माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| १३७ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| न; निष्प्रयोजनत्वायथोक्त-<br>बुद्ध्यवतारप्रयोजनव्यतिरेकेण ।<br>न ह्यन्यप्रयोजनवत्त्वं संवादा-<br>त्पत्तिश्रुतीनां शक्यं कल्पयितुम् ।<br>तथात्वप्रतिपत्तये ध्यानार्थ-<br>मिति चेन्न; कलहोत्पत्तिप्रलयानां<br>प्रतिपत्तेरनिष्टत्वात् । तस्मा-<br>दुत्पत्त्यादिश्रुतय आत्मैकत्व-<br>बुद्ध्यवतारायैव नान्यार्थाः<br>कल्पयितुं युक्ताः । अतो<br>नास्त्युत्पत्त्यादिकृतो भेदः<br>कथंचन ॥ १५ ॥ | **सिद्धान्ती—**नहीं, क्योंकि श्रुतिका उपर्युक्त [ब्रह्मात्मैकत्वमें] बुद्धिप्रवेशरूप प्रयोजनके अतिरिक्त अन्य कोई प्रयोजन ही नहीं है । प्राणसंवाद और उत्पत्तिश्रुतियोंका इसके सिवा और कोई प्रयोजन नहीं कल्पना किया जा सकता । यदि कहो कि उनकी तद्रूपता प्राप्त करनेके प्रयोजनसे ध्यानके लिये ऐसा कहा गया है, तो ऐसा भी सम्भव नहीं है, क्योंकि कलह तथा उत्पत्ति या प्रलयकी प्राप्ति किसीको इष्ट नहीं हो सकती । अतः उत्पत्ति आदि प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ आत्मैकत्वरूप बुद्धिकी प्राप्तिके ही लिये हैं, उन्हें किसी और प्रयोजनके लिये मानना उचित नहीं है । अतः उत्पत्ति आदिके कारण होनेवाला भेद कुछ भी नहीं है ॥ १५ ॥ |
त्रिविध अधिकारी और उनके लिये उपासनाविधि
| यदि पर एवात्मा नित्यशुद्ध-<br>बुद्धमुक्तस्वभाव एकः परमार्थः<br>सन् "एकमेवाद्वितीयम्" (छा०<br>उ० ६ । २ । २). इत्यादि-<br>श्रुतिभ्योऽसदन्यत्किमर्थेयमुपा-<br>सनोपदष्टा "आत्मा वा अरे<br>द्रष्टव्यः" (बृ० उ० २ । ४ । ५) | **शंका—**यदि "एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार परमार्थतः एकमात्र नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमात्मा ही सत्य है, अन्य सब मिथ्या है, तो "अरे, इस आत्माका साक्षात्कार करना चाहिये" "जो |