माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
| १२० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| कृतव्यवहाराभ्युपगमात्परमार्था- | व्यवहारको अविद्याकृत माना है, | | नभ्युपगमाच्च । तस्मादात्मभेद- | परमार्थरूप नहीं माना । अतः | | परिकल्पना वृथैव तार्किकैः | तार्किकलोग जीवोंके भेदकी कल्पना | | क्रियत इति ॥ ५ ॥ | वृथा ही करते हैं ॥ ५ ॥ |
व्यावहारिक जीवभेद
| कथं पुनरात्मभेदनिमित्त इव | किन्तु एक ही आत्मामें, आत्माओं- | | व्यवहार एकस्मिन्नात्मन्यविद्या- | के भेदके कारण होनेवालेके समान, | | कृत उपपद्यत इति, उच्यते— | अविद्याकृत व्यवहार किस प्रकार | | | सम्भव है ? इसपर कहते हैं— |
रूपकार्यसमाख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै ।
आकाशस्य न भेदोऽस्ति तद्वज्जीवेषु निर्णयः ॥ ६ ॥
[घटादि उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले] भिन्न-भिन्न आकाशोंके रूप, कार्य और नामोंमें तो भेद है, परन्तु आकाशमें तो कोई भेद नहीं है । उसी प्रकार जीवोंके विषयमें भी निश्चय समझना चाहिये ॥ ६ ॥
| यथेहाकाश एकस्मिन्घटकर- | जिस प्रकार इस एक ही | | कापवरकाद्याकाशानामल्पत्वम- | आकाशमें घट, कमण्डलु और मठादि | | हत्त्वादिरूपाणि भिद्यन्ते तथा | आकाशोंके अल्पत्व-महत्त्वादि रूपोंमें | | कार्यमुदकाहरणधारणशयनादि- | भेद है, तथा जहाँ-तहाँ व्यवहारमें | | समाख्याश्च घटाकाशकरकाकाश | उनके किये हुए जल लाना, जल | | इत्याद्यास्तत्कृताश्च भिन्ना दृश्यन्ते । | धारण करना और शयन करना | | तत्र तत्र वै व्यवहारविषय | आदिकार्य एवं घटाकाश करकाकाश | | इत्यर्थः। सर्वोऽयमाकाशे रूपादि- | आदि नाम भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। | | भेदकृतो व्यवहारो न परमार्थ | किन्तु आकाशमें रूपादिके कारण | | | होनेवाला यह सब व्यवहार पार- |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२१
| एव । परमार्थतस्त्वाकाशस्य न भेदोऽस्ति । न चाकाशभेदनिमित्तो व्यवहारोऽस्त्यन्तरेण परोपाधिकृतं द्वारम् । यथैतत्त्वद्देहोपाधिभेदकृतेषु जीवेषु घटाकाशस्थानीयेष्वात्मसु निरूपणात्कृतो बुद्धिमद्भिर्निर्णयो निश्चय इत्यर्थः ॥ ६ ॥ | मार्थिक ही नहीं हैं। परमार्थतः तो आकाशका कोई भेद नहीं है। अन्य उपाधिकृत निमित्तके सिवा वस्तुतः आकाशके भेदके कारण होनेवाला कोई व्यवहार है ही नहीं। जैसा कि यह [ आकाशका भेद ] है उसी प्रकार देहादि उपाधिके भेदसे किये हुए घटाकाशस्थानीय जीवोंमें भेदका निरूपण किया जानेके कारण बुद्धिमानोंने [ उस भेदका अपारमार्थिकत्व ] निश्चय किया है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ६ ॥ |
जीव आत्माका विकार या अवयव नहीं है
| ननु तत्र परमार्थकृत एव घटाकाशादिषु रूपकार्यादिभेदव्यवहार इति ? नैतदस्ति, यस्मात् | किन्तु घटाकाशादिमें जो रूप और कार्य आदिका भेद-व्यवहार है वह तो वास्तविक ही है ? [ ऐसी शंका होनेपर कहते हैं—] यह बात नहीं है, क्योंकि— |
नाकाशस्य घटाकाशो विकारावयवौ यथा ।
नैवात्मनः सदा जीवो विकारावयवौ तथा ॥ ७ ॥
जिस प्रकार घटाकाश आकाशका विकार या अवयव नहीं है उसी प्रकार जीव भी आत्माका विकार या अवयव कभी नहीं है ॥ ७ ॥
| परमार्थाकाशस्य घटाकाशो न विकारः; यथा सुवर्णस्य | परमार्थाकाशका घटाकाश न तो विकार है, जैसे कि सुवर्णके रुचकादि |
| १२२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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रुचकादिर्यथा वाप्रां फेनबुद्- | आभूषण तथा जलके फेन, बुद्बुद बुदाहिमादिः; नाप्यवयवो यथा | और हिम आदि हैं, और न जैसे वृक्षस्य शाखादिः । न तथा | शाखादि वृक्षके अवयव हैं उस आकाशस्य घटाकाशो विकारा- | प्रकार उसका अवयव ही है। इसी वयवौ यथा तथा नैवात्मनः | तरह, जैसे कि महाकाशका घटाकाश परस्य परमार्थसतो महाकाशस्था- | विकार या अवयव नहीं है उसी नीयस्य घटाकाशस्थानीयो जीवः | प्रकार, अर्थात् उपर्युक्त दृष्टान्तानुसार सदा सर्वदा यथोक्तदृष्टान्तवन्न | ही, महाकाशस्थानीय परमार्थ सत् विकारो नाप्यवयवः । अत | परमात्माका घटाकाशस्थानीय जीव, आत्मभेदकृतो व्यवहारो मृषै- | किसी अवस्थामें विकार या अवयव वेत्यर्थः ॥ ७ ॥ | नहीं है । अतः तात्पर्य यह है कि आत्मभेदजनित व्यवहार मिथ्या ही है ॥ ७ ॥
आत्माकी मलिनता अज्ञानियोंकी दृष्टिमें है
यस्माद्यथा घटाकाशादिभेद- | क्योंकि जिस प्रकार घटाकाशादि बुद्धिनिबन्धनो रूपकार्यादिभेद- | भेदबुद्धिके कारण उसका रूप एवं व्यवहारस्तथा देहोपाधिजीवभेद- | कार्य आदि भेदव्यवहार है उसी कृतो जन्ममरणादिव्यवहारः । | प्रकार देहोपाधिक जीवभेदके कारण तस्मात्तत्कृतमेवं क्लेशकर्मफलमल- | ही जन्म-मरण आदि व्यवहार है; वत्त्वमात्मनो न परमार्थत | इसलिये उसका किया हुआ ही इत्येतमर्थं दृष्टान्तेन प्रतिपिपा- | आत्माका क्लेश, कर्मफल और मलसे दयिषन्नाह— | युक्त होना है, परमार्थतः नहीं—इसी बातको दृष्टान्तसे प्रतिपादन करनेकी इच्छासे कहते हैं—
यथा भवति बालानां गगनं मलिनं मलैः । तथा भवत्यबुद्धानामात्मापि मलिनो मलैः ॥ ८ ॥
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२३
जिस प्रकार मूर्ख लोगोंको [ धूलि आदि ] मलके कारण आकाश मलिन जान पड़ता है उसी प्रकार अविवेकी पुरुषोंकी दृष्टिमें आत्मा भी [ राग-द्वेषादि ] मलसे मलिन हो जाता है ॥ ८ ॥
| यथा भवति लोके बालानाम-<br><br>विवेकिनां गगनमाकाशं घन-<br><br>रजोधूमादिमलैर्मलिनं मलवन्न<br><br>गगनं मलवद्याथात्म्यविवेकिनाम्,<br><br>तथा भवत्यात्मा परोऽपि यो<br><br>विज्ञाता प्रत्यक्क्लेशकर्मफलमलै-<br><br>र्मलिनोऽबुद्धानां प्रत्यगात्मविवेक-<br><br>रहितानां नात्मविवेकवताम् ।<br><br>नह्यूषरदेशस्तृड्वत्प्राण्यध्यारो-<br><br>पितोदकफेनतरङ्गादिमांस्तथा<br><br>नात्माबुद्धारोपितक्लेशादिमलै-<br><br>र्मलिनो भवतीत्यर्थः ॥ ८ ॥ | लोकमें जिस प्रकार बाल अर्थात् अविवेकी पुरुषोंकी दृष्टिमें आकाश मेघ, धूलि और धुआँ आदि मलोंके कारण मलिन-मलयुक्त हो जाता है, किन्तु आकाशके यथार्थ स्वरूपको जाननेवालोंकी दृष्टिमें ऐसा नहीं होता; उसी प्रकार अबुद्ध-प्रत्यगात्माके विवेकसे रहित पुरुषोंकी दृष्टिमें, जो प्रत्यक् और सबका साक्षी है वह परात्मा भी क्लेश, कर्म और फलरूप मलोंसे मलिन हो जाता है; किन्तु आत्मज्ञानियोंकी दृष्टिमें ऐसा नहीं होता ।<br><br>तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार ऊसरदेश तृषित प्राणीके आरोपित किये हुए जलके फेन और तरङ्गादि-से युक्त नहीं होता उसी प्रकार आत्मा भी अज्ञानियोंद्वारा आरोपित क्लेशादि मलोंसे मलिन नहीं होता ॥ ८ ॥ |
| पुनरप्युक्तमेवार्थं प्रपञ्चयति— | फिर भी पूर्वोक्त अर्थका ही विस्तार कहते हैं— |
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| १२४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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मरणे सम्भवे चैव गत्यागमनयोरपि ।
स्थितौ सर्वशरीरेषु आकाशेनाविलक्षणः ॥ ९ ॥
यह आत्मा सम्पूर्ण शरीरोंमें मृत्यु, जन्म, लोकान्तरमें गमनागमन और स्थित रहनेमें भी आकाशसे अविलक्षण है। [अर्थात् इन सब व्यवहारोंमें रहते हुए भी यह आकाशके समान निर्विकार और विभु है] ॥९॥
| घटाकाशजन्मनाशगमना- | घटाकाशके जन्म, नाश, गमन, |
| गमनस्थितिवत्सर्वशरीरेष्वात्मनो | आगमन और स्थितिके समान सम्पूर्ण शरीरोंमें आत्माके जन्म-मरणादिको |
| जन्ममरणादिराकाशेनाविलक्षणः | आकाशसे अविलक्षण (भेदरहित) ही अनुभव करना चाहिये—यह |
| प्रत्येतव्य इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | इसका अभिप्राय है ॥ ९ ॥ |
संघाताः स्वप्नवत्सर्वे आत्ममायाविसर्जिताः ।
आधिक्ये सर्वसाम्ये वा नोपपत्तिर्हि विद्यते ॥ १० ॥
देहादि समस्त संघात स्वप्नके समान आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। उनके अपेक्षाकृत उत्कर्ष अथवा सबकी समानतामें भी कोई हेतु नहीं है ॥ १० ॥
| घटादिस्थानीयास्तु देहादि- | घटादिस्थानीय देहादिसंघात |
| संघाताः स्वप्नदृश्यदेहादिवन्मा- | स्वप्नमें दीखनेवाले देहादिके समान |
| याविकृतदेहादिवच्चात्ममायावि- | तथा मायावीके रचे हुए देहादिके |
| सर्जिताः, आत्मनो मायाविद्या | सदृश आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। तात्पर्य यह है कि आत्माकी |
| तया प्रत्युपस्थापिता न परमार्थतः | माया जो अविद्या है उसके प्रस्तुत |
| सन्तीत्यर्थः । यद्याधिक्यमधिक- | किये हुए हैं, परमार्थतः नहीं हैं। |
| भावस्तिर्यग्देहाद्यपेक्षया देवादि- | यदि तिर्यगादि देहोंकी अपेक्षा देवता |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२५
| कार्यकरणसंघातानां यदि वा सर्वेषां समतैव नैषामुपपत्तिः सम्भवः सद्भावप्रतिपादको हेतुर्विद्यते नास्ति, हि यस्मात्तस्मादविद्याकृता एव न परमार्थतः सन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥ | आदिके शरीर और इन्द्रियोंकी अधिकता-उत्कृष्टता है अथवा यदि [ तत्त्वदृष्टिसे ] सबकी समानता ही है, तो भी, क्योंकि उनके सद्भावका प्रतिपादक कोई हेतु नहीं है, इसलिये वे अविद्याकृत ही हैं, परमार्थतः नहीं हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १० ॥ |
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| उत्पत्त्यादिवर्जितस्याद्वयस्यात्मतत्त्वस्य श्रुतिप्रमाणकत्वप्रदर्शनार्थवाक्यान्युपन्यस्यन्ते— | उत्पत्ति आदिसे रहित अद्वितीय आत्मतत्त्वका श्रुतिप्रमाणकत्व प्रदर्शित करनेके लिये [ उपनिषद्के ] वाक्योंका उल्लेख किया जाता है— |
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रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके ।
तेषामात्मा परो जीवः खं यथा संप्रकाशितः ॥ ११ ॥
तैत्तिरीय श्रुतिमें जिन रसादि [ अन्नमयादि ] कोशोंकी व्याख्या की गयी है, आकाशवत् परमात्मा ही उनके आत्मा जीवरूपसे प्रकाशित किया गया है ॥ ११ ॥
| रसादयोऽन्नरसमयः प्राणमय इत्येवमादयः कोशा इव कोशा अस्यादेरिवोत्तरोत्तरस्यापेक्षया बहिर्भावात्पूर्वपूर्वस्य व्याख्याता विस्पष्टमाख्यातास्तैत्तिरीयके तैत्तिरीयकशाखोपनिषद्वल्ल्यां तेषां कोशानामात्मा येनात्मना पञ्चापि | तैत्तिरीयकमें अर्थात् तैत्तिरीयकशाखोपनिषद्वल्लीमें जिन रसादि—अन्नरसमय एवं प्राणमय इत्यादि कोशोंकी व्याख्या—स्पष्ट विवेचना की गयी है और जो उत्तरोत्तरकी अपेक्षा पूर्व-पूर्व बहिःस्थित होनेके कारण खड्गके कोशके समान कोश कहे गये हैं उन कोशोंका आत्मा, |
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| १२६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| कोशा आत्मवन्तोऽन्तरतमेन, स हि सर्वेषां जीवननिमित्तत्वाज्जीवः । | जिस अन्तरतम आत्माके कारण पाँचों कोश आत्मवान् हैं, वही सबके जीवनका निमित्त होनेके कारण 'जीव' कहलाता है । |
| कोऽसावित्याह—पर एवात्मा यः पूर्वं "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० उ० २ । १) इति प्रकृतः। यस्मादात्मनः खममायादिवदाकाशादिक्रमेण रसादयः कोशलक्षणाः संघाता आत्ममायाविसर्जिता इत्युक्तम् । स आत्मास्माभिर्यथा खं तथेति संप्रकाशित "आत्मा ह्याकाशवत्" (अद्वैत० ३) इत्यादिश्लोकैः । न तार्किकपरिकल्पितात्मवत्पुरुषबुद्धिप्रमाणगम्य इत्यभिप्रायः ॥११॥ | वह कौन है ? इसपर कहते हैं—वह परमात्मा ही है, जिसका पहले "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म " इत्यादि वाक्योंमें प्रसङ्ग है और जिस आत्मासे खप्न और माया आदिके समान आकाशादि क्रमसे कोशरूप संघात आत्माकी मायासे ही रचे गये हैं-ऐसा कहा गया है । उस आत्माको हमने "आत्मा ह्याकाशवत्" इत्यादि श्लोकोंमें, जैसा आकाश है उसीके समान प्रकाशित किया है । तात्पर्य यह है कि वह तार्किकोंके कल्पना किये हुए आत्माके समान मनुष्यकी बुद्धिसे प्रमाणित होनेवाला नहीं है ॥ ११ ॥ |
द्वयोर्द्वयोर्मधुज्ञाने परं ब्रह्म प्रकाशितम् ।
पृथिव्यामुदरे चैव यथाकाशः प्रकाशितः ॥ १२ ॥
लोकमें, जिस प्रकार पृथिवी और उदरमें एक ही आकाश प्रकाशित हो रहा है उसी प्रकार [ बृहदारण्योक्त ] मधु ब्राह्मणमें [ अध्यात्म और अधिदैवत-इन ] दोनों स्थानोंमें एक ही ब्रह्म निरूपित किया गया है ॥१२॥
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२७
| किं चाधिदैवमध्यात्मं च तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः पृथिव्याद्यन्तर्गतो यो विज्ञाता पर एवात्मा ब्रह्म सर्वमिति द्वयोर्द्वयोराद्वैतक्षयात्परं ब्रह्म प्रकाशितम् । क्वेत्याह—ब्रह्मविद्याख्यं मध्वमृतममृतत्वं मोदनहेतुत्वाद्विज्ञायते यस्मिन्निति मधुज्ञानं मधुब्राह्मणं तस्मिन्नित्यर्थः। किमिवेत्याह—पृथिव्यामुदरे चैव यथैक आकाशोऽनुमानेन प्रकाशितो लोके तद्वदित्यर्थः ॥ १२ ॥ | तथा अधिदैवत और अध्यात्म-भेदसे जो तेजोमय और अमृतमय पुरुष पृथिवीके भीतर है और जो विज्ञाता परमात्मा ब्रह्म ही सब कुछ है—इस प्रकार द्वैतका क्षय होनेपर्यन्त दोनों स्थानोंमें परब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है । कहाँ किया गया है ? सो बतलाते हैं—जिसमें ब्रह्मविद्यासंज्ञक मधु यानी अमृतका ज्ञान है—आनन्दका हेतु होनेके कारण उसका अमृतत्व है—उस मधुज्ञान यानी मधुब्राह्मणमें [ उसका प्रतिपादन किया गया है ] । किसके समान प्रतिपादन किया है ? इसपर कहते हैं कि जिस प्रकार लोकमें अनुमानसे पृथिवी और उदरमें एक ही आकाश प्रकाशित होता है, उसी तरह [ इनकी एकता समझो ] यह इसका अभिप्राय है ॥ १२ ॥ |
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आत्मैकत्व ही समीचीन है
जीवात्मनोरनन्यत्वमभेदेन प्रशस्यते ।
नानात्वं निन्यते यच्च तदेवं हि समञ्जसम् ॥ १३ ॥
क्योंकि जीव और आत्माके अभेदरूपसे एकत्वकी प्रशंसा की गयी है और उनके नानात्वकी निन्दा की गयी है इसलिये वही [ यानी उनकी एकता ही ] ठीक है ॥ १३ ॥
| १२८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| यद्युक्तितःश्रुतितश्चनिर्धारितं जीवस्य परस्य चात्मनो जीवात्मनोरनन्यत्वमभेदेन प्रशस्यते स्तूयते शास्त्रेण व्यासादिभिश्च । यच्च सर्वप्राणिसाधारणं स्वाभाविकं शास्त्रबहिष्कृतैः कुतार्किकैर्विरचितं नानात्वदर्शनं निन्द्यते “न तु तद्द्वितीयमस्ति” (बृ० उ० । ४ । ३ । २३) “द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १ । ४ । २) “उदरमन्तरं कुरुते, अथ तस्य भयं भवति” (तै० उ० २ । ७ । १) “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृ० उ० २ । ४ । ६, ४ । ५ । ७) “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (क० उ० २ । १ । १०) इत्यादिवाक्यैश्चान्यैश्च ब्रह्मविद्भिः । यच्चैतत्तदेवं हि संमञ्जसमृज्ववबोधं न्याय्यमित्यर्थः । यास्तु तार्किकपरिकल्पिताः कुदृष्टयस्ता अनृज्व्यो निरूप्यमाणा न घटनां प्राञ्चन्तीत्यभिप्रायः ॥ १३ ॥ | क्योंकि युक्ति और श्रुतिसे निश्चय किये हुए जीव और परमात्माके एकत्वकी शास्त्र और व्यासादि मुनियोंने समानरूपसे प्रशंसा यानी स्तुति की है और शास्त्रबाह्य कुतार्किकोंद्वारा कल्पित सर्वप्राणि-साधारण स्वाभाविक नानात्वदर्शनकी “उससे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है” “दूसरेसे निश्चय भय होता है” “जो थोड़ा-सा भी भेद करता है, उसे भय प्राप्त होता है” “यह जो कुछ है सब आत्मा है” “जो यहाँ नानात्वत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है” इत्यादि वाक्यों तथा अन्य ब्रह्मवेत्ताओं-द्वारा निन्दा की गयी है । यह जो [ बतलाया गया ] है वह इसी प्रकार समजस-सरल बोधगम्य अर्थात् न्याययुक्त है । तथा तार्किकोंकी कल्पना की हुई जो कुदृष्टियाँ हैं वे सरल नहीं हैं; अभिप्राय यह है कि वे निरूपण की जानेपर प्रसंगके अनुरूप नहीं ठहरतीं ॥ १३ ॥ |
श्रुत्युक्त जीव-ब्रह्मभेद गौण है
जीवात्मनोः पृथक्त्वं यत्प्रागुत्पत्तेः प्रकीर्तितम् ।
भविष्यद्वृत्त्या गौणं तन्मुख्यत्वं हि न युज्यते ॥ १४ ॥
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२९
पहले (उपनिषदोंके कर्मकाण्डमें) उत्पत्तिबोधक वाक्योंद्वारा जो जीव और परमात्माका पृथक्त्व बतलाया है वह भविष्यद्-वृत्तिसे गौण है, उसे मुख्य अर्थ मानना ठीक नहीं है ॥ १४ ॥
| ननु श्रुत्यापि जीवपरमात्मनोः पृथक्त्वं यत्प्रागुत्पत्तेरुत्पत्त्यर्थोपनिषद्वाक्येभ्यः पूर्वं प्रकीर्तितं कर्मकाण्डे अनेकशः कामभेदत इदंकामोऽदःकाम इति; परश्च “स दाधार पृथिवीं द्याम्” (ऋ०सं० १०।१२१।१) इत्यादिमन्त्रवर्णैः; तत्र कथं कर्मज्ञानकाण्डवाक्यविरोधे ज्ञानकाण्डवाक्यार्थस्यैवैकत्वस्य सामञ्जस्यमवधार्यत इति ? | **शंका—**जब श्रुतिने भी पहले—कर्मकाण्डमें उत्पत्ति-प्रतिपादक उपनिषद्-वाक्योंद्वारा 'इदंकामः' 'अदःकामः' आदि प्रकारसे [कर्मकाण्डमें भिन्न-भिन्न कामनाओंवाले कर्माधिकारी पुरुषके समान] अनेकों कामनाओंके भेदसे जीव और परमात्माका भेद प्रतिपादन किया है तथा परमात्माका “उसने पृथिवी और द्युलोकको धारण किया” इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे पृथक् ही निर्देश किया है, तब इस प्रकार कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्डके वाक्योंमें विरोध उपस्थित होनेपर केवल ज्ञानकाण्डोक्त एकत्वका ही सामञ्जस्य (यथार्थत्व) किस प्रकार निश्चय किया जा सकता है ? |
| अत्रोच्यते—“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” (तै० उ० ३ । १) “यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २ । १ । २०) “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” (तै० उ० २ । १ । २) “तदैक्षत” (छा० उ० ६ । २ । ३) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ० | **समाधान—**इस विषयमें हमारा कथन है कि “जहाँसे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं” “जिस प्रकार अग्निसे नन्हीं-नन्हीं चिनगारियाँ [निकलती हैं]” “उसी इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ” “उसने ईक्षण किया” “उसने तेजको रचा” |
१७-१८
| १३० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० ] |
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| ६ । २ । ३) इत्याद्युत्पत्त्यर्थोपनि- | इत्यादि उत्पादक उपनिषद्वाक्योंसे |
| षद्वाक्येभ्यः प्राक्पृथक्त्वं कर्मकाण्डे | पहले कर्मकाण्डमें जो पृथक्त्वका |
| प्रकीर्तितं यत्तन्न परमार्थम् । किं | प्रतिपादन किया गया है वह |
| तर्हि ? गौणं महाकाशघटा- | परमार्थतः नहीं है। तो कैसा है ? |
| काशादिभेदवत् । यथौदनं | वह महाकाश और घटाकाशादिके |
| पचतीति भविष्यद्वृत्त्या तद्वत् । | भेदके समान गौण है और जिस |
| न हि भेदवाक्यानां कदाचिदपि | प्रकार भविष्यद्वृत्तिसे 'भात पकाता |
| मुख्यभेदार्थत्वमुपपद्यते । स्वाभा- | है'* ऐसा कहा जाता है उसीके |
| विकाविद्यावत्प्राणिभेददृष्ट्यनुवा- | समान है। आत्म-भेदवाक्योंका मुख्य |
| दित्वाद्रास्तभेदवाक्यानाम् । | भेदप्रतिपादकत्व कभी सम्भव नहीं |
| है; क्योंकि भेदवाक्य तो अज्ञानी | |
| जीवोंकी स्वाभाविक भेददृष्टिका ही | |
| अनुवाद करनेवाले हैं। | |
| इह चोपनिषत्सूत्पत्तिप्रलयादि- | यहाँ उपनिषदोंमें तो "तू वह |
| वाक्यैर्जीवपरमात्मनोरेकत्वमेव | है" "यह अन्य है और मैं अन्य |
| प्रतिपिपादयिषितम् "तत्त्वमसि" | हूँ—ऐसा जो जानता है वह |
| (छा० उ० ६ । ८–१६) "अन्योऽ- | नहीं जानता" इत्यादि श्रुतियोंके |
| सावन्योऽहमस्मीति न स वेद" | अनुसार उत्पत्ति-प्रलयादि-बोधक |
| (बृ० उ० १ । ४ । १०) | वाक्योंसे भी जीव और परमा- |
| इत्यादिभिः । अत उपनिषत्सु | त्माका एकत्व ही प्रतिपादन करना |
| एकत्वं श्रुत्या प्रतिपिपादयिषितं | इष्ट है। अतः उपनिषदोंमें श्रुतिको |
| भविष्यतीति भाविनीमेकत्ववृत्ति- | एकत्व ही प्रतिपादन करना इष्ट |
| माश्रित्य लोके भेददृष्ट्यनुवादो | होगा—इस भविष्यद्वृत्तिको आश्रय |
| गौण एवेत्यभिप्रायः । | करके लोकमें भेददृष्टिका अनुवाद |
| गौण ही है—यह इसका अभिप्राय है। |
* 'भात' उबले हुए चावलोंको कहते हैं; जो चावल पकाये जाते हैं उनकी संज्ञा 'भात' नहीं है। अतः इस वाक्यमें जो उनके लिये 'भात' शब्दका प्रयोग हुआ है वह भविष्यदृष्टिसे है।
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १३१
अथ वा "तदैक्षत" (छा० उ० ६।२।३) "तत्तेजोऽसृजत" (छा० उ० ६।२।३) इत्याद्युत्पत्तेः प्राक् "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।२) इत्येकत्वं प्रकीर्तितम् । तदेव च "तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८-१६) इत्येकत्वं भविष्यतीति तां भविष्यद्वृत्तिमपेक्ष्य यज्जीवात्मनोः पृथक्त्वं यत्र क्वचिद्वाक्ये गम्यमानं तद्गौणम्, यथौदनं पचतीति तद्वत् ॥१४॥
अथवा "उसने ईक्षण किया" "उसने तेजको रचा" इत्यादि श्रुतियोंद्वारा जो उत्पत्तिसे पूर्व "एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि प्रकारसे एकत्वका निरूपण किया है वह "वह सत्य है, वह आत्मा है और वही तू है" इस प्रकार आगे एकत्व हो जायगा इस भविष्यद्वृत्तिसे जहाँ-कहीं किसी वाक्यमें जीव और आत्माका पृथक्त्व जाना गया है उसी प्रकार-गौण है, जैसे कि 'भात पकाता है' इस वाक्यमें [ 'भात' शब्दका प्रयोग ] ॥ १४ ॥
दृष्टान्तयुक्त उत्पत्ति-श्रुतिकी व्यवस्था
ननु यद्युत्पत्तेः प्रागजं सर्वमेकमेवाद्वितीयं तथाप्युत्पत्तेरूर्ध्वं जातमिदं सर्वं जीवाश्च भिन्ना इति, नैवम्; अन्यार्थत्वादुत्पत्तिश्रुतीनाम् । पूर्वमपि परिहृत एवायं दोषः स्वप्नवदात्ममायाविसर्जिताः संघाता घटाकाशोत्पत्तिभेदादिवज्जीवानामुत्पत्तिभेदादिरिति । इत श्चोत्पत्ति-
यदि कहो कि उत्पत्तिसे पूर्व तो सब अजन्मा तथा एक ही अद्वितीय है तथापि उसके पीछे तो सब उत्पन्न हुआ ही है और तब जीव भी भिन्न ही हैं-तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उत्पत्तिसूचक श्रुतियाँ दूसरे ही अभिप्रायसे हैं । 'देहादिसंघात स्वप्नके समान आत्माकी मायासे ही प्रस्तुत किये हुए हैं' तथा 'घटाकाशकी उत्पत्तिसे होनेवाले भेदके समान जीवोंकी उत्पत्तिके भेद हैं' इन वाक्योंद्वारा पहले भी इस दोषका परिहार किया ही जा चुका है । इसीलिये पूर्वोक्त उत्पत्ति-भेदादिसूचक श्रुतियोंसे उन-
| १३२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| भेदादिश्रुतिभ्य आकृष्य इह पुनरुत्पत्तिश्रुतीनामैदंपर्यं प्रतिपिपादयिषयोपन्यासः— | का निष्कर्ष लेकर यहाँ फिर उन उत्पत्तिश्रुतियोंका ब्रह्मात्मैक्यपरत्व प्रतिपादन करनेकी इच्छासे उपन्यास किया जाता है— |
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मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः सृष्टिर्या चोदितान्यथा ।
उपायः सोऽवताराय नास्ति भेदः कथंचन ॥ १५ ॥
[ उपनिषदोंमें ] जो मृत्तिका, लोहखण्ड और विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्तोंद्वारा भिन्न-भिन्न प्रकारसे सृष्टिका निरूपण किया है वह [ ब्रह्मात्मैक्यमें ] बुद्धिका प्रवेश करानेका उपाय है; वस्तुतः उनमें कुछ भी भेद नहीं है ॥ १५ ॥
| मृल्लोहविस्फुलिङ्गादिदृष्टान्तोपन्यासैः सृष्टिर्या चोदिता प्रकाशितान्यान्यथा च स सर्वः सृष्टिप्रकारो जीवपरमात्मैकत्वबुद्ध्यवतारायोपायोऽस्माकम् । यथा प्राणसंवादे वागाद्यासुरपाप्मवेधाद्याख्यायिका कल्पिता प्राणवैशिष्ट्यबोधावताराय । | मृत्तिका, लोहपिण्ड और विस्फुलिङ्गादिके दृष्टान्तोंका उपन्यास करके जो भिन्न-भिन्न प्रकारसे सृष्टिको प्रकाशित अर्थात् कल्पित किया गया है वह सृष्टिका सम्पूर्ण प्रकार हमें जीव और परमात्माका एकत्व निश्चय करानेवाली बुद्धि प्राप्त करानेके लिये है, जिस प्रकार कि प्राणसंवादमें प्राणकी उत्कृष्टताका बोध करानेके लिये वागादि इन्द्रियोंके असुरोंद्वारा पापसे विद्ध हो जानेकी आख्यायिका* कल्पना की गयी है । |
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* छान्दोग्य उपनिषद्के प्रथम प्रपाठकके द्वितीय खण्डमें यह आख्यायिका इस प्रकार आयी है—एक बार देवताओंका असुरोंके साथ युद्ध छिड़ गया । यहाँ असुरसे मनकी राजसवृत्ति और देवतासे सात्त्विकवृत्ति समझनी चाहिये । इन दोनों वृत्तियोंका पारस्परिक युद्ध चिरप्रसिद्ध है । देवताओंने असुरोंको उद्गीथविद्याके प्रभावसे परास्त करना चाहा । अतः उन्होंने वाक् आदि प्रत्येक
| शां०भा० ] | अद्वैतप्रकरण | १३३ |
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| तदप्यसिद्धमिति चेत् । | **पूर्व०—**परन्तु यह बात भी तो सिद्ध नहीं हो सकती ।* |
| न; शाखाभेदेष्वन्यथान्यथा च प्राणादिसंवादश्रवणात् । यदि हि संवादः परमार्थ एवाभूदेकरूप एव संवादः सर्वशाखास्वश्रोष्यत विरुद्धानेकप्रकारेण नाश्रोष्यत । श्रूयते तु; तस्मान्न तादर्थ्यं संवादश्रुतीनाम् । तथोत्पत्तिवाक्यानि प्रत्येयानि । | **सिद्धान्ती—**नहीं; भिन्न-भिन्न शाखाओंमें भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्राण-संवाद सुना जानेके कारण [उसका यही तात्पर्य होना चाहिये ] ।† यदि यह संवाद वस्तुतः हुआ होता तो सम्पूर्ण शाखाओंमें एक ही संवाद सुना जाता, परस्पर विरुद्ध भिन्न-भिन्न प्रकारसे नहीं। परन्तु ऐसा सुना ही जाता है; इसलिये संवादश्रुतियोंका तात्पर्य यथाश्रुत अर्थमें नहीं है। इसी प्रकार उत्पत्ति-वाक्य भी समझने चाहिये । |
| कल्पसर्गभेदात्संवादश्रुतीनामुत्पत्तिश्रुतीनां च प्रतिसर्गमन्यथात्वमिति चेत् ? | **पूर्व०—**प्रत्येक कल्पकी सृष्टिके भेदके कारण संवादश्रुति और उत्पत्ति-श्रुतियोंमें प्रत्येक सर्गके अनुसार भेद है—यदि ऐसा मानें तो ? |
इन्द्रियको एक-एक करके उद्गीथ-गानमें नियुक्त किया; किन्तु प्रत्येक ही इन्द्रिय स्वार्थपरताके पापसे असुरोंके सामने पराभूत हो गयी। अन्तमें मुख्य प्राणको नियुक्त किया गया। वह सभीके लिये समान भावसे सामगान करने लगा; अतः असुरगण उसका कुछ भी न बिगाड़ सके और देवताओंको विजय प्राप्त हुई।
* अर्थात् उन आख्यायिकाओंका तात्पर्य प्राणकी उत्कृष्टताका बोध करानेमें ही है।
† इसी आशयकी एक आख्यायिका बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ६ ब्राह्मण १ में और दूसरी बृह० उ० अध्याय १ ब्राह्मण ३ में भी है।
| १३७ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| न; निष्प्रयोजनत्वायथोक्त-<br>बुद्ध्यवतारप्रयोजनव्यतिरेकेण ।<br>न ह्यन्यप्रयोजनवत्त्वं संवादा-<br>त्पत्तिश्रुतीनां शक्यं कल्पयितुम् ।<br>तथात्वप्रतिपत्तये ध्यानार्थ-<br>मिति चेन्न; कलहोत्पत्तिप्रलयानां<br>प्रतिपत्तेरनिष्टत्वात् । तस्मा-<br>दुत्पत्त्यादिश्रुतय आत्मैकत्व-<br>बुद्ध्यवतारायैव नान्यार्थाः<br>कल्पयितुं युक्ताः । अतो<br>नास्त्युत्पत्त्यादिकृतो भेदः<br>कथंचन ॥ १५ ॥ | **सिद्धान्ती—**नहीं, क्योंकि श्रुतिका उपर्युक्त [ब्रह्मात्मैकत्वमें] बुद्धिप्रवेशरूप प्रयोजनके अतिरिक्त अन्य कोई प्रयोजन ही नहीं है । प्राणसंवाद और उत्पत्तिश्रुतियोंका इसके सिवा और कोई प्रयोजन नहीं कल्पना किया जा सकता । यदि कहो कि उनकी तद्रूपता प्राप्त करनेके प्रयोजनसे ध्यानके लिये ऐसा कहा गया है, तो ऐसा भी सम्भव नहीं है, क्योंकि कलह तथा उत्पत्ति या प्रलयकी प्राप्ति किसीको इष्ट नहीं हो सकती । अतः उत्पत्ति आदि प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ आत्मैकत्वरूप बुद्धिकी प्राप्तिके ही लिये हैं, उन्हें किसी और प्रयोजनके लिये मानना उचित नहीं है । अतः उत्पत्ति आदिके कारण होनेवाला भेद कुछ भी नहीं है ॥ १५ ॥ |
त्रिविध अधिकारी और उनके लिये उपासनाविधि
| यदि पर एवात्मा नित्यशुद्ध-<br>बुद्धमुक्तस्वभाव एकः परमार्थः<br>सन् "एकमेवाद्वितीयम्" (छा०<br>उ० ६ । २ । २). इत्यादि-<br>श्रुतिभ्योऽसदन्यत्किमर्थेयमुपा-<br>सनोपदष्टा "आत्मा वा अरे<br>द्रष्टव्यः" (बृ० उ० २ । ४ । ५) | **शंका—**यदि "एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार परमार्थतः एकमात्र नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमात्मा ही सत्य है, अन्य सब मिथ्या है, तो "अरे, इस आत्माका साक्षात्कार करना चाहिये" "जो |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १९५
| "य आत्मापहतपाप्मा" (छा० उ० ८।७।१, ३) "स क्रतुं कुर्वीत" (छा० उ० ३।१४।१) "आत्मेत्येवोपासीत" (बृ० उ० १।४।७) इत्यादिश्रुतिभ्यः, कर्माणि चाग्निहोत्रादीनि ?<br><br>श्रृणु तत्र कारणम्— | आत्मा पापरहित है" "वह (अधिकारी) क्रतु (उपास्यासम्बन्धी संकल्प) करे" "आत्मा है-इस प्रकार ही उपासना करे" इत्यादि श्रुतियोंद्वारा इस उपासनाका उपदेश क्यों दिया गया है ? तथा अग्निहोत्रादि कर्म भी क्यों बतलाये गये हैं ?<br><br>समाधान—इसमें जो कारण है, सो सुनो— |
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आश्रमास्त्रिविधा हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः ।
उपासनोपदिष्टेयं तदर्थमनुकम्पया ॥ १६ ॥
आश्रम (अधिकारी पुरुष) तीन प्रकारके हैं—हीन, मध्यम और उत्कृष्ट दृष्टिवाले। उनपर कृपा करके उन्हींके लिये यह उपासना उपदेश की गयी है ॥ १६ ॥
| आश्रमा आश्रमिणोऽधिकृताः, वर्णिनश्च मार्गगाः, आश्रमशब्दस्य प्रदर्शनार्थत्वात्त्रिविधाः। कथम् ? हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः । हीना निकृष्टा मध्यमोत्कृष्टा च दृष्टिर्दर्शनसामर्थ्यं येषां ते मन्दमध्यमोत्तमबुद्धिसामर्थ्योपेता इत्यर्थः । | आश्रमाः—कर्माधिकारी आश्रमी एवं सन्मार्गगामी वर्णीलोग—क्योंकि 'आश्रम' शब्द उनका भी उपलक्षण करानेवाला है—तीन प्रकारके हैं। किस प्रकार ?—हीन, मध्यम और उत्कृष्ट दृष्टिवाले। अर्थात् जिनकी दृष्टि यानी दर्शनसामर्थ्य हीन—निकृष्ट, मध्यम और उत्कृष्ट है ऐसे मन्द, मध्यम और उत्तम बुद्धिकी सामर्थ्यसे सम्पन्न है। |
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| १२६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| उपासनोपदिष्टेयं तदर्थं मन्द-मध्यमदृष्ट्याश्रमाद्यर्थं कर्माणि च, न चात्मैक एवाद्वितीय इति निश्चितोत्तमदृष्ट्यर्थं दयालुना वेदेनानुकम्पया सन्मार्गगाः सन्तः कथमिमामुत्तमामेकत्वदृष्टिं प्राप्नुयुरिति । “यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते” (के० उ० १ । ५) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८-१६) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ १६ ॥ | उन मन्द और मध्यम दृष्टिवाले आश्रमादिके लिये ही इस उपासना और कर्मका उपदेश किया गया है, 'आत्मा एक और अद्वितीय ही है' ऐसी जिनकी निश्चित उत्तम दृष्टि है, उनके लिये उसका उपदेश नहीं है । दयालु वेदने उसका इसीलिये उपदेश किया है कि जिससे वे किसी प्रकार सन्मार्गगामी होकर “जिसका मनसे मनन नहीं किया जा सकता, बल्कि जिसके द्वारा मन मनन किया कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान; यह, जिसकी तू उपासना करता है, ब्रह्म नहीं है” “वह तू है” “यह सब आत्मा ही है” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा प्रतिपादित इस उत्तम एकत्व-दृष्टिको प्राप्त कर सकें ॥ १६ ॥ |
अद्वैतात्मदर्शन किसीका विरोधी नहीं है
| शास्त्रोपपत्तिभ्यामवधारितत्वादद्वयात्मदर्शनं सम्यग्दर्शनं तद्बाह्यत्वान्मिथ्यादर्शनमन्यत् । इतश्च मिथ्यादर्शनं द्वैतिनां रागद्वेषादिदोषास्पदत्वात् । कथम् ? | शास्त्र और युक्तिसे निश्चित होनेके कारण अद्वितीय आत्मदर्शन ही सम्यग्दर्शन है, उससे बाह्य होनेके कारण और सब दर्शन मिथ्या हैं । द्वैतवादियोंके दर्शन इसलिये भी मिथ्या हैं, क्योंकि वे राग-द्वेषादि दोषोंके आश्रय हैं; किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं]— |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १३७
स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु द्वैतिनो निश्चिता दृढम् । परस्परं विरुध्यन्ते तैरयं न विरुध्यते ॥ १७ ॥
द्वैतवादी अपने-अपने सिद्धान्तोंकी व्यवस्थामें दृढ आग्रही होनेके कारण आपसमें विरोध रखते हैं; परन्तु यह [ अद्वैतात्मदर्शन ] उनसे विरोध नहीं रखता ॥ १७ ॥
| स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु स्वसिद्धान्तरचनानियमेषु कपिलकणादबुद्धार्हतादिदृष्ट्यनुसारिणो द्वैतिनो निश्चिताः । एवमेवैष परमार्थो नान्यथेति तत्र तत्रानुरक्ताः प्रतिपक्षं चात्मनः पश्यन्तस्तं द्विषन्त इत्येवं रागद्वेषोपेताः स्वसिद्धान्तदर्शननिमित्तम् एव परस्परमन्योन्यं विरुध्यन्ते । | स्वसिद्धान्तव्यवस्थामें अर्थात् अपने-अपने सिद्धान्तकी रचनाके नियमोंमें कपिल, कणाद, बुद्ध और अर्हत् (जिन) की दृष्टियोंका अनुसरण करनेवाले द्वैतवादी निश्चित हैं; अर्थात् यह परमार्थतत्त्व इसी प्रकार है अन्यथा नहीं—इस प्रकार अपने-अपने सिद्धान्तमें अनुरक्त हो अपने प्रतिपक्षीको देखकर उससे द्वेष करते हैं। इस तरह राग-द्वेषसे युक्त हो अपने-अपने सिद्धान्तके दर्शनके कारण ही परस्पर एक-दूसरेसे विरोध मानते हैं। |
| तैरन्योन्यविरोधिभिरस्मदीयोऽयं वैदिकः सर्वानन्यत्वादात्मैकत्वदर्शनपक्षो न विरुध्यते यथा स्वहस्तपादादिभिः । एवं रागद्वेषादिदोषानास्पदत्वादात्मैकत्वबुद्धिरेव सम्यग्दर्शनमित्यभिप्रायः ॥ १७ ॥ | उन परस्पर विरोध माननेवालोंसे हमारा यह आत्मैकत्वदर्शनरूप वैदिकसिद्धान्त सबसे अभिन्न होनेके कारण विरोध नहीं मानता; जिस प्रकार कि अपने हाथ-पाँव आदिसे किसीका विरोध नहीं होता। इस प्रकार राग-द्वेषादि दोषोंका आश्रय न होनेके कारण आत्मैकत्वबुद्धि ही सम्यग्दृष्टि है—यह इसका तात्पर्य है ॥ १७ ॥ |
| १३८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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अद्वैतात्मदर्शनके अविरोधी होनेमें हेतु
| केन हेतुना तैर्न विरुध्यत इत्युच्यते— | जिस कारण उनसे इसका विरोध नहीं है—इसपर कहते हैं— |
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अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं तद्भेद उच्यते ।
तेषामुभयथा द्वैतं तेनायं न विरुध्यते ॥ १८ ॥
अद्वैत परमार्थ है और द्वैत उसीका भेद (कार्य) कहा जाता है, तथा उन (द्वैतवादियों) के मतमें [परमार्थ और अपरमार्थ] दोनों प्रकारसे द्वैत ही है; इसलिये उनसे इसका विरोध नहीं है ॥ १८ ॥
| अद्वैतं परमार्थो हि यस्मादद्वैतं नानात्वं तस्याद्वैतस्य भेदस्तद्भेदस्तस्य कार्यमित्यर्थः। “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । २) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ० ६ । २ । ३) इति श्रुतेः उपपत्तेश्च स्वचित्तस्पन्दनाभावे समाधौ मूर्च्छायां सुषुप्तौ चाभावात् । अतस्तद्भेद उच्यते द्वैतम् । | अद्वैत परमार्थ है; और क्योंकि द्वैत यानी नानात्व उस अद्वैतका भेद अर्थात् उसका कार्य है, जैसा कि “एकमेवाद्वितीयम्” “तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि श्रुतियोंसे तथा समाधि मूर्च्छा अथवा सुषुप्तिमें अपने चित्तके स्फुरणका अभाव हो जानेपर द्वैतका भी अभाव हो जानेके कारण युक्तिसे भी सिद्ध होता है; इसलिये द्वैत उसका भेद कहा जाता है। | | द्वैतिनां तु तेषां परमार्थतश्चापरमार्थतश्चोभयथापि द्वैतमेव । यदि च तेषां भ्रान्तानां द्वैतदृष्टिरस्माकमद्वैतदृष्टिरभ्रान्तानाम्, तेनायं हेतुनास्मत्पक्षो न विरुध्यते तैः । “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” (बृ० उ० २ । | किन्तु उन द्वैतवादियोंकी दृष्टिमें तो परमार्थतः और अपरमार्थतः दोनों प्रकार द्वैत ही है। यदि उन भ्रान्त पुरुषोंकी द्वैतदृष्टि है और हम भ्रमहीनोंकी अद्वैतदृष्टि है तो इस कारणसे ही हमारे पक्षका उनसे विरोध नहीं है। “इन्द्र: मायासे अनेक रूप धारण करता है” |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १३९
| ५।१९) “न तु तद्द्वितीयमस्ति” (बृ० उ० ४।३।२३) इति श्रुतेः। | “उससे भिन्न दूसरा है ही नहीं” इत्यादि श्रुतियोंसे भी यही प्रमाणित होता है। |
| यथा मत्तगजारूढ उन्मत्तं भूमिष्ठं प्रतिगजारूढोऽहं गजं वाहय मां प्रतीति ब्रुवाणमपि तं प्रति न वाहयत्यविरोधबुद्ध्या तद्वत्। ततः परमार्थतो ब्रह्मविदात्मैव द्वैतिनाम्। तेनायं हेतुनास्मत्पक्षो न विरुध्यते तैः ॥ १८ ॥ | जिस प्रकार मतवाले हाथीपर चढ़ा हुआ पुरुष किसी उन्मत्त भूमिस्थ मनुष्यके प्रति, उसके ऐसा कहनेपर भी कि ‘मैं तेरे प्रतिद्वन्द्वी हाथीपर चढ़ा हुआ हूँ तू अपना हाथी मेरी ओर बढ़ा दे’ विरोधबुद्धि न होनेके कारण उसकी ओर हाथी नहीं ले जाता, उसी प्रकार [हमारा भी उनसे विरोध नहीं है]। तब, परमार्थतः तो ब्रह्मवेत्ता द्वैतवादियोंका भी आत्मा ही है। इसीसे अर्थात् इसी कारण उनसे हमारे पक्षका विरोध नहीं है ॥ १८ ॥ |
आत्मामें भेद मायाहीके कारण है
| द्वैतमद्वैतभेद इत्युक्ते द्वैतमप्यद्वैतवत्परमार्थसदिति स्यात् कस्यचिदाशङ्केत्यत आह— | द्वैत-अद्वैतका भेद है—ऐसा कहनेपर किसी-किसीको शंका हो सकती है कि अद्वैतके समान द्वैत भी परमार्थ सत् ही होना चाहिये—इसलिये कहते हैं— |
मायया भिद्यते ह्येतन्नान्यथाजं कथञ्चन ।
तत्त्वतो भिद्यमाने हि मर्त्यताममृतं व्रजेत् ॥ १९ ॥
इस अजन्मा अद्वैतमें मायाहीके कारण भेद है और किसी प्रकार नहीं; यदि इसमें वास्तविक भेद होता तो यह अमृतस्वरूप मरणशीलताको प्राप्त हो जाता ॥ १९ ॥