भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १३९


५।१९) “न तु तद्द्वितीयमस्ति” (बृ० उ० ४।३।२३) इति श्रुतेः।“उससे भिन्न दूसरा है ही नहीं” इत्यादि श्रुतियोंसे भी यही प्रमाणित होता है।
यथा मत्तगजारूढ उन्मत्तं भूमिष्ठं प्रतिगजारूढोऽहं गजं वाहय मां प्रतीति ब्रुवाणमपि तं प्रति न वाहयत्यविरोधबुद्ध्या तद्वत्। ततः परमार्थतो ब्रह्मविदात्मैव द्वैतिनाम्। तेनायं हेतुनास्मत्पक्षो न विरुध्यते तैः ॥ १८ ॥जिस प्रकार मतवाले हाथीपर चढ़ा हुआ पुरुष किसी उन्मत्त भूमिस्थ मनुष्यके प्रति, उसके ऐसा कहनेपर भी कि ‘मैं तेरे प्रतिद्वन्द्वी हाथीपर चढ़ा हुआ हूँ तू अपना हाथी मेरी ओर बढ़ा दे’ विरोधबुद्धि न होनेके कारण उसकी ओर हाथी नहीं ले जाता, उसी प्रकार [हमारा भी उनसे विरोध नहीं है]। तब, परमार्थतः तो ब्रह्मवेत्ता द्वैतवादियोंका भी आत्मा ही है। इसीसे अर्थात् इसी कारण उनसे हमारे पक्षका विरोध नहीं है ॥ १८ ॥

आत्मामें भेद मायाहीके कारण है

द्वैतमद्वैतभेद इत्युक्ते द्वैतमप्यद्वैतवत्परमार्थसदिति स्यात् कस्यचिदाशङ्केत्यत आह—द्वैत-अद्वैतका भेद है—ऐसा कहनेपर किसी-किसीको शंका हो सकती है कि अद्वैतके समान द्वैत भी परमार्थ सत् ही होना चाहिये—इसलिये कहते हैं—

मायया भिद्यते ह्येतन्नान्यथाजं कथञ्चन ।
तत्त्वतो भिद्यमाने हि मर्त्यताममृतं व्रजेत् ॥ १९ ॥

इस अजन्मा अद्वैतमें मायाहीके कारण भेद है और किसी प्रकार नहीं; यदि इसमें वास्तविक भेद होता तो यह अमृतस्वरूप मरणशीलताको प्राप्त हो जाता ॥ १९ ॥