माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| १४० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| तत्परमार्थसदद्वैतं मायया भिद्यते ह्येतत्तैमिरिकानेकचन्द्रवद्रज्जुः सर्पधारादिभिर्भेदैरिव न परमार्थतो निरवयवत्वादात्मनः। सावयवं ह्यवयवान्यथात्वेन भिद्यते । यथा मृद् घटादिभेदैः। तस्मान्निरवयवमजं नान्यथा कथञ्चन केनचिदपि प्रकारेण न भिद्यत इत्यभिप्रायः। <br><br> तत्त्वतो भिद्यमाने ह्यमृतमजमद्वयं स्वभावतः सन्मर्त्यतां व्रजेत् ; यथाग्निः शीतताम् । तच्चानिष्टं स्वभाववैपरीत्यगमनम्, सर्वप्रमाणविरोधात् । अजमव्ययमात्मतत्त्वं माययैव भिद्यते न परमार्थतः । तस्मान्न परमार्थसदद्वैतम् ॥ १९ ॥ | जो परमार्थ सत् अद्वैत है वह तिमिरदोषसे प्रतीत होनेवाले अनेक चन्द्रमा और सर्प-धारादि भेदोंसे विभिन्न दीखनेवाली रज्जुके समान मायासे ही भेदवान् प्रतीत होता है, परमार्थतः नहीं, क्योंकि आत्मा निरवयव है । जो वस्तु सावयव होती है वही अवयवोंके भेदसे भेदको प्राप्त होती है; जिस प्रकार घट आदि भेदोंसे मृत्तिका। अतः निरवयव और अजन्मा आत्मा [ मायाके सिवा ] और किसी प्रकार भेदको प्राप्त नहीं हो सकता—यह इसका अभिप्राय है। <br><br> यदि उसमें तत्त्वतः भेद हो तो अमृत अज अद्वय और स्वभावसे सत्स्वरूप होकर भी आत्मा मर्त्यताको प्राप्त हो जायगा, जिस तरह कि अग्नि शीतलताको प्राप्त हो जाय । और अपने स्वभावसे विपरीत अवस्थाको प्राप्त हो जाना सम्पूर्ण प्रमाणोंसे विरुद्ध होनेके कारण किसीको इष्ट नहीं हो सकता । अतः अज और अद्वितीय आत्मतत्त्व मायासे ही भेदको प्राप्त होता है, परमार्थतः नहीं। इसलिये द्वैत परमार्थ सत् नहीं है ॥ १९ ॥ |