माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १५२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| जगतो जन्म कार्यं गृह्यमाणं मायाविनमिव परमार्थसन्तम् आत्मानं जगज्जन्ममायास्पदम् अवगमयति । यस्मात्सतो हि विद्यमानात्कारणान्मायानिर्मितस्य हस्त्यादिकार्यस्येव जगज्जन्म युज्यते नासतः कारणात् । न तु तत्त्वत एवात्मनो जन्म युज्यते। | कार्य है उसी प्रकार यह दिखलायी देनेवाला जगत्का जन्मरूप कार्य जगज्जन्मरूप मायाके आश्रयभूत परमार्थ सत् मायावीके समान आत्माका बोध कराता है, क्योंकि मायासे रचे हुए हाथी आदि कार्यके समान सत् अर्थात् विद्यमान कारणसे ही जगत्का जन्म होना सम्भव है, किसी अविद्यमान कारणसे नहीं। तथा तत्त्वतः तो आत्माका जन्म होना सम्भव है ही नहीं। | | अथ वा सतो विद्यमानस्य वस्तुनो रज्ज्वादेः सर्पादिवत् मायया जन्म युज्यते न तु तत्त्वतो यथा तथाग्राह्यस्यापि सत एवात्मनो रज्जुसर्पवज्जगद्रूपेण मायया जन्म युज्यते । न तु तत्त्वत एवाजस्यात्मनो जन्म । | अथवा [यों समझो कि] जिस प्रकार रज्जु आदिसे सर्पादिके समान सत् अर्थात् विद्यमान वस्तुका जन्म मायासे ही हो सकता है, तत्त्वतः नहीं, उसी प्रकार अग्राह्य होनेपर भी सत्स्वरूप आत्माका, रज्जुसे सर्पके समान, जगद्रूपसे जन्म होना मायासे ही सम्भव है—उस अजन्मा आत्माका तत्त्वतः जन्म नहीं हो सकता। | | यस्य पुनः परमार्थसदजमात्मतत्त्वं जगद्रूपेण जायते वादिनो न हि तस्याजं जायत इति शक्यं वक्तुं विरोधात् । ततस्तस्यार्थाज्जातं जायत इत्यापन्नं | किन्तु जिस वादीके मतमें परमार्थ सत् आत्मतत्त्व ही जगद्रूपसे उत्पन्न होता है उसके सिद्धान्तानुसार यह नहीं कहा जा सकता कि अजन्मा वस्तुका ही जन्म होता है, क्योंकि इससे विरोध उपस्थित होता है। अतः यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि उसके मतानुसार किसी जन्मशीलका ही |