माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १५३
| ततश्चानवस्था जाताज्जायमान-<br>त्वेन । तस्मादजमेकमेवात्म-<br>तत्त्वमिति सिद्धम् ॥ २७ ॥ | जन्म होता है । किन्तु इस प्रकार जन्मशीलसे ही जन्म माननेपर अनवस्था उपस्थित हो जाती है; अतः यह सिद्ध हुआ कि आत्मतत्त्व अजन्मा और एक ही है ॥ २७ ॥ |
असद्वस्तुकी उत्पत्ति सर्वथा असम्भव है
असतो मायया जन्म तत्त्वतो नैव युज्यते ।
वन्ध्यापुत्रो न तत्त्वेन माययां वापि जायते ॥ २८ ॥
असद्वस्तुका जन्म तो मायासे अथवा तत्त्वतः किसी प्रकार भी होना सम्भव नहीं है । वन्ध्याका पुत्र न तो वस्तुतः उत्पन्न होता है और न मायासे ही ॥ २८ ॥
| असद्वादिनामसतो भावस्य मायया तत्त्वतो वा न कथंचन जन्म युज्यते, अदृष्टत्वात् । न हि वन्ध्यापुत्रो मायया तत्त्वतो वा जायते तस्मादत्रासद्वादो दूरत एवानुपपन्न इत्यर्थः ॥ २८ ॥ | असद्वादियोंके पक्षमें भी, असत् वस्तुका जन्म मायासे अथवा वस्तुतः किसी प्रकार होना सम्भव नहीं है, क्योंकि ऐसा देखा नहीं जाता । वन्ध्याका पुत्र न तो मायासे उत्पन्न होता है और न वस्तुतः ही । अतः तात्पर्य यह हुआ कि असद्वाद तो सर्वथा ही अयुक्त है ॥ २८ ॥ |
| कथं पुनः सतो माययैव जन्मेत्युच्यते— | सत् वस्तुका जन्म मायासे ही कैसे हो सकता है—इसपर कहते हैं— |
यथा स्वप्ने द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ।
तथा जाग्रद्द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ॥ २६ ॥