माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १२० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| कृतव्यवहाराभ्युपगमात्परमार्था- | व्यवहारको अविद्याकृत माना है, | | नभ्युपगमाच्च । तस्मादात्मभेद- | परमार्थरूप नहीं माना । अतः | | परिकल्पना वृथैव तार्किकैः | तार्किकलोग जीवोंके भेदकी कल्पना | | क्रियत इति ॥ ५ ॥ | वृथा ही करते हैं ॥ ५ ॥ |
व्यावहारिक जीवभेद
| कथं पुनरात्मभेदनिमित्त इव | किन्तु एक ही आत्मामें, आत्माओं- | | व्यवहार एकस्मिन्नात्मन्यविद्या- | के भेदके कारण होनेवालेके समान, | | कृत उपपद्यत इति, उच्यते— | अविद्याकृत व्यवहार किस प्रकार | | | सम्भव है ? इसपर कहते हैं— |
रूपकार्यसमाख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै ।
आकाशस्य न भेदोऽस्ति तद्वज्जीवेषु निर्णयः ॥ ६ ॥
[घटादि उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले] भिन्न-भिन्न आकाशोंके रूप, कार्य और नामोंमें तो भेद है, परन्तु आकाशमें तो कोई भेद नहीं है । उसी प्रकार जीवोंके विषयमें भी निश्चय समझना चाहिये ॥ ६ ॥
| यथेहाकाश एकस्मिन्घटकर- | जिस प्रकार इस एक ही | | कापवरकाद्याकाशानामल्पत्वम- | आकाशमें घट, कमण्डलु और मठादि | | हत्त्वादिरूपाणि भिद्यन्ते तथा | आकाशोंके अल्पत्व-महत्त्वादि रूपोंमें | | कार्यमुदकाहरणधारणशयनादि- | भेद है, तथा जहाँ-तहाँ व्यवहारमें | | समाख्याश्च घटाकाशकरकाकाश | उनके किये हुए जल लाना, जल | | इत्याद्यास्तत्कृताश्च भिन्ना दृश्यन्ते । | धारण करना और शयन करना | | तत्र तत्र वै व्यवहारविषय | आदिकार्य एवं घटाकाश करकाकाश | | इत्यर्थः। सर्वोऽयमाकाशे रूपादि- | आदि नाम भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। | | भेदकृतो व्यवहारो न परमार्थ | किन्तु आकाशमें रूपादिके कारण | | | होनेवाला यह सब व्यवहार पार- |