माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 169, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 169
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण [ १४९
| पवादः। यद्यप्यशुद्धिवियोगहेतुः अतन्निष्ठत्वात् । अत एव संभूतेः अपवादात्संभूतेरापेक्षिकमेव सत्त्वमिति परमार्थसदात्मैकत्वमपेक्ष्य अमृताख्यः संभवः प्रतिषिध्यते । | गया है। वह यद्यपि अशुद्धिके क्षयका कारण है, तो भी अतन्निष्ठ (मोक्षका साक्षात् हेतु न) होनेके कारण [उसकी निन्दा ही की गयी है]। इसलिये सम्भूतिका अपवाद किया जानेके कारण उसका सत्त्व आपेक्षिक ही है; इसी आशयसे परमार्थ सत् आत्मैकत्वकी अपेक्षासे अमृतसंज्ञक सम्भूतिका प्रतिषेध किया गया है। |
| [विद्योत्पत्त्यनन्तरं जीवभावस्य अनुपपत्तिप्रतिपादनम्]<br><br>एवं मायानिर्मितस्यैव जीवस्याविद्यया प्रत्युपस्थापितस्याविद्यानाशे स्वभावरूपत्वात्परमार्थतः को न्वेनं जनयेत् । न हि रज्ज्वामविद्यारोपितं सर्पं पुनर्विंवेकतो नष्टं जनयेत्कश्चित् । तथा न कश्चिदेनं जनयेदिति को न्वित्याक्षेपार्थत्वात्कारणं प्रतिषिध्यते । अविद्योद्भूतस्य नष्टस्य जनयितृकारणं न किंचिदस्तीत्यभिप्रायः “नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्” (क० उ० १ । २ । १८) इति श्रुतेः ॥ २५ ॥ | इस प्रकार अविद्याद्वारा खड़ा किया गया मायारचित जीव जब अविद्याका नाश होनेपर अपने स्वरूपसे स्थित हो जाता है तब उसे परमार्थतः कौन उत्पन्न कर सकता है ? रज्जुमें अविद्यासे आरोपित सर्पको, विवेकसे नष्ट हो जानेपर, फिर कोई उत्पन्न नहीं कर सकता । उसी प्रकार इसे भी कोई उत्पन्न नहीं कर सकता। 'को न्वेनम्' इत्यादि श्रुति आक्षेपार्थक है [प्रश्नार्थक नहीं] इसलिये इससे कारणका प्रतिषेध किया जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि अविद्यासे उत्पन्न हुए इस जीवका विद्याद्वारा नाश हो जानेपर फिर इसे उत्पन्न करनेवाला कोई भी कारण नहीं है, जैसा कि "यह कहींसे (किसी कारणसे) किसी रूपमें उत्पन्न नहीं हुआ" इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ २५॥ |