माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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१४८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का०
| ख्यस्य कर्मणः स्वाभाविकाज्ञान-प्रवृत्तिरूपस्य मृत्योरतितरणार्थ-त्ववद्देवतादर्शनकर्मसमुच्चयस्य पुरुषसंस्कारार्थस्य कर्मफलराग-प्रवृत्तिरूपस्य साध्यसाधनैषणा-द्वयलक्षणस्य मृत्योरतितरणार्थ-त्वम् । एवं ह्येषणाद्वयरूपा-न्मृत्योरशुद्धेर्वियुक्तः पुरुषः संस्कृतः स्यादतो मृत्योरतित-रणार्था देवतादर्शनकर्मसमुच्चय-लक्षणा ह्यविद्या । | 'विनाश' संज्ञक कर्म स्वाभाविक अज्ञानजनित प्रवृत्तिरूप मृत्युको पार करनेके लिये है उसी प्रकार पुरुषके संस्कारके लिये विहित देवता-दर्शन और कर्मका समुच्चय कर्म-फलके रागसे होनेवाली प्रवृत्तिरूपा जो साध्य-साधनलक्षणा दो प्रकारकी वासनामयी मृत्यु है, उसे पार करनेके लिये है । इस प्रकार एषणाद्वयरूप मृत्युकी अशुद्धिसे मुक्त हुआ पुरुष ही संस्कारसम्पन्न हो सकता है । अतः देवतादर्शन और कर्मसमुच्चयलक्षणा अविद्या मृत्युसे पार होनेके लिये ही है। |
| एवमेव एषणालक्षणाद्विद्याया मृत्योरतितीर्णस्य विरक्तस्योपनिपच्छा-स्त्रार्थलोचनपरस्य (सम्भृत्यपवादहेतुः) | इसी प्रकार एषणाद्वयलक्षणा अविद्यारूप मृत्युसे पार हुए तथा उपनिषच्छास्त्रके अर्थकी आलोचनामें तत्पर विरक्त पुरुषको ब्रह्मात्मैक्यरूप विद्याकी उत्पत्ति दूर नहीं है; |
| नान्तरीयी परमात्मैकत्व-विद्योत्पत्तिरिति पूर्वभाविनीम-विद्यामपेक्ष्य पश्चाद्भाविनी ब्रह्म-विद्यामृतत्वसाधनैकेन पुरुषेण सम्बध्यमानावियया समुच्चीयत इत्युच्यते । अतोऽन्यार्थत्वाद-मृतत्वसाधनं ब्रह्मविद्यामपेक्ष्य निन्दार्थ एव भवति संभूत्य- | इसीलिये ऐसा कहा जाता है कि पहले होनेवाली अविद्याकी अपेक्षासे पीछे प्राप्त होनेवाली ब्रह्मविद्या, जो अमृतत्व-का साधन है, एक ही पुरुषसे सम्बन्ध रखनेके कारण अविद्यासे समुच्चित की जाती है । अतः अमृतत्वके साक्षात् साधन ब्रह्मविद्याकी अपेक्षा अन्य प्रयोजनवाला होनेसे सम्भूतिका अपवाद निन्दाहीके लिये किया |