भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 156
१२६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
उपासनोपदिष्टेयं तदर्थं मन्द-मध्यमदृष्ट्याश्रमाद्यर्थं कर्माणि च, न चात्मैक एवाद्वितीय इति निश्चितोत्तमदृष्ट्यर्थं दयालुना वेदेनानुकम्पया सन्मार्गगाः सन्तः कथमिमामुत्तमामेकत्वदृष्टिं प्राप्नुयुरिति । “यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते” (के० उ० १ । ५) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८-१६) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ १६ ॥उन मन्द और मध्यम दृष्टिवाले आश्रमादिके लिये ही इस उपासना और कर्मका उपदेश किया गया है, 'आत्मा एक और अद्वितीय ही है' ऐसी जिनकी निश्चित उत्तम दृष्टि है, उनके लिये उसका उपदेश नहीं है । दयालु वेदने उसका इसीलिये उपदेश किया है कि जिससे वे किसी प्रकार सन्मार्गगामी होकर “जिसका मनसे मनन नहीं किया जा सकता, बल्कि जिसके द्वारा मन मनन किया कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान; यह, जिसकी तू उपासना करता है, ब्रह्म नहीं है” “वह तू है” “यह सब आत्मा ही है” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा प्रतिपादित इस उत्तम एकत्व-दृष्टिको प्राप्त कर सकें ॥ १६ ॥

अद्वैतात्मदर्शन किसीका विरोधी नहीं है

शास्त्रोपपत्तिभ्यामवधारितत्वादद्वयात्मदर्शनं सम्यग्दर्शनं तद्बाह्यत्वान्मिथ्यादर्शनमन्यत् । इतश्च मिथ्यादर्शनं द्वैतिनां रागद्वेषादिदोषास्पदत्वात् । कथम् ?शास्त्र और युक्तिसे निश्चित होनेके कारण अद्वितीय आत्मदर्शन ही सम्यग्दर्शन है, उससे बाह्य होनेके कारण और सब दर्शन मिथ्या हैं । द्वैतवादियोंके दर्शन इसलिये भी मिथ्या हैं, क्योंकि वे राग-द्वेषादि दोषोंके आश्रय हैं; किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं]—