भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 167

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण [ १४७


श्रुति कार्य और कारण दोनोंका प्रतिषेध करती है

संभूतेरपवादाच्च संभवः प्रतिषिध्यते ।
को न्वेनं जनयेदिति कारणं प्रतिषिध्यते ॥ २५ ॥

श्रुतिमें सम्भूति (हिरण्यगर्भ) की निन्दाद्वारा कार्यवर्गका प्रतिषेध किया गया है तथा 'इसे कौन उत्पन्न करे' इस वाक्यद्वारा कारणका प्रतिषेध किया गया है ॥ २५ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
"अन्धं तमः प्रविशन्ति ये संभूतिमुपासते" (ई० उ० १२) इति संभूतेरुपास्यत्वापवादात्संभवः प्रतिषिध्यते । न हि परमार्थतः संभूतायां संभूतौ तदपवाद उपपद्यते ।“जो सम्भूति (हिरण्यगर्भ) की उपासना करते हैं वे घोर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं" इस प्रकार सम्भूति-के उपास्यत्वकी निन्दा की जानेके कारण कार्यवर्गका प्रतिषेध किया गया है। यदि सम्भूति परमार्थ-सत्यरूप होती तो उसकी निन्दा की जानी सम्भव नहीं थी ।
ननु विनाशेन संभूतेः समुच्चयविध्यर्थः संभूत्यपवादः। यथा "अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते" (ई० उ० ९) इति ।**शंका—**सम्भूतिके उपास्यत्वकी जो निन्दा की गयी है वह तो विनाश-(कर्म) के साथ सम्भूति (देवतोपासना) का समुच्चयविधान करनेके लिये है; जैसा कि "जो अविद्याकी उपासना करते हैं वे घोर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं" इस वाक्यसे सिद्ध होता है ।
(समुच्चयस्य प्रयोजनम्)<br>सत्यमेव देवतादर्शनस्य संभूतिविषयस्य विनाशशब्दवाच्यस्य कर्मणः समुच्चयविधानार्थः संभूत्यपवादः। तथापि विनाशा-**समाधान—**सचमुच ही, सम्भूति-विषयक देवतादर्शन और 'विनाश' शब्दवाच्य कर्मका समुच्चयविधान करनेके लिये ही सम्भूतिका अपवाद किया गया है; तथापि जिस प्रकार