माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १३८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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अद्वैतात्मदर्शनके अविरोधी होनेमें हेतु
| केन हेतुना तैर्न विरुध्यत इत्युच्यते— | जिस कारण उनसे इसका विरोध नहीं है—इसपर कहते हैं— |
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अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं तद्भेद उच्यते ।
तेषामुभयथा द्वैतं तेनायं न विरुध्यते ॥ १८ ॥
अद्वैत परमार्थ है और द्वैत उसीका भेद (कार्य) कहा जाता है, तथा उन (द्वैतवादियों) के मतमें [परमार्थ और अपरमार्थ] दोनों प्रकारसे द्वैत ही है; इसलिये उनसे इसका विरोध नहीं है ॥ १८ ॥
| अद्वैतं परमार्थो हि यस्मादद्वैतं नानात्वं तस्याद्वैतस्य भेदस्तद्भेदस्तस्य कार्यमित्यर्थः। “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । २) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ० ६ । २ । ३) इति श्रुतेः उपपत्तेश्च स्वचित्तस्पन्दनाभावे समाधौ मूर्च्छायां सुषुप्तौ चाभावात् । अतस्तद्भेद उच्यते द्वैतम् । | अद्वैत परमार्थ है; और क्योंकि द्वैत यानी नानात्व उस अद्वैतका भेद अर्थात् उसका कार्य है, जैसा कि “एकमेवाद्वितीयम्” “तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि श्रुतियोंसे तथा समाधि मूर्च्छा अथवा सुषुप्तिमें अपने चित्तके स्फुरणका अभाव हो जानेपर द्वैतका भी अभाव हो जानेके कारण युक्तिसे भी सिद्ध होता है; इसलिये द्वैत उसका भेद कहा जाता है। | | द्वैतिनां तु तेषां परमार्थतश्चापरमार्थतश्चोभयथापि द्वैतमेव । यदि च तेषां भ्रान्तानां द्वैतदृष्टिरस्माकमद्वैतदृष्टिरभ्रान्तानाम्, तेनायं हेतुनास्मत्पक्षो न विरुध्यते तैः । “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” (बृ० उ० २ । | किन्तु उन द्वैतवादियोंकी दृष्टिमें तो परमार्थतः और अपरमार्थतः दोनों प्रकार द्वैत ही है। यदि उन भ्रान्त पुरुषोंकी द्वैतदृष्टि है और हम भ्रमहीनोंकी अद्वैतदृष्टि है तो इस कारणसे ही हमारे पक्षका उनसे विरोध नहीं है। “इन्द्र: मायासे अनेक रूप धारण करता है” |