भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १५५


मनः स्वप्ने न संशयः । न हि स्वप्ने हस्त्यादि ग्राह्यं तद्ग्राहकं वा चक्षुरादिद्वयं विज्ञानव्यतिरेकेणास्ति। जाग्रदपि तथैवेत्यर्थः। परमार्थसद्विज्ञानमात्राविशेषात् ३०मन ही स्वप्नमें द्वैतरूपसे भासनेवाला है—इसमें सन्देह नहीं। स्वप्नमें हाथी आदि ग्राह्य पदार्थ और उन्हें ग्रहण करनेवाले चक्षु आदि दोनों ही विज्ञानके सिवा और कुछ नहीं हैं; ऐसा ही जाग्रतमें भी है—यह इसका तात्पर्य है, क्योंकि दोनों ही अवस्थाओंमें परमार्थ सत् विज्ञान ही समानरूपसे विद्यमान है ॥ ३० ॥

रज्जुसर्पवद्विकल्पनारूपं द्वैतरूपेण मन एवेत्युक्तम् । तत्र किं प्रमाणमित्यन्वयव्यतिरेकलक्षणमनुमानमाह । कथम्—रज्जुमें सर्पके समान विकल्पनारूप यह मन ही द्वैतरूपसे स्थित है—ऐसा पहले कहा गया । इसमें प्रमाण क्या है ? इसके लिये अन्वयव्यतिरेकरूप अनुमान प्रमाण कहा जाता है; सो किस प्रकार—

मनोदृश्यमिदं द्वैतं यत्किंचित्सचराचरम् ।
मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥ ३१ ॥

यह जो कुछ चराचर द्वैत है सब मनका दृश्य है, क्योंकि मनका अमनीभाव ( संकल्पशून्यत्व ) हो जानेपर द्वैतकी उपलब्धि नहीं होती ॥ ३१ ॥

तेन हि मनसा विकल्प्यमानेन दृश्यं मनोदृश्यमिदं द्वैतं सर्वं मन इति प्रतिज्ञा । तद्भावेउस विकल्पित होनेवाले मनद्वारा दिखायी देने योग्य यह सम्पूर्ण द्वैत मन ही है—यह प्रतिज्ञा है, क्योंकि उसके वर्तमान रहनेपर यह भी