंका होनेपर कहते हैं—] यह बात नहीं है, क्योंकि— |
नाकाशस्य घटाकाशो विकारावयवौ यथा ।
नैवात्मनः सदा जीवो विकारावयवौ तथा ॥ ७ ॥
जिस प्रकार घटाकाश आकाशका विकार या अवयव नहीं है उसी प्रकार जीव भी आत्माका विकार या अवयव कभी नहीं है ॥ ७ ॥
| परमार्थाकाशस्य घटाकाशो न विकारः; यथा सुवर्णस्य | परमार्थाकाशका घटाकाश न तो विकार है, जैसे कि सुवर्णके रुचकादि |