माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| शां०भा० ] | अद्वैतप्रकरण | १३३ |
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| तदप्यसिद्धमिति चेत् । | **पूर्व०—**परन्तु यह बात भी तो सिद्ध नहीं हो सकती ।* |
| न; शाखाभेदेष्वन्यथान्यथा च प्राणादिसंवादश्रवणात् । यदि हि संवादः परमार्थ एवाभूदेकरूप एव संवादः सर्वशाखास्वश्रोष्यत विरुद्धानेकप्रकारेण नाश्रोष्यत । श्रूयते तु; तस्मान्न तादर्थ्यं संवादश्रुतीनाम् । तथोत्पत्तिवाक्यानि प्रत्येयानि । | **सिद्धान्ती—**नहीं; भिन्न-भिन्न शाखाओंमें भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्राण-संवाद सुना जानेके कारण [उसका यही तात्पर्य होना चाहिये ] ।† यदि यह संवाद वस्तुतः हुआ होता तो सम्पूर्ण शाखाओंमें एक ही संवाद सुना जाता, परस्पर विरुद्ध भिन्न-भिन्न प्रकारसे नहीं। परन्तु ऐसा सुना ही जाता है; इसलिये संवादश्रुतियोंका तात्पर्य यथाश्रुत अर्थमें नहीं है। इसी प्रकार उत्पत्ति-वाक्य भी समझने चाहिये । |
| कल्पसर्गभेदात्संवादश्रुतीनामुत्पत्तिश्रुतीनां च प्रतिसर्गमन्यथात्वमिति चेत् ? | **पूर्व०—**प्रत्येक कल्पकी सृष्टिके भेदके कारण संवादश्रुति और उत्पत्ति-श्रुतियोंमें प्रत्येक सर्गके अनुसार भेद है—यदि ऐसा मानें तो ? |
इन्द्रियको एक-एक करके उद्गीथ-गानमें नियुक्त किया; किन्तु प्रत्येक ही इन्द्रिय स्वार्थपरताके पापसे असुरोंके सामने पराभूत हो गयी। अन्तमें मुख्य प्राणको नियुक्त किया गया। वह सभीके लिये समान भावसे सामगान करने लगा; अतः असुरगण उसका कुछ भी न बिगाड़ सके और देवताओंको विजय प्राप्त हुई।
* अर्थात् उन आख्यायिकाओंका तात्पर्य प्राणकी उत्कृष्टताका बोध करानेमें ही है।
† इसी आशयकी एक आख्यायिका बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ६ ब्राह्मण १ में और दूसरी बृह० उ० अध्याय १ ब्राह्मण ३ में भी है।