माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
| शां०भा० ] | अद्वैतप्रकरण | १३३ |
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| तदप्यसिद्धमिति चेत् । | **पूर्व०—**परन्तु यह बात भी तो सिद्ध नहीं हो सकती ।* |
| न; शाखाभेदेष्वन्यथान्यथा च प्राणादिसंवादश्रवणात् । यदि हि संवादः परमार्थ एवाभूदेकरूप एव संवादः सर्वशाखास्वश्रोष्यत विरुद्धानेकप्रकारेण नाश्रोष्यत । श्रूयते तु; तस्मान्न तादर्थ्यं संवादश्रुतीनाम् । तथोत्पत्तिवाक्यानि प्रत्येयानि । | **सिद्धान्ती—**नहीं; भिन्न-भिन्न शाखाओंमें भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्राण-संवाद सुना जानेके कारण [उसका यही तात्पर्य होना चाहिये ] ।† यदि यह संवाद वस्तुतः हुआ होता तो सम्पूर्ण शाखाओंमें एक ही संवाद सुना जाता, परस्पर विरुद्ध भिन्न-भिन्न प्रकारसे नहीं। परन्तु ऐसा सुना ही जाता है; इसलिये संवादश्रुतियोंका तात्पर्य यथाश्रुत अर्थमें नहीं है। इसी प्रकार उत्पत्ति-वाक्य भी समझने चाहिये । |
| कल्पसर्गभेदात्संवादश्रुतीनामुत्पत्तिश्रुतीनां च प्रतिसर्गमन्यथात्वमिति चेत् ? | **पूर्व०—**प्रत्येक कल्पकी सृष्टिके भेदके कारण संवादश्रुति और उत्पत्ति-श्रुतियोंमें प्रत्येक सर्गके अनुसार भेद है—यदि ऐसा मानें तो ? |
इन्द्रियको एक-एक करके उद्गीथ-गानमें नियुक्त किया; किन्तु प्रत्येक ही इन्द्रिय स्वार्थपरताके पापसे असुरोंके सामने पराभूत हो गयी। अन्तमें मुख्य प्राणको नियुक्त किया गया। वह सभीके लिये समान भावसे सामगान करने लगा; अतः असुरगण उसका कुछ भी न बिगाड़ सके और देवताओंको विजय प्राप्त हुई।
* अर्थात् उन आख्यायिकाओंका तात्पर्य प्राणकी उत्कृष्टताका बोध करानेमें ही है।
† इसी आशयकी एक आख्यायिका बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ६ ब्राह्मण १ में और दूसरी बृह० उ० अध्याय १ ब्राह्मण ३ में भी है।
| १३७ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| न; निष्प्रयोजनत्वायथोक्त-<br>बुद्ध्यवतारप्रयोजनव्यतिरेकेण ।<br>न ह्यन्यप्रयोजनवत्त्वं संवादा-<br>त्पत्तिश्रुतीनां शक्यं कल्पयितुम् ।<br>तथात्वप्रतिपत्तये ध्यानार्थ-<br>मिति चेन्न; कलहोत्पत्तिप्रलयानां<br>प्रतिपत्तेरनिष्टत्वात् । तस्मा-<br>दुत्पत्त्यादिश्रुतय आत्मैकत्व-<br>बुद्ध्यवतारायैव नान्यार्थाः<br>कल्पयितुं युक्ताः । अतो<br>नास्त्युत्पत्त्यादिकृतो भेदः<br>कथंचन ॥ १५ ॥ | **सिद्धान्ती—**नहीं, क्योंकि श्रुतिका उपर्युक्त [ब्रह्मात्मैकत्वमें] बुद्धिप्रवेशरूप प्रयोजनके अतिरिक्त अन्य कोई प्रयोजन ही नहीं है । प्राणसंवाद और उत्पत्तिश्रुतियोंका इसके सिवा और कोई प्रयोजन नहीं कल्पना किया जा सकता । यदि कहो कि उनकी तद्रूपता प्राप्त करनेके प्रयोजनसे ध्यानके लिये ऐसा कहा गया है, तो ऐसा भी सम्भव नहीं है, क्योंकि कलह तथा उत्पत्ति या प्रलयकी प्राप्ति किसीको इष्ट नहीं हो सकती । अतः उत्पत्ति आदि प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ आत्मैकत्वरूप बुद्धिकी प्राप्तिके ही लिये हैं, उन्हें किसी और प्रयोजनके लिये मानना उचित नहीं है । अतः उत्पत्ति आदिके कारण होनेवाला भेद कुछ भी नहीं है ॥ १५ ॥ |
त्रिविध अधिकारी और उनके लिये उपासनाविधि
| यदि पर एवात्मा नित्यशुद्ध-<br>बुद्धमुक्तस्वभाव एकः परमार्थः<br>सन् "एकमेवाद्वितीयम्" (छा०<br>उ० ६ । २ । २). इत्यादि-<br>श्रुतिभ्योऽसदन्यत्किमर्थेयमुपा-<br>सनोपदष्टा "आत्मा वा अरे<br>द्रष्टव्यः" (बृ० उ० २ । ४ । ५) | **शंका—**यदि "एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार परमार्थतः एकमात्र नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमात्मा ही सत्य है, अन्य सब मिथ्या है, तो "अरे, इस आत्माका साक्षात्कार करना चाहिये" "जो |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १९५
| "य आत्मापहतपाप्मा" (छा० उ० ८।७।१, ३) "स क्रतुं कुर्वीत" (छा० उ० ३।१४।१) "आत्मेत्येवोपासीत" (बृ० उ० १।४।७) इत्यादिश्रुतिभ्यः, कर्माणि चाग्निहोत्रादीनि ?<br><br>श्रृणु तत्र कारणम्— | आत्मा पापरहित है" "वह (अधिकारी) क्रतु (उपास्यासम्बन्धी संकल्प) करे" "आत्मा है-इस प्रकार ही उपासना करे" इत्यादि श्रुतियोंद्वारा इस उपासनाका उपदेश क्यों दिया गया है ? तथा अग्निहोत्रादि कर्म भी क्यों बतलाये गये हैं ?<br><br>समाधान—इसमें जो कारण है, सो सुनो— |
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आश्रमास्त्रिविधा हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः ।
उपासनोपदिष्टेयं तदर्थमनुकम्पया ॥ १६ ॥
आश्रम (अधिकारी पुरुष) तीन प्रकारके हैं—हीन, मध्यम और उत्कृष्ट दृष्टिवाले। उनपर कृपा करके उन्हींके लिये यह उपासना उपदेश की गयी है ॥ १६ ॥
| आश्रमा आश्रमिणोऽधिकृताः, वर्णिनश्च मार्गगाः, आश्रमशब्दस्य प्रदर्शनार्थत्वात्त्रिविधाः। कथम् ? हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः । हीना निकृष्टा मध्यमोत्कृष्टा च दृष्टिर्दर्शनसामर्थ्यं येषां ते मन्दमध्यमोत्तमबुद्धिसामर्थ्योपेता इत्यर्थः । | आश्रमाः—कर्माधिकारी आश्रमी एवं सन्मार्गगामी वर्णीलोग—क्योंकि 'आश्रम' शब्द उनका भी उपलक्षण करानेवाला है—तीन प्रकारके हैं। किस प्रकार ?—हीन, मध्यम और उत्कृष्ट दृष्टिवाले। अर्थात् जिनकी दृष्टि यानी दर्शनसामर्थ्य हीन—निकृष्ट, मध्यम और उत्कृष्ट है ऐसे मन्द, मध्यम और उत्तम बुद्धिकी सामर्थ्यसे सम्पन्न है। |
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| १२६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| उपासनोपदिष्टेयं तदर्थं मन्द-मध्यमदृष्ट्याश्रमाद्यर्थं कर्माणि च, न चात्मैक एवाद्वितीय इति निश्चितोत्तमदृष्ट्यर्थं दयालुना वेदेनानुकम्पया सन्मार्गगाः सन्तः कथमिमामुत्तमामेकत्वदृष्टिं प्राप्नुयुरिति । “यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते” (के० उ० १ । ५) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८-१६) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ १६ ॥ | उन मन्द और मध्यम दृष्टिवाले आश्रमादिके लिये ही इस उपासना और कर्मका उपदेश किया गया है, 'आत्मा एक और अद्वितीय ही है' ऐसी जिनकी निश्चित उत्तम दृष्टि है, उनके लिये उसका उपदेश नहीं है । दयालु वेदने उसका इसीलिये उपदेश किया है कि जिससे वे किसी प्रकार सन्मार्गगामी होकर “जिसका मनसे मनन नहीं किया जा सकता, बल्कि जिसके द्वारा मन मनन किया कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान; यह, जिसकी तू उपासना करता है, ब्रह्म नहीं है” “वह तू है” “यह सब आत्मा ही है” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा प्रतिपादित इस उत्तम एकत्व-दृष्टिको प्राप्त कर सकें ॥ १६ ॥ |
अद्वैतात्मदर्शन किसीका विरोधी नहीं है
| शास्त्रोपपत्तिभ्यामवधारितत्वादद्वयात्मदर्शनं सम्यग्दर्शनं तद्बाह्यत्वान्मिथ्यादर्शनमन्यत् । इतश्च मिथ्यादर्शनं द्वैतिनां रागद्वेषादिदोषास्पदत्वात् । कथम् ? | शास्त्र और युक्तिसे निश्चित होनेके कारण अद्वितीय आत्मदर्शन ही सम्यग्दर्शन है, उससे बाह्य होनेके कारण और सब दर्शन मिथ्या हैं । द्वैतवादियोंके दर्शन इसलिये भी मिथ्या हैं, क्योंकि वे राग-द्वेषादि दोषोंके आश्रय हैं; किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं]— |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १३७
स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु द्वैतिनो निश्चिता दृढम् । परस्परं विरुध्यन्ते तैरयं न विरुध्यते ॥ १७ ॥
द्वैतवादी अपने-अपने सिद्धान्तोंकी व्यवस्थामें दृढ आग्रही होनेके कारण आपसमें विरोध रखते हैं; परन्तु यह [ अद्वैतात्मदर्शन ] उनसे विरोध नहीं रखता ॥ १७ ॥
| स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु स्वसिद्धान्तरचनानियमेषु कपिलकणादबुद्धार्हतादिदृष्ट्यनुसारिणो द्वैतिनो निश्चिताः । एवमेवैष परमार्थो नान्यथेति तत्र तत्रानुरक्ताः प्रतिपक्षं चात्मनः पश्यन्तस्तं द्विषन्त इत्येवं रागद्वेषोपेताः स्वसिद्धान्तदर्शननिमित्तम् एव परस्परमन्योन्यं विरुध्यन्ते । | स्वसिद्धान्तव्यवस्थामें अर्थात् अपने-अपने सिद्धान्तकी रचनाके नियमोंमें कपिल, कणाद, बुद्ध और अर्हत् (जिन) की दृष्टियोंका अनुसरण करनेवाले द्वैतवादी निश्चित हैं; अर्थात् यह परमार्थतत्त्व इसी प्रकार है अन्यथा नहीं—इस प्रकार अपने-अपने सिद्धान्तमें अनुरक्त हो अपने प्रतिपक्षीको देखकर उससे द्वेष करते हैं। इस तरह राग-द्वेषसे युक्त हो अपने-अपने सिद्धान्तके दर्शनके कारण ही परस्पर एक-दूसरेसे विरोध मानते हैं। |
| तैरन्योन्यविरोधिभिरस्मदीयोऽयं वैदिकः सर्वानन्यत्वादात्मैकत्वदर्शनपक्षो न विरुध्यते यथा स्वहस्तपादादिभिः । एवं रागद्वेषादिदोषानास्पदत्वादात्मैकत्वबुद्धिरेव सम्यग्दर्शनमित्यभिप्रायः ॥ १७ ॥ | उन परस्पर विरोध माननेवालोंसे हमारा यह आत्मैकत्वदर्शनरूप वैदिकसिद्धान्त सबसे अभिन्न होनेके कारण विरोध नहीं मानता; जिस प्रकार कि अपने हाथ-पाँव आदिसे किसीका विरोध नहीं होता। इस प्रकार राग-द्वेषादि दोषोंका आश्रय न होनेके कारण आत्मैकत्वबुद्धि ही सम्यग्दृष्टि है—यह इसका तात्पर्य है ॥ १७ ॥ |
| १३८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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अद्वैतात्मदर्शनके अविरोधी होनेमें हेतु
| केन हेतुना तैर्न विरुध्यत इत्युच्यते— | जिस कारण उनसे इसका विरोध नहीं है—इसपर कहते हैं— |
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अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं तद्भेद उच्यते ।
तेषामुभयथा द्वैतं तेनायं न विरुध्यते ॥ १८ ॥
अद्वैत परमार्थ है और द्वैत उसीका भेद (कार्य) कहा जाता है, तथा उन (द्वैतवादियों) के मतमें [परमार्थ और अपरमार्थ] दोनों प्रकारसे द्वैत ही है; इसलिये उनसे इसका विरोध नहीं है ॥ १८ ॥
| अद्वैतं परमार्थो हि यस्मादद्वैतं नानात्वं तस्याद्वैतस्य भेदस्तद्भेदस्तस्य कार्यमित्यर्थः। “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । २) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ० ६ । २ । ३) इति श्रुतेः उपपत्तेश्च स्वचित्तस्पन्दनाभावे समाधौ मूर्च्छायां सुषुप्तौ चाभावात् । अतस्तद्भेद उच्यते द्वैतम् । | अद्वैत परमार्थ है; और क्योंकि द्वैत यानी नानात्व उस अद्वैतका भेद अर्थात् उसका कार्य है, जैसा कि “एकमेवाद्वितीयम्” “तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि श्रुतियोंसे तथा समाधि मूर्च्छा अथवा सुषुप्तिमें अपने चित्तके स्फुरणका अभाव हो जानेपर द्वैतका भी अभाव हो जानेके कारण युक्तिसे भी सिद्ध होता है; इसलिये द्वैत उसका भेद कहा जाता है। | | द्वैतिनां तु तेषां परमार्थतश्चापरमार्थतश्चोभयथापि द्वैतमेव । यदि च तेषां भ्रान्तानां द्वैतदृष्टिरस्माकमद्वैतदृष्टिरभ्रान्तानाम्, तेनायं हेतुनास्मत्पक्षो न विरुध्यते तैः । “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” (बृ० उ० २ । | किन्तु उन द्वैतवादियोंकी दृष्टिमें तो परमार्थतः और अपरमार्थतः दोनों प्रकार द्वैत ही है। यदि उन भ्रान्त पुरुषोंकी द्वैतदृष्टि है और हम भ्रमहीनोंकी अद्वैतदृष्टि है तो इस कारणसे ही हमारे पक्षका उनसे विरोध नहीं है। “इन्द्र: मायासे अनेक रूप धारण करता है” |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १३९
| ५।१९) “न तु तद्द्वितीयमस्ति” (बृ० उ० ४।३।२३) इति श्रुतेः। | “उससे भिन्न दूसरा है ही नहीं” इत्यादि श्रुतियोंसे भी यही प्रमाणित होता है। |
| यथा मत्तगजारूढ उन्मत्तं भूमिष्ठं प्रतिगजारूढोऽहं गजं वाहय मां प्रतीति ब्रुवाणमपि तं प्रति न वाहयत्यविरोधबुद्ध्या तद्वत्। ततः परमार्थतो ब्रह्मविदात्मैव द्वैतिनाम्। तेनायं हेतुनास्मत्पक्षो न विरुध्यते तैः ॥ १८ ॥ | जिस प्रकार मतवाले हाथीपर चढ़ा हुआ पुरुष किसी उन्मत्त भूमिस्थ मनुष्यके प्रति, उसके ऐसा कहनेपर भी कि ‘मैं तेरे प्रतिद्वन्द्वी हाथीपर चढ़ा हुआ हूँ तू अपना हाथी मेरी ओर बढ़ा दे’ विरोधबुद्धि न होनेके कारण उसकी ओर हाथी नहीं ले जाता, उसी प्रकार [हमारा भी उनसे विरोध नहीं है]। तब, परमार्थतः तो ब्रह्मवेत्ता द्वैतवादियोंका भी आत्मा ही है। इसीसे अर्थात् इसी कारण उनसे हमारे पक्षका विरोध नहीं है ॥ १८ ॥ |
आत्मामें भेद मायाहीके कारण है
| द्वैतमद्वैतभेद इत्युक्ते द्वैतमप्यद्वैतवत्परमार्थसदिति स्यात् कस्यचिदाशङ्केत्यत आह— | द्वैत-अद्वैतका भेद है—ऐसा कहनेपर किसी-किसीको शंका हो सकती है कि अद्वैतके समान द्वैत भी परमार्थ सत् ही होना चाहिये—इसलिये कहते हैं— |
मायया भिद्यते ह्येतन्नान्यथाजं कथञ्चन ।
तत्त्वतो भिद्यमाने हि मर्त्यताममृतं व्रजेत् ॥ १९ ॥
इस अजन्मा अद्वैतमें मायाहीके कारण भेद है और किसी प्रकार नहीं; यदि इसमें वास्तविक भेद होता तो यह अमृतस्वरूप मरणशीलताको प्राप्त हो जाता ॥ १९ ॥
| १४० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| तत्परमार्थसदद्वैतं मायया भिद्यते ह्येतत्तैमिरिकानेकचन्द्रवद्रज्जुः सर्पधारादिभिर्भेदैरिव न परमार्थतो निरवयवत्वादात्मनः। सावयवं ह्यवयवान्यथात्वेन भिद्यते । यथा मृद् घटादिभेदैः। तस्मान्निरवयवमजं नान्यथा कथञ्चन केनचिदपि प्रकारेण न भिद्यत इत्यभिप्रायः। <br><br> तत्त्वतो भिद्यमाने ह्यमृतमजमद्वयं स्वभावतः सन्मर्त्यतां व्रजेत् ; यथाग्निः शीतताम् । तच्चानिष्टं स्वभाववैपरीत्यगमनम्, सर्वप्रमाणविरोधात् । अजमव्ययमात्मतत्त्वं माययैव भिद्यते न परमार्थतः । तस्मान्न परमार्थसदद्वैतम् ॥ १९ ॥ | जो परमार्थ सत् अद्वैत है वह तिमिरदोषसे प्रतीत होनेवाले अनेक चन्द्रमा और सर्प-धारादि भेदोंसे विभिन्न दीखनेवाली रज्जुके समान मायासे ही भेदवान् प्रतीत होता है, परमार्थतः नहीं, क्योंकि आत्मा निरवयव है । जो वस्तु सावयव होती है वही अवयवोंके भेदसे भेदको प्राप्त होती है; जिस प्रकार घट आदि भेदोंसे मृत्तिका। अतः निरवयव और अजन्मा आत्मा [ मायाके सिवा ] और किसी प्रकार भेदको प्राप्त नहीं हो सकता—यह इसका अभिप्राय है। <br><br> यदि उसमें तत्त्वतः भेद हो तो अमृत अज अद्वय और स्वभावसे सत्स्वरूप होकर भी आत्मा मर्त्यताको प्राप्त हो जायगा, जिस तरह कि अग्नि शीतलताको प्राप्त हो जाय । और अपने स्वभावसे विपरीत अवस्थाको प्राप्त हो जाना सम्पूर्ण प्रमाणोंसे विरुद्ध होनेके कारण किसीको इष्ट नहीं हो सकता । अतः अज और अद्वितीय आत्मतत्त्व मायासे ही भेदको प्राप्त होता है, परमार्थतः नहीं। इसलिये द्वैत परमार्थ सत् नहीं है ॥ १९ ॥ |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १४१
जीवोत्पत्ति सर्वथा असंगत है
अजातस्यैव भावस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।
अजातो ह्यमृतो भावो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ २० ॥
द्वैतवादीलोग जन्महीन आत्माके भी जन्मकी इच्छा करते हैं; किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजन्मा और मरणहीन है वह मरणशीलताको किस प्रकार प्राप्त हो सकता है ? ॥ २० ॥
| ये तु पुनः केचिदुपनिष- <br> द्व्याख्यातारो ब्रह्मवादिनो <br> चावदूका अजातस्यैवात्मतत्त्वस्य <br> अमृतस्य स्वभावतो जातिम् <br> उत्पत्तिमिच्छन्ति परमार्थत एव <br> तेषां जातं चेत्तदेव मर्त्यतामेष्य- <br> त्यवश्यम् । स चाजातो ह्यमृतो <br> भावः स्वभावतः सन्नात्मा कथं <br> मर्त्यतामेष्यति ? न कथञ्चन <br> मर्त्यत्वं स्वभाववैपरीत्यमेष्यती- <br> त्यर्थः ॥ २० ॥ | किन्तु जो कोई उपनिषदोंकी <br> व्याख्या करनेवाले बहुभाषी ब्रह्मवादी <br> लोग अजात और अमृतस्वरूप आत्म- <br> तत्त्वकी जाति यानी उत्पत्ति परमार्थतः <br> ही सिद्ध करना चाहते हैं उनके मतमें <br> यदि वह उत्पन्न होता है तो अवश्य <br> ही मरणशीलताको भी प्राप्त हो <br> जायगा । किन्तु वह आत्मतत्त्व <br> स्वभावसे अजात और अमृत होकर <br> भी किस प्रकार मरणशीलताको प्राप्त <br> हो सकता है ? अतः तात्पर्य यह है <br> कि वह किसी प्रकार अपने स्वभावसे <br> विपरीत मरणशीलताको प्राप्त नहीं <br> हो सकता ॥ २० ॥ |
| यस्मात्— | क्योंकि— |
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न भवत्यमृतं मर्त्यं न मर्त्यममृतं तथा ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ २१ ॥
| १४२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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मरणहीन वस्तु कभी मरणशील नहीं होती; और मरणशील कभी अमर नहीं होती। किसी भी प्रकार स्वभावकी विपरीतता नहीं हो सकती ॥ २१ ॥
| न भवत्यमृतं मर्त्यं लोके नापि मर्त्यममृतं तथा। ततः प्रकृतेः स्वभावस्यान्यथाभावः स्वतःप्रच्युतिर्न कथञ्चिद्भविष्यति, अग्नेरिवौष्ण्यस्य ॥ २१ ॥ | लोकमें मरणहीन वस्तु मरणशील नहीं होती और न मरणशील वस्तु मरणहीन ही होती है। अतः अग्निकी उष्णताके समान प्रकृति अर्थात् स्वभावकी विपरीतता—अपने स्वरूपसे च्युति किसी प्रकार नहीं हो सकती ॥ २१ ॥ |
उत्पत्तिशील जीव अमर नहीं हो सकता
स्वभावेनामृतो यस्य भावो गच्छति मर्त्यताम् ।
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥ २२ ॥
जिसके मतमें स्वभावसे मरणहीन पदार्थ भी मर्त्यत्वको प्राप्त हो जाता है उसके सिद्धान्तानुसार कृतक (जन्म) होनेके कारण वह अमृत पदार्थ चिरस्थायी कैसे हो सकता है ? ॥ २२ ॥
| यस्य पुनर्वादिनः स्वभावेन अमृतो भावो मर्त्यतां गच्छति परमार्थतो जायते तस्य प्रागुत्पत्तेः स भावः स्वभावतोऽमृत इति प्रतिज्ञा मृषैव । कथं तर्हि कृतकेनामृतस्तस्य भावः ? कृतकेनामृतः स कथं स्थास्यति | किन्तु जिस वादीके मतमें स्वभावसे अमृत पदार्थ भी मर्त्यताको प्राप्त होता है अर्थात् परमार्थतः जन्म लेता है उसकी यह प्रतिज्ञा कि उत्पत्तिसे पूर्व वह पदार्थ स्वभावसे अमरणधर्मा है—मिथ्या ही है। [यदि ऐसा न मानें] तो फिर कृतक होनेके कारण उसका स्वभाव अमरत्व कैसे हो सकता है ? और इस प्रकार कृतक होनेसे ही वह अमृत पदार्थ |
| शां० मां० ] | अद्वैतप्रकरण | १४३ |
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| निश्चलोऽमृतस्वभावस्तथा न कथञ्चित्स्थास्यत्यात्मजातिवादिनः सर्वदाऽजं नाम नास्त्येव; सर्वमेतन्मर्त्यम् । अतोऽनिर्मोक्षप्रसङ्ग इत्यभिप्रायः ॥ २२ ॥ | निश्चल यानी अमृतस्वभाव भी कैसे रह सकता है? अर्थात् वह कभी ऐसा नहीं रह सकता । अतः आत्माका जन्म बतलानेवालेके मतमें तो अजन्मा वस्तु कोई है ही नहीं । उसके लिये यह सब मरणशील ही है । इससे यह अभिप्राय हुआ कि [उसके मतमें] मोक्ष होनेका प्रसंग है ही नहीं ॥ २२ ॥ |
सृष्टिश्रुतिकी संगति
| नन्वजातिवादिनः सृष्टिप्रतिपादिका श्रुतिर्न संगच्छते प्रामाण्यम् ? | **शंका—**किन्तु अजातिवादोके मतमें सृष्टिका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती ? |
| बाढं विद्यते सृष्टिप्रतिपादिका श्रुतिः ; सा त्वन्यपरा । उपायः सोऽवतारायेत्यवोचाम । इदानीमुक्तेऽपि परिहारे पुनश्चोद्यपरिहारौ विवक्षितार्थं प्रति सृष्टिश्रुत्यक्षराणामानुलोम्यविरोधाशङ्कामात्रपरिहारार्थौ— | **समाधान—**हाँ ठीक है, सृष्टिका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी है; किन्तु उसका उद्देश्य दूसरा है । “उपायः सोऽवताराय”<sup>१</sup> इस प्रकार हम उसका उद्देश्य पहले (अद्वैत० १५में) बता ही चुके हैं । इस प्रकार यद्यपि इस शंकाका पहले समाधान किया जा चुका है तो भी 'सृष्टिश्रुतिके अक्षरोंकी अनुकूलताका हमारे विवक्षित अर्थसे विरोध है' इस शंकाका परिहार करनेके लिये ही, इस समय तत्सम्बन्धी शंका और समाधानका पुनः उल्लेख किया जाता है— |
१-वह ब्रह्मात्मैक्यमें बुद्धिका प्रवेश करानेके लिये उपाय है ।
१४४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
भूततोऽभूततो वापि सृज्यमाने समा श्रुतिः ।
निश्चितं युक्तियुक्तं च यत्तद्भवति नेतरत् ॥२३॥
पारमार्थिक अथवा अपारमार्थिक किसी भी प्रकारकी सृष्टि होनेमें श्रुति तो समान ही होगी । अतः उनमें जो निश्चित और युक्तियुक्त मत हो वही [ श्रुतिका अभिप्राय ] हो सकता है, अन्य नहीं ॥ २३ ॥
| भूततः परमार्थतः सृज्यमाने वस्तुन्यभूततो मायया वा मायाविनेव सृज्यमाने वस्तुनि समा तुल्या सृष्टिश्रुतिः । ननु गौणमुख्ययोर्मुख्ये शब्दार्थप्रतिपत्तिर्युक्ता । न, अन्यथा सृष्टेरप्रसिद्धत्वान्निष्प्रयोजनत्वाच्चेत्यवोचाम । अविद्यासृष्टिविषयैव सर्वा गौणी मुख्या च सृष्टिर्न परमार्थतः “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” ( मु० उ० २ । १ । २ ) इति श्रुतेः । | वस्तुके भूततः यानी परमार्थतः रचे जानेमें अथवा अभूततः यानी मायासे मायावीद्वारा रचे जानेमें सृष्टि-श्रुति तो समान ही होगी । यदि कहो कि गौण और मुख्य दोनों अर्थ होनेपर शब्दका मुख्य अर्थ लेना ही उचित है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि अन्य प्रकारसे न तो सृष्टि सिद्ध ही होती है और न उसका कुछ प्रयोजन ही है—यह हम पहले कह चुके हैं । “आत्मा बाहर-भीतर विद्यमान और अजन्मा है” इस श्रुतिके अनुसार सब प्रकारकी गौण और मुख्य सृष्टि आविद्यक सृष्टिसम्बन्धिनी ही है, परमार्थतः नहीं । |
| तस्माच्छ्रुत्या निश्चितं यदेकमेवाद्वितीयमजममृतमिति युक्तियुक्तं च युक्त्या च सम्पन्नं तदेवेत्य- | अतः श्रुतिने जो एक, अद्वितीय, अजन्मा और अमृत तत्त्व निश्चित किया है वही युक्तियुक्त अर्थात् युक्तिसे भी सिद्ध होता है ऐसा |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १४५
| वोचाम पूर्वग्रन्थैः। तदेव श्रुत्यर्थो | प्रतिपादन कर चुके हैं वही श्रुतिका |
| भवति नेतरत्कदाचिदपि ॥२३॥ | तात्पर्य हो सकता है; अन्य अर्थ कभी और किसी अवस्थामें नहीं हो सकता ॥२३॥ |
| कथं श्रुतिनिश्चयः ? इत्याह— | यह श्रुतिका निश्चय किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं— |
नेह नानेति चाम्नायादिन्द्रो मायाभिरित्यपि ।
अजायमानो बहुधा मायया जायते तु सः ॥ २४ ॥
‘नेह नानास्ति किंचन’ ‘इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते’ तथा ‘अजायमानो बहुधा विजायते’ इन श्रुतिवाक्योंके अनुसार वह परमात्मा मायासे ही उत्पन्न होता है ॥ २४ ॥
| यदि हि भूतत एव सृष्टिः स्यात्ततः सत्यमेव नाना वस्त्विति तदभावप्रदर्शनार्थमाम्नायो न स्यात् । अस्ति च “नेह नानाऽस्ति किंचन” (क० उ० २।१।११) इत्यादिराम्नायो द्वैतभावप्रतिषेधार्थः । तस्मादात्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्था कल्पिता सृष्टिरभूतैव प्राणसंवादवत् । “इन्द्रो मायाभिः” (बृ० उ० २।५।१९) इत्यभूतार्थप्रतिपादकेन मायाशब्देन व्यपदेशात् । | यदि वास्तवमें ही सृष्टि हुई है तो नाना वस्तु सत्य ही हैं; ऐसी अवस्थामें उनका अभाव प्रदर्शित करनेके लिये कोई शास्त्र-वचन नहीं होना चाहिये था। किन्तु द्वैतभावका निषेध करनेके लिये “यहाँ नाना वस्तु कुछ नहीं है” इत्यादि शास्त्र-वचन है ही । अतः प्राणसंवादके समान आत्मैकत्वकी प्राप्तिके लिये कल्पना की हुई सृष्टि अयथार्थ ही है; क्योंकि “इन्द्र मायासे [अनेकरूप हो जाता है]” इस श्रुतिमें सृष्टिका, अयथार्थत्वप्रतिपादक ‘माया’ शब्दसे निर्देश किया गया है । |
| १४६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| ननु प्रज्ञावचनो मायाशब्दः। | शंका—'माया' शब्द तो प्रज्ञावाचक है [इसलिये इससे सृष्टिका मिथ्यात्व सिद्ध नहीं होता]। |
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| सत्यम्; इन्द्रियप्रज्ञाया अविद्यामयत्वेन मायात्वाभ्युपगमाददोषः। मायाभिरिन्द्रियप्रज्ञाभिः अविद्यारूपाभिरित्यर्थः, "अजायमानो बहुधा विजायते" इति श्रुतेः, तस्मान्माययैव जायते तु सः। तुशब्दोऽवधारणार्थः— माययैवेति। न ह्यजायमानत्वं बहुधा जन्म चैकत्र सम्भवति, अग्नाविव शैत्यमौष्ण्यं च। | समाधान—ठीक है, आविद्यक होनेके कारण इन्द्रियप्रज्ञाका मायात्व माना गया है; इसलिये उसमें कोई दोष नहीं है। अतः मायासे अर्थात् अविद्यारूप इन्द्रियप्रज्ञासे; जैसा कि "उत्पन्न न होकर भी अनेक प्रकार से उत्पन्न होता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः वह मायासे ही उत्पन्न होता है। यहाँ 'तु' शब्द निश्चयार्थक है। अर्थात् मायासे ही [उत्पन्न होता है]। अग्निमें शीतलता और उष्णताके समान जन्म न लेना और अनेक प्रकारसे जन्म लेना एक ही वस्तुमें सम्भव नहीं है। |
| फलवत्त्वाच्चात्मैकत्वदर्शनमेव श्रुतिनिश्चितोऽर्थः "तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः" (ई०उ० ७) इत्यादिमन्त्रवर्णात् ; "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति" (क० उ० २।१।१०) इति निन्दितत्वाच्च सृष्ट्यादिभेददृष्टेः ॥२४॥ | "उस अवस्थामें एकत्वका साक्षात्कार करनेवाले पुरुषको क्या मोह और क्या शोक हो सकता है?" इत्यादि श्रुतिके अनुसार फलयुक्त होनेके कारण तथा "[जो नानात्व देखता है] वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है" इस श्रुतिसे सृष्टि आदि भेददृष्टिकी निन्दा की जानेके कारण भी आत्मैकत्वदर्शन ही श्रुतिका निश्चित अर्थ है ॥ २४ ॥ |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण [ १४७
श्रुति कार्य और कारण दोनोंका प्रतिषेध करती है
संभूतेरपवादाच्च संभवः प्रतिषिध्यते ।
को न्वेनं जनयेदिति कारणं प्रतिषिध्यते ॥ २५ ॥
श्रुतिमें सम्भूति (हिरण्यगर्भ) की निन्दाद्वारा कार्यवर्गका प्रतिषेध किया गया है तथा 'इसे कौन उत्पन्न करे' इस वाक्यद्वारा कारणका प्रतिषेध किया गया है ॥ २५ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| "अन्धं तमः प्रविशन्ति ये संभूतिमुपासते" (ई० उ० १२) इति संभूतेरुपास्यत्वापवादात्संभवः प्रतिषिध्यते । न हि परमार्थतः संभूतायां संभूतौ तदपवाद उपपद्यते । | “जो सम्भूति (हिरण्यगर्भ) की उपासना करते हैं वे घोर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं" इस प्रकार सम्भूति-के उपास्यत्वकी निन्दा की जानेके कारण कार्यवर्गका प्रतिषेध किया गया है। यदि सम्भूति परमार्थ-सत्यरूप होती तो उसकी निन्दा की जानी सम्भव नहीं थी । |
| ननु विनाशेन संभूतेः समुच्चयविध्यर्थः संभूत्यपवादः। यथा "अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते" (ई० उ० ९) इति । | **शंका—**सम्भूतिके उपास्यत्वकी जो निन्दा की गयी है वह तो विनाश-(कर्म) के साथ सम्भूति (देवतोपासना) का समुच्चयविधान करनेके लिये है; जैसा कि "जो अविद्याकी उपासना करते हैं वे घोर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं" इस वाक्यसे सिद्ध होता है । |
| (समुच्चयस्य प्रयोजनम्)<br>सत्यमेव देवतादर्शनस्य संभूतिविषयस्य विनाशशब्दवाच्यस्य कर्मणः समुच्चयविधानार्थः संभूत्यपवादः। तथापि विनाशा- | **समाधान—**सचमुच ही, सम्भूति-विषयक देवतादर्शन और 'विनाश' शब्दवाच्य कर्मका समुच्चयविधान करनेके लिये ही सम्भूतिका अपवाद किया गया है; तथापि जिस प्रकार |
१४८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का०
| ख्यस्य कर्मणः स्वाभाविकाज्ञान-प्रवृत्तिरूपस्य मृत्योरतितरणार्थ-त्ववद्देवतादर्शनकर्मसमुच्चयस्य पुरुषसंस्कारार्थस्य कर्मफलराग-प्रवृत्तिरूपस्य साध्यसाधनैषणा-द्वयलक्षणस्य मृत्योरतितरणार्थ-त्वम् । एवं ह्येषणाद्वयरूपा-न्मृत्योरशुद्धेर्वियुक्तः पुरुषः संस्कृतः स्यादतो मृत्योरतित-रणार्था देवतादर्शनकर्मसमुच्चय-लक्षणा ह्यविद्या । | 'विनाश' संज्ञक कर्म स्वाभाविक अज्ञानजनित प्रवृत्तिरूप मृत्युको पार करनेके लिये है उसी प्रकार पुरुषके संस्कारके लिये विहित देवता-दर्शन और कर्मका समुच्चय कर्म-फलके रागसे होनेवाली प्रवृत्तिरूपा जो साध्य-साधनलक्षणा दो प्रकारकी वासनामयी मृत्यु है, उसे पार करनेके लिये है । इस प्रकार एषणाद्वयरूप मृत्युकी अशुद्धिसे मुक्त हुआ पुरुष ही संस्कारसम्पन्न हो सकता है । अतः देवतादर्शन और कर्मसमुच्चयलक्षणा अविद्या मृत्युसे पार होनेके लिये ही है। |
| एवमेव एषणालक्षणाद्विद्याया मृत्योरतितीर्णस्य विरक्तस्योपनिपच्छा-स्त्रार्थलोचनपरस्य (सम्भृत्यपवादहेतुः) | इसी प्रकार एषणाद्वयलक्षणा अविद्यारूप मृत्युसे पार हुए तथा उपनिषच्छास्त्रके अर्थकी आलोचनामें तत्पर विरक्त पुरुषको ब्रह्मात्मैक्यरूप विद्याकी उत्पत्ति दूर नहीं है; |
| नान्तरीयी परमात्मैकत्व-विद्योत्पत्तिरिति पूर्वभाविनीम-विद्यामपेक्ष्य पश्चाद्भाविनी ब्रह्म-विद्यामृतत्वसाधनैकेन पुरुषेण सम्बध्यमानावियया समुच्चीयत इत्युच्यते । अतोऽन्यार्थत्वाद-मृतत्वसाधनं ब्रह्मविद्यामपेक्ष्य निन्दार्थ एव भवति संभूत्य- | इसीलिये ऐसा कहा जाता है कि पहले होनेवाली अविद्याकी अपेक्षासे पीछे प्राप्त होनेवाली ब्रह्मविद्या, जो अमृतत्व-का साधन है, एक ही पुरुषसे सम्बन्ध रखनेके कारण अविद्यासे समुच्चित की जाती है । अतः अमृतत्वके साक्षात् साधन ब्रह्मविद्याकी अपेक्षा अन्य प्रयोजनवाला होनेसे सम्भूतिका अपवाद निन्दाहीके लिये किया |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण [ १४९
| पवादः। यद्यप्यशुद्धिवियोगहेतुः अतन्निष्ठत्वात् । अत एव संभूतेः अपवादात्संभूतेरापेक्षिकमेव सत्त्वमिति परमार्थसदात्मैकत्वमपेक्ष्य अमृताख्यः संभवः प्रतिषिध्यते । | गया है। वह यद्यपि अशुद्धिके क्षयका कारण है, तो भी अतन्निष्ठ (मोक्षका साक्षात् हेतु न) होनेके कारण [उसकी निन्दा ही की गयी है]। इसलिये सम्भूतिका अपवाद किया जानेके कारण उसका सत्त्व आपेक्षिक ही है; इसी आशयसे परमार्थ सत् आत्मैकत्वकी अपेक्षासे अमृतसंज्ञक सम्भूतिका प्रतिषेध किया गया है। |
| [विद्योत्पत्त्यनन्तरं जीवभावस्य अनुपपत्तिप्रतिपादनम्]<br><br>एवं मायानिर्मितस्यैव जीवस्याविद्यया प्रत्युपस्थापितस्याविद्यानाशे स्वभावरूपत्वात्परमार्थतः को न्वेनं जनयेत् । न हि रज्ज्वामविद्यारोपितं सर्पं पुनर्विंवेकतो नष्टं जनयेत्कश्चित् । तथा न कश्चिदेनं जनयेदिति को न्वित्याक्षेपार्थत्वात्कारणं प्रतिषिध्यते । अविद्योद्भूतस्य नष्टस्य जनयितृकारणं न किंचिदस्तीत्यभिप्रायः “नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्” (क० उ० १ । २ । १८) इति श्रुतेः ॥ २५ ॥ | इस प्रकार अविद्याद्वारा खड़ा किया गया मायारचित जीव जब अविद्याका नाश होनेपर अपने स्वरूपसे स्थित हो जाता है तब उसे परमार्थतः कौन उत्पन्न कर सकता है ? रज्जुमें अविद्यासे आरोपित सर्पको, विवेकसे नष्ट हो जानेपर, फिर कोई उत्पन्न नहीं कर सकता । उसी प्रकार इसे भी कोई उत्पन्न नहीं कर सकता। 'को न्वेनम्' इत्यादि श्रुति आक्षेपार्थक है [प्रश्नार्थक नहीं] इसलिये इससे कारणका प्रतिषेध किया जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि अविद्यासे उत्पन्न हुए इस जीवका विद्याद्वारा नाश हो जानेपर फिर इसे उत्पन्न करनेवाला कोई भी कारण नहीं है, जैसा कि "यह कहींसे (किसी कारणसे) किसी रूपमें उत्पन्न नहीं हुआ" इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ २५॥ |
| २५० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० क |
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अनात्मप्रतिषेधसे अजन्मा आत्मा प्रकाशित होता है
स एष नेति नेतीति व्याख्यातं निह्नुते यतः ।
सर्वमग्राह्यभावेन हेतुनाजं प्रकाशते ॥ २६ ॥
क्योंकि 'स एष नेति नेति' ( यह यह आत्मा यह नहीं है, यह नहीं है ) इत्यादि श्रुति आत्माके अग्राह्यत्वके कारण [ उसके विषयमें ] पहले बतलाये हुए सभी भावोंका निषेध करती है; अतः इस [ निषेध-रूप ] हेतुके द्वारा ही अजन्मा आत्मा प्रकाशित होता है ॥ २६ ॥
| सर्वविशेषप्रतिषेधेन "अथात आदेशो नेति नेति" ( बृ० उ० २ । ३ । ६ ) इति प्रतिपादितस्यात्मनो दुर्बोधयत्वं मन्यमाना श्रुतिः पुनः पुनरुपायान्तरत्वेन तस्यैव प्रतिपिपादयिषया यद्व्याख्यातं तत्सर्वं निह्नुते, ग्राह्यं जनिमद्बुद्धि-विषयमपह्नुते । अर्थात् "स एष नेति नेति" ( बृ० उ० ३ । ९ । २६) इत्यात्मनोऽदृश्यतां दर्शयन्ती श्रुतिः उपायस्योपेय-निष्ठतामजानत उपायत्वेन व्याख्यातस्योपेयवद्ग्राह्यता मा भूदित्यग्राह्यभावेन हेतुना कारणेन | "अथात आदेशो नेति नेति" इस प्रकार समस्त विशेषणोंके प्रतिषेध-द्वारा प्रतिपादन किये हुए आत्माका दुर्बोधत्व माननेवाली श्रुति बारंबार दूसरे उपायसे उसीका प्रतिपादन करनेकी इच्छासे, पहले जो कुछ व्याख्या की है उस सभीका अपह्नव (असत्यताप्रतिपादन) करती है । वह ग्राह्य—बुद्धिके जन्य विषयोंका अपलाप करती है। अर्थात् "स एष नेति नेति" इस प्रकार आत्माकी अदृश्यता दिखलानेवाली श्रुति, उपायकी उपेयनिष्ठताको न जानने-वाले लोगोंको उपायरूपसे बतलाये हुए विषय उपेयके समान ग्राह्य न हो जायँ—इसलिये, अग्राह्यतारूप हेतुसे उनका निषेध करती है—यही इसका |
१. इस (मूर्त और अमूर्तके उपन्यास) के अनन्तर [निर्विशेष आत्माका बोध करानेके लिये] यह नहीं है, यह नहीं है—ऐसा उपदेश है।
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण [ ३०१
| निह्नुत इत्यर्थः । ततश्चैवमुपायस्योपेयनिष्ठतामेव जानत उपेयस्य च नित्यैकरूपत्वमिति तस्य सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मतत्त्वं प्रकाशते स्वयमेव ॥ २७ ॥ | अभिप्राय है । तदनन्तर इस प्रकार उपायकी उपेयनिष्ठताको जाननेवाले और उपेयकी नित्यैकरूपताको भी समझनेवाले पुरुषोंको यह बाहर-भीतर विद्यमान अजन्मा आत्मतत्त्व स्वयं ही प्रकाशित हो जाता है॥२७॥ |
सद्वस्तुकी उत्पत्ति मायिक होती है
| एवं हि श्रुतिवाक्यशतैः सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मतत्त्वमद्वयं न ततोऽन्यदस्तीति निश्चितमेतत् । युक्त्या च अधुनैतदेव पुनन्निर्धार्यत इत्याह— | इस प्रकार सैकड़ों श्रुतिवाक्योंसे यही निश्चित होता है कि बाहर-भीतर वर्तमान अजन्मा आत्मतत्त्व अद्वितीय है, उससे भिन्न और कुछ नहीं है । यही बात अब युक्तिसे फिर निश्चय की जाती है; इसीसे कहते हैं— |
सतो हि मायया जन्म युज्यते न तु तत्त्वतः ।
तत्त्वतो जायते यस्य जातं तस्य हि जायते ॥ २७ ॥
सद्वस्तुका जन्म मायासे ही हो सकता है, वस्तुतः नहीं। जिसके मतमें वस्तुतः जन्म होता है उसके सिद्धान्तानुसार भी उत्पत्तिशील वस्तुका ही जन्म हो सकता है ॥ २७ ॥
| तत्रैतत्स्यात्सदाग्राह्यमेव चेदसद्देवात्मतत्त्वमिति । तन्न, कार्यग्रहणात् । यथा सतो मायाविनो मायया जन्म कार्यम् । एवं | उस आत्मतत्त्वके विषयमें यह शंका होती है कि यदि आत्मतत्त्व सर्वदा अग्राह्य ही है तो वह असत् होना चाहिये । परन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उसका कार्य देखा जाता है । जिस प्रकार सत्-स्वरूप मायावीका मायासे जन्म लेना |
| १५२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| जगतो जन्म कार्यं गृह्यमाणं मायाविनमिव परमार्थसन्तम् आत्मानं जगज्जन्ममायास्पदम् अवगमयति । यस्मात्सतो हि विद्यमानात्कारणान्मायानिर्मितस्य हस्त्यादिकार्यस्येव जगज्जन्म युज्यते नासतः कारणात् । न तु तत्त्वत एवात्मनो जन्म युज्यते। | कार्य है उसी प्रकार यह दिखलायी देनेवाला जगत्का जन्मरूप कार्य जगज्जन्मरूप मायाके आश्रयभूत परमार्थ सत् मायावीके समान आत्माका बोध कराता है, क्योंकि मायासे रचे हुए हाथी आदि कार्यके समान सत् अर्थात् विद्यमान कारणसे ही जगत्का जन्म होना सम्भव है, किसी अविद्यमान कारणसे नहीं। तथा तत्त्वतः तो आत्माका जन्म होना सम्भव है ही नहीं। | | अथ वा सतो विद्यमानस्य वस्तुनो रज्ज्वादेः सर्पादिवत् मायया जन्म युज्यते न तु तत्त्वतो यथा तथाग्राह्यस्यापि सत एवात्मनो रज्जुसर्पवज्जगद्रूपेण मायया जन्म युज्यते । न तु तत्त्वत एवाजस्यात्मनो जन्म । | अथवा [यों समझो कि] जिस प्रकार रज्जु आदिसे सर्पादिके समान सत् अर्थात् विद्यमान वस्तुका जन्म मायासे ही हो सकता है, तत्त्वतः नहीं, उसी प्रकार अग्राह्य होनेपर भी सत्स्वरूप आत्माका, रज्जुसे सर्पके समान, जगद्रूपसे जन्म होना मायासे ही सम्भव है—उस अजन्मा आत्माका तत्त्वतः जन्म नहीं हो सकता। | | यस्य पुनः परमार्थसदजमात्मतत्त्वं जगद्रूपेण जायते वादिनो न हि तस्याजं जायत इति शक्यं वक्तुं विरोधात् । ततस्तस्यार्थाज्जातं जायत इत्यापन्नं | किन्तु जिस वादीके मतमें परमार्थ सत् आत्मतत्त्व ही जगद्रूपसे उत्पन्न होता है उसके सिद्धान्तानुसार यह नहीं कहा जा सकता कि अजन्मा वस्तुका ही जन्म होता है, क्योंकि इससे विरोध उपस्थित होता है। अतः यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि उसके मतानुसार किसी जन्मशीलका ही |