माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| १४२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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मरणहीन वस्तु कभी मरणशील नहीं होती; और मरणशील कभी अमर नहीं होती। किसी भी प्रकार स्वभावकी विपरीतता नहीं हो सकती ॥ २१ ॥
| न भवत्यमृतं मर्त्यं लोके नापि मर्त्यममृतं तथा। ततः प्रकृतेः स्वभावस्यान्यथाभावः स्वतःप्रच्युतिर्न कथञ्चिद्भविष्यति, अग्नेरिवौष्ण्यस्य ॥ २१ ॥ | लोकमें मरणहीन वस्तु मरणशील नहीं होती और न मरणशील वस्तु मरणहीन ही होती है। अतः अग्निकी उष्णताके समान प्रकृति अर्थात् स्वभावकी विपरीतता—अपने स्वरूपसे च्युति किसी प्रकार नहीं हो सकती ॥ २१ ॥ |
उत्पत्तिशील जीव अमर नहीं हो सकता
स्वभावेनामृतो यस्य भावो गच्छति मर्त्यताम् ।
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥ २२ ॥
जिसके मतमें स्वभावसे मरणहीन पदार्थ भी मर्त्यत्वको प्राप्त हो जाता है उसके सिद्धान्तानुसार कृतक (जन्म) होनेके कारण वह अमृत पदार्थ चिरस्थायी कैसे हो सकता है ? ॥ २२ ॥
| यस्य पुनर्वादिनः स्वभावेन अमृतो भावो मर्त्यतां गच्छति परमार्थतो जायते तस्य प्रागुत्पत्तेः स भावः स्वभावतोऽमृत इति प्रतिज्ञा मृषैव । कथं तर्हि कृतकेनामृतस्तस्य भावः ? कृतकेनामृतः स कथं स्थास्यति | किन्तु जिस वादीके मतमें स्वभावसे अमृत पदार्थ भी मर्त्यताको प्राप्त होता है अर्थात् परमार्थतः जन्म लेता है उसकी यह प्रतिज्ञा कि उत्पत्तिसे पूर्व वह पदार्थ स्वभावसे अमरणधर्मा है—मिथ्या ही है। [यदि ऐसा न मानें] तो फिर कृतक होनेके कारण उसका स्वभाव अमरत्व कैसे हो सकता है ? और इस प्रकार कृतक होनेसे ही वह अमृत पदार्थ |