माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 157, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 157
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १३७
स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु द्वैतिनो निश्चिता दृढम् । परस्परं विरुध्यन्ते तैरयं न विरुध्यते ॥ १७ ॥
द्वैतवादी अपने-अपने सिद्धान्तोंकी व्यवस्थामें दृढ आग्रही होनेके कारण आपसमें विरोध रखते हैं; परन्तु यह [ अद्वैतात्मदर्शन ] उनसे विरोध नहीं रखता ॥ १७ ॥
| स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु स्वसिद्धान्तरचनानियमेषु कपिलकणादबुद्धार्हतादिदृष्ट्यनुसारिणो द्वैतिनो निश्चिताः । एवमेवैष परमार्थो नान्यथेति तत्र तत्रानुरक्ताः प्रतिपक्षं चात्मनः पश्यन्तस्तं द्विषन्त इत्येवं रागद्वेषोपेताः स्वसिद्धान्तदर्शननिमित्तम् एव परस्परमन्योन्यं विरुध्यन्ते । | स्वसिद्धान्तव्यवस्थामें अर्थात् अपने-अपने सिद्धान्तकी रचनाके नियमोंमें कपिल, कणाद, बुद्ध और अर्हत् (जिन) की दृष्टियोंका अनुसरण करनेवाले द्वैतवादी निश्चित हैं; अर्थात् यह परमार्थतत्त्व इसी प्रकार है अन्यथा नहीं—इस प्रकार अपने-अपने सिद्धान्तमें अनुरक्त हो अपने प्रतिपक्षीको देखकर उससे द्वेष करते हैं। इस तरह राग-द्वेषसे युक्त हो अपने-अपने सिद्धान्तके दर्शनके कारण ही परस्पर एक-दूसरेसे विरोध मानते हैं। |
| तैरन्योन्यविरोधिभिरस्मदीयोऽयं वैदिकः सर्वानन्यत्वादात्मैकत्वदर्शनपक्षो न विरुध्यते यथा स्वहस्तपादादिभिः । एवं रागद्वेषादिदोषानास्पदत्वादात्मैकत्वबुद्धिरेव सम्यग्दर्शनमित्यभिप्रायः ॥ १७ ॥ | उन परस्पर विरोध माननेवालोंसे हमारा यह आत्मैकत्वदर्शनरूप वैदिकसिद्धान्त सबसे अभिन्न होनेके कारण विरोध नहीं मानता; जिस प्रकार कि अपने हाथ-पाँव आदिसे किसीका विरोध नहीं होता। इस प्रकार राग-द्वेषादि दोषोंका आश्रय न होनेके कारण आत्मैकत्वबुद्धि ही सम्यग्दृष्टि है—यह इसका तात्पर्य है ॥ १७ ॥ |