माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| १५६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| भावात्तदभावेऽभावात् । मनसो ह्यमनीभावे निरोधे विवेकदर्शनाभ्यासवैराग्याभ्यां रज्ज्वामिव सर्पे लयं गते वा सुषुप्ते द्वैतं नैवोपलभ्यत इत्यभावात्सिद्धं द्वैतस्यासत्त्वमित्यर्थः ॥ ३१ ॥ | वर्तमान रहता है तथा उसका अभाव हो जानेपर इसका भी अभाव हो जाता है । मनका अमनीभाव—निरोध अर्थात् विवेकदृष्टिके अभ्यास और वैराग्यद्वारा रज्जुमें सर्पके समान लय हो जानेपर, अथवा सुषुप्ति-अवस्थामें द्वैतकी उपलब्धि नहीं होती । इस प्रकार अभाव हो जानेके कारण द्वैतकी असत्ता सिद्ध ही है—यह इसका तात्पर्य है॥३१॥ |
तत्त्वबोधसे अमनीभाव
| कथं पुनरमनीभावः ? इति उच्यते— | किन्तु यह अमनीभाव होता किस प्रकार है ? इस विषयमें कहा जाता है— |
आत्मसत्यानुबोधेन न सङ्कल्पयते यदा ।
अमनस्तां तदा याति ग्राह्याभावे तदग्रहम् ॥ ३२ ॥
जिस समय आत्मसत्यकी उपलब्धि होनेपर मन संकल्प नहीं करता उस समय वह अमनीभावको प्राप्त हो जाता है; उस अवस्थामें ग्राह्यका अभाव हो जानेके कारण वह ग्रहण करनेके विकल्पसे रहित हो जाता है ॥ ३२ ॥
| आत्मैव सत्यमात्मसत्यं मृत्तिकावत् “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः । तस्य शास्त्राचार्योपदेश- | “[घटादि] वाणीसे आरम्भ होनेवाला विकार नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है” इस श्रुतिके अनुसार मृत्तिकाके समान आत्मा ही सत्य है । उस आत्म-सत्यका शास्त्र और आचार्यके उपदेशके अनन्तर बोध |