माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| १५४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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जिस प्रकार स्वप्नकालमें मन मायासे ही द्वैताभासरूपसे स्फुरित होता है उसी प्रकार जाग्रत्कालमें भी वह मायासे ही द्वैताभासरूपसे स्फुरित होता है ॥ २९ ॥
| यथा रज्ज्वां विकल्पितः सर्पो रज्जुरूपेणावेक्ष्यमाणः सन्नैवं मनः परमार्थविज्ञप्त्यात्मरूपेणावेक्ष्यमाणं सद् ग्राह्यग्राहकरूपेण द्वयाभासं स्पन्दते स्वप्ने मायया, रज्ज्वामिव सर्पः । तथा तद्वदेव जाग्रज्जागरिते स्पन्दते मायया मनः स्पन्दत इवेत्यर्थः ॥ २९ ॥ | जिस प्रकार रज्जुमें कल्पना किया हुआ सर्प रज्जुरूपसे देखे जानेपर सत् है उसी प्रकार मन भी परमार्थज्ञानरूप आत्मस्वरूपसे देखा जानेपर सत् है । वह रज्जुमें सर्पके समान स्वप्नावस्थामें मायासे ही ग्राह्य-ग्राहकरूप द्वैतके आभासरूपसे स्फुरित होता है । इसी प्रकार यह मन ही जाग्रत्-अवस्थामें भी मायासे [विविध रूपोंमें] स्फुरित होता है; अर्थात् स्फुरित होता-सा मालूम होता है [वास्तवमें स्फुरित भी नहीं होता] ॥२९॥ |
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स्वप्न और जाग्रति मनके ही विलास हैं
अद्वयं च द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ३० ॥
इसमें सन्देह नहीं स्वप्नावस्थामें अद्वय मन ही द्वैतरूपसे भासनेवाला है; इसी प्रकार जाग्रत्कालमें भी निःसन्देह अद्वय मन ही द्वैतरूपसे भासता है ॥ ३० ॥
| रज्जुरूपेण सर्प इव परमार्थत आत्मरूपेणाद्वयं सद्दूयाभासं | रज्जुरूपसे सत् सर्पके समान परमार्थतः अद्वय आत्मरूपसे सत् |
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