भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १९५


"य आत्मापहतपाप्मा" (छा० उ० ८।७।१, ३) "स क्रतुं कुर्वीत" (छा० उ० ३।१४।१) "आत्मेत्येवोपासीत" (बृ० उ० १।४।७) इत्यादिश्रुतिभ्यः, कर्माणि चाग्निहोत्रादीनि ?<br><br>श्रृणु तत्र कारणम्—आत्मा पापरहित है" "वह (अधिकारी) क्रतु (उपास्यासम्बन्धी संकल्प) करे" "आत्मा है-इस प्रकार ही उपासना करे" इत्यादि श्रुतियोंद्वारा इस उपासनाका उपदेश क्यों दिया गया है ? तथा अग्निहोत्रादि कर्म भी क्यों बतलाये गये हैं ?<br><br>समाधान—इसमें जो कारण है, सो सुनो—

आश्रमास्त्रिविधा हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः ।
उपासनोपदिष्टेयं तदर्थमनुकम्पया ॥ १६ ॥

आश्रम (अधिकारी पुरुष) तीन प्रकारके हैं—हीन, मध्यम और उत्कृष्ट दृष्टिवाले। उनपर कृपा करके उन्हींके लिये यह उपासना उपदेश की गयी है ॥ १६ ॥

आश्रमा आश्रमिणोऽधिकृताः, वर्णिनश्च मार्गगाः, आश्रमशब्दस्य प्रदर्शनार्थत्वात्त्रिविधाः। कथम् ? हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः । हीना निकृष्टा मध्यमोत्कृष्टा च दृष्टिर्दर्शनसामर्थ्यं येषां ते मन्दमध्यमोत्तमबुद्धिसामर्थ्योपेता इत्यर्थः ।आश्रमाः—कर्माधिकारी आश्रमी एवं सन्मार्गगामी वर्णीलोग—क्योंकि 'आश्रम' शब्द उनका भी उपलक्षण करानेवाला है—तीन प्रकारके हैं। किस प्रकार ?—हीन, मध्यम और उत्कृष्ट दृष्टिवाले। अर्थात् जिनकी दृष्टि यानी दर्शनसामर्थ्य हीन—निकृष्ट, मध्यम और उत्कृष्ट है ऐसे मन्द, मध्यम और उत्तम बुद्धिकी सामर्थ्यसे सम्पन्न है।