भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण [ ३०१


निह्नुत इत्यर्थः । ततश्चैवमुपायस्योपेयनिष्ठतामेव जानत उपेयस्य च नित्यैकरूपत्वमिति तस्य सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मतत्त्वं प्रकाशते स्वयमेव ॥ २७ ॥अभिप्राय है । तदनन्तर इस प्रकार उपायकी उपेयनिष्ठताको जाननेवाले और उपेयकी नित्यैकरूपताको भी समझनेवाले पुरुषोंको यह बाहर-भीतर विद्यमान अजन्मा आत्मतत्त्व स्वयं ही प्रकाशित हो जाता है॥२७॥

सद्वस्तुकी उत्पत्ति मायिक होती है

एवं हि श्रुतिवाक्यशतैः सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मतत्त्वमद्वयं न ततोऽन्यदस्तीति निश्चितमेतत् । युक्त्या च अधुनैतदेव पुनन्निर्धार्यत इत्याह—इस प्रकार सैकड़ों श्रुतिवाक्योंसे यही निश्चित होता है कि बाहर-भीतर वर्तमान अजन्मा आत्मतत्त्व अद्वितीय है, उससे भिन्न और कुछ नहीं है । यही बात अब युक्तिसे फिर निश्चय की जाती है; इसीसे कहते हैं—

सतो हि मायया जन्म युज्यते न तु तत्त्वतः ।
तत्त्वतो जायते यस्य जातं तस्य हि जायते ॥ २७ ॥

सद्वस्तुका जन्म मायासे ही हो सकता है, वस्तुतः नहीं। जिसके मतमें वस्तुतः जन्म होता है उसके सिद्धान्तानुसार भी उत्पत्तिशील वस्तुका ही जन्म हो सकता है ॥ २७ ॥

तत्रैतत्स्यात्सदाग्राह्यमेव चेदसद्देवात्मतत्त्वमिति । तन्न, कार्यग्रहणात् । यथा सतो मायाविनो मायया जन्म कार्यम् । एवंउस आत्मतत्त्वके विषयमें यह शंका होती है कि यदि आत्मतत्त्व सर्वदा अग्राह्य ही है तो वह असत् होना चाहिये । परन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उसका कार्य देखा जाता है । जिस प्रकार सत्-स्वरूप मायावीका मायासे जन्म लेना
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