माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १४१
जीवोत्पत्ति सर्वथा असंगत है
अजातस्यैव भावस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।
अजातो ह्यमृतो भावो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ २० ॥
द्वैतवादीलोग जन्महीन आत्माके भी जन्मकी इच्छा करते हैं; किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजन्मा और मरणहीन है वह मरणशीलताको किस प्रकार प्राप्त हो सकता है ? ॥ २० ॥
| ये तु पुनः केचिदुपनिष- <br> द्व्याख्यातारो ब्रह्मवादिनो <br> चावदूका अजातस्यैवात्मतत्त्वस्य <br> अमृतस्य स्वभावतो जातिम् <br> उत्पत्तिमिच्छन्ति परमार्थत एव <br> तेषां जातं चेत्तदेव मर्त्यतामेष्य- <br> त्यवश्यम् । स चाजातो ह्यमृतो <br> भावः स्वभावतः सन्नात्मा कथं <br> मर्त्यतामेष्यति ? न कथञ्चन <br> मर्त्यत्वं स्वभाववैपरीत्यमेष्यती- <br> त्यर्थः ॥ २० ॥ | किन्तु जो कोई उपनिषदोंकी <br> व्याख्या करनेवाले बहुभाषी ब्रह्मवादी <br> लोग अजात और अमृतस्वरूप आत्म- <br> तत्त्वकी जाति यानी उत्पत्ति परमार्थतः <br> ही सिद्ध करना चाहते हैं उनके मतमें <br> यदि वह उत्पन्न होता है तो अवश्य <br> ही मरणशीलताको भी प्राप्त हो <br> जायगा । किन्तु वह आत्मतत्त्व <br> स्वभावसे अजात और अमृत होकर <br> भी किस प्रकार मरणशीलताको प्राप्त <br> हो सकता है ? अतः तात्पर्य यह है <br> कि वह किसी प्रकार अपने स्वभावसे <br> विपरीत मरणशीलताको प्राप्त नहीं <br> हो सकता ॥ २० ॥ |
| यस्मात्— | क्योंकि— |
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न भवत्यमृतं मर्त्यं न मर्त्यममृतं तथा ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ २१ ॥