भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 301 में से

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पृष्ठ 170
२५०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० क

अनात्मप्रतिषेधसे अजन्मा आत्मा प्रकाशित होता है

स एष नेति नेतीति व्याख्यातं निह्नुते यतः ।

सर्वमग्राह्यभावेन हेतुनाजं प्रकाशते ॥ २६ ॥

क्योंकि 'स एष नेति नेति' ( यह यह आत्मा यह नहीं है, यह नहीं है ) इत्यादि श्रुति आत्माके अग्राह्यत्वके कारण [ उसके विषयमें ] पहले बतलाये हुए सभी भावोंका निषेध करती है; अतः इस [ निषेध-रूप ] हेतुके द्वारा ही अजन्मा आत्मा प्रकाशित होता है ॥ २६ ॥

सर्वविशेषप्रतिषेधेन "अथात आदेशो नेति नेति" ( बृ० उ० २ । ३ । ६ ) इति प्रतिपादितस्यात्मनो दुर्बोधयत्वं मन्यमाना श्रुतिः पुनः पुनरुपायान्तरत्वेन तस्यैव प्रतिपिपादयिषया यद्व्याख्यातं तत्सर्वं निह्नुते, ग्राह्यं जनिमद्बुद्धि-विषयमपह्नुते । अर्थात् "स एष नेति नेति" ( बृ० उ० ३ । ९ । २६) इत्यात्मनोऽदृश्यतां दर्शयन्ती श्रुतिः उपायस्योपेय-निष्ठतामजानत उपायत्वेन व्याख्यातस्योपेयवद्ग्राह्यता मा भूदित्यग्राह्यभावेन हेतुना कारणेन"अथात आदेशो नेति नेति" इस प्रकार समस्त विशेषणोंके प्रतिषेध-द्वारा प्रतिपादन किये हुए आत्माका दुर्बोधत्व माननेवाली श्रुति बारंबार दूसरे उपायसे उसीका प्रतिपादन करनेकी इच्छासे, पहले जो कुछ व्याख्या की है उस सभीका अपह्नव (असत्यताप्रतिपादन) करती है । वह ग्राह्य—बुद्धिके जन्य विषयोंका अपलाप करती है। अर्थात् "स एष नेति नेति" इस प्रकार आत्माकी अदृश्यता दिखलानेवाली श्रुति, उपायकी उपेयनिष्ठताको न जानने-वाले लोगोंको उपायरूपसे बतलाये हुए विषय उपेयके समान ग्राह्य न हो जायँ—इसलिये, अग्राह्यतारूप हेतुसे उनका निषेध करती है—यही इसका

१. इस (मूर्त और अमूर्तके उपन्यास) के अनन्तर [निर्विशेष आत्माका बोध करानेके लिये] यह नहीं है, यह नहीं है—ऐसा उपदेश है।

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